सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की जयंती पर विशेष

वर दे, वीणावादिनि वर दे! 
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!

श्रीराम पुकार शर्मा, कोलकाता । सम्भवतः हिंदी साहित्य में सरस्वती वन्दना से सम्बन्धित इससे बेहतरीन वन्दना गीत कोई और नहीं है I जिसमें माँ भारती की निःस्वार्थ वन्दना के साथ ही साथ समस्त भारतवासी के लिए स्वतंत्र भाव, नवीन ज्ञान, नव गति, नव संगीत, नव गीत आदि की कामना व्यक्त की गई हो। ऐसी भावपूर्ण समग्र वन्दना गीत के सृजनकर्ता वाग्देवी वीणावादिनी माँ सरस्वती के परम आराधकपुत्र ‘श्लाका पुरूष’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हैं। यह ‘सरस्वती वन्दना’ गीत महाकवि के जीर्ण-शीर्ण से मोह भंग और सर्वत्र नवीनता जनित बेबाक साहित्य साधना को उद्घाटित करता है। पद-पद पर आगत काल के दुर्भाग्यपूर्ण संघातों को सहन करते हुए माँ भारती का दिव्य सहारा ग्रहण कर दुखों के कडुवे घूंटों को निरंतर पान करते हुए प्रारम्भिक साहित्यिक उपेक्षिता का शिकार होते हुए भी स्वाभिमान के शिखर पर अडिग रह कर समयानुकूल बादल सदृश घोर व गम्भीर गर्जन को प्रस्फुटित कर शोषकों के कठोर हृदय को कम्पित करने वाला साधारण सा व्यक्तित्व सर्वकालिक साहित्य का ‘निराला’ बन गया।

‘तुम्हीं गाती हो अपना गान, व्यर्थ में पाता हूँ सम्मान।
भावना रंग दो तुमने प्राण, छंद-वन्दों में निज आह्वान।’
वैसे तो सरस्वती वरदपुत्र सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म माघ शुक्ल एकादशी, विo संवत 1953 (21 फरवरी, रविवार) 1899 को बंगाल की तत्कालीन महिषादल रियासत, जिला मेदिनीपुर में हुआ था। रविवार को जन्म लेने के कारण बालक का नाम सूर्य कुमार रखा गया था। पर माँ भारती को अपना आदर्श मानने वाले ‘निराला’ अपना जन्मदिन सदैव ‘सरस्वती पूजा’ के दिन ही मनाने के पक्ष में रहे थे और मनाया भी करते थे। अतः ‘वाग्देवी पूजन दिवस’ को ही ‘निराला’ का जन्मदिन मनाने की परम्परा रही है। उनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी मूल रूप से गाँव गढ़कोला, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे और महिषादल रियासत में एक साधारण सिपाही की नौकरी किया करते थे। माता रुक्मिणी देवी का मातृत्व प्रेम-छत्र मात्र तीन वर्ष के शैशव काल तक ही बालक सूर्य कुमार को प्राप्त हुआ। अतः इनका पालन-पोषण पिता के कठोर दक्ष अनुशासन में हुआ। एक ओर माता के वात्सल्य व ममता भरी गोद से वंचित और दूसरी ओर पिता का कठोर अनुशासन ने शैशव सूर्य कुमार को बचपन से ही अन्तर्मुखी, आत्मकेन्द्रित और स्वाभिमानी बना दिया। बीस वर्ष का होते-होते सिर पर से पिता की छत्र-छाया भी छीन गई।

‘वहाँ एक यह लेकर वीणा दीन
तन्त्री-क्षीण, नहीं जिसमें कोई झंकार नवीन,
रुद्ध कण्ठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ?–
माँ ! क्या गाऊँ?
सूर्य कुमार ही हिंदी साहित्यिक गगन में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के नाम से चमकते रहे हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा महिषादल गाँव से बंगाली भाषा माध्यम में हुई। बचपन में ही अपने पिता के आधीनस्थ सैनिकों के साथ ‘रामायण’ की चौपाइयाँ गा-गाकर पढ़ते थे। ऐसे ही समय उन्होंने हारमोनियम बजाना भी सिख लिया था। कुश्ती और घुड़सवारी में भी अब्बल ही रहे। उन्होंने बचपन बाद उन्होंने घर पर ही संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू और फारसी का मनोयोग अध्ययन किया। पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह रायबरेली जिले के डलमऊ नामक ग्राम की एक शिक्षित बालिका मनोहरा देवी के साथ 1910 में हो गया। मनोहरा देवी ने सूर्यकांत को हिंदी सिखाई और हिन्दी साहित्य की ओर उनकी प्रतिभा तथा क्रियाशीलता को प्रेरित की।

इसके बाद सूर्यकांत त्रिपाठी अपनी रचनाएँ हिन्दी में लिखना शुरू की। 1914 में पुत्र रामकृष्ण और 1917 में पुत्री सरोज का जन्म हुआ। परन्तु सूर्यकांत त्रिपाठी के दाम्पत्य जीवन की खुशियाँ बहुत जल्दी ही छीन गई अर्थात प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान एक ऐसी महामारी फैली, जिसके दौरान पहले उनके पिता फिर उनकी पत्नी सहित उनके परिवार के कुछ और सदस्यों की भी मृत्यु हो गई। एक ओर पारिवारिक बोझ और दूसरी ओर आर्थिक विपन्नता के लगातार कई आघातों ने उनकी सुकुमार चेतना को कुंठित करने का प्रयास किया, पर जन्मजात साहसिकता, स्वच्छन्दता, स्वाभिमानी और विद्रोही व्यक्तित्व ने उन्हें कर्म-पथ पर अडिग रखा।

‘उमड़ सृष्टि के अन्तहीन अम्बर से,
घर से क्रीड़ारत बालक-से,
ऐ अनन्त के चंचल शिशु सुकुमार!
स्तब्ध गगन को करते हो तुम पार!
अन्धकार– घन अन्धकार ही
क्रीड़ा का आगार।‘
सूर्यकांत त्रिपाठी ने पहली नौकरी 1918 में महिषादल राज्य में ही की थी। ऐसे ही समय उनकी लेखनी भी चलने लगी थी। इनकी प्रथम कविता 1920 में ‘जन्मभूमि प्रभाव’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हो गई थी। उनके निबंध समय-समय पर ‘सरस्वती पत्रिका’ में भी प्रकाशित होते रहे। ‘सरस्वती’ के सम्पादक आ. महावीर प्रसाद द्विवेदी के सलाह पर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के श्रीरामकृष्ण आश्रम से प्रकाशित पत्रिका ‘समन्वय’ का सम्पादन-कार्य करने लगे। यहीं पर सूर्यकांत त्रिपाठी को स्वामी विवेकानन्द के जीवन-दर्शन, वेदांत और आध्यात्म-दर्शन से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भारतीय संस्कृति का स्वाभिमान, धार्मिक आख्यानों का मर्म उन्हें स्पन्दित करने लगा।

फिर वे सन् 1923 में कलकत्ता से सेठ महादेव प्रसाद द्वारा प्रकाशित ‘मतवाला’ के सम्पादक मंडल के साथ जुड़ गए। यही पर उनके स्वच्छन्दतावादी प्रवृति के कारण लोग इन्हें भी ‘मतवाला’ और फिर ‘निराला’ उपनाम प्रदान किये। 1923 में ही इनका प्रथम कविता-संग्रह ‘अनामिका’ नाम से  प्रकाशित हुआ। पर स्वाभिमान पर ठेंस लगने के कारण उन्होंने ‘मतवाला’ को सलाम कर लखनऊ में गंगा पुस्तक माला के कार्यालय से जुड़कर 1935 तक संस्था की मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से सम्बद्ध रहे। बाद में वे इन सब कार्यों से मुक्त होकर लखनऊ में तथा उसके बाद में प्रयागराज में रह कर अपनी स्वतंत्र रचना करने लगे। देखते देखते ही निराला जी ने अपनी रचनाओं का अम्बार ही लगा दिया।

‘मैंने मैं की शैली अपनाई, देखा एक निजी दुःख भाई।
दुःख की छाया पड़ी ह्रदय में, झट उमड़ वेदना आई।’
‘निराला’ जी का विद्रोही प्रवृति केवल साहित्य तक ही सिमित न रहा बल्कि, पारिवारिक जीवन में दिखाई दी। कारन चाहे जो भी हो। उन्होंने अपनी एकमात्र पुत्री ‘सरोज’ का विवाह सब प्रकार की परम्पराओं को तोड़कर स्वयं पुरोहित बनकर किया था, दुर्भाग्यवश वह विवाह के चार वर्ष बाद ही विधवा गयी और फिर वह भी परलोक गमन की।
‘दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपात यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल हो भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण!’

‘निराला’ जी की स्वच्छन्दता की छाया इनकी लगभग सभी कविताओं पर भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है, जो इन्हें हिन्दी कविता को छंदों की परिधि से मुक्त करने वाले ‘मुक्तक छंद का प्रवर्तक कवि’ के नाम को परिभाषित करती है। उन्होंने ने छायावादी परिवेश में हिन्दी कविता को नया आयाम प्रदान किया है। उनका व्यक्तिगत और साहित्यिक जीवन में अन्तः और बाह्य दोनों पक्ष ही निरंतर संघर्षमय रहे हैं। फिर भी उन्होंने काव्य-शैष्ठाव के अनुकूल कई नए आयाम को स्थापित किये हैं, जिनका भले ही रचनाकाल में आलोचना की गई थीं, पर कालांतर में सभी साहित्य जगत में मील के पत्थर ही साबित हो रहे हैं।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की रचनाएँ :
काव्य संग्रह – अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत कुंज, सांध्य काकली, अपरा (संचयन)।
उपन्यास – अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे, चमेली, इन्दुलेखा आदि।
कहानी संग्रह – लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार, देवी आदि।
निबंध – रवीन्द्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के जीवन का अंतिम समय प्रयागराज के दारागंज मोहल्ले में एक छोटे से कमरे में एकाकीपन और अस्वस्थता में बीता। पर इस अस्वस्थता की घड़ी में में उनकी मुँहबोली बहन कवयित्री महादेवी वर्मा जी अपनी सेवा के माध्यम से निरंतर उनका साथ दी। प्रयागराज के दारागंज के इसी कमरे में 15 अक्टूबर 1961 को हिन्दी-साहित्य का सूर्य-कान्त अपने स्वभाव को ‘निराला’ रखते हुए सदा सदा के लिए अस्त हो गया।

क्रांतिकारी व्यक्तित्व के धनी सरस्वती वरदपुत्र स्वनामधन्य कविवर महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ अपनी बहुमुखी साहित्यिक प्रतिभा के बल पर न केवल हिंदी साहित्य, वरन विश्व के विख्यात कवियों में एक गरिमामय स्थान के हकदार हैं। उन्होंने स्वयं किसी महाकाव्य के नायक के समान निरंतर संघर्षों से दो-दो हाथ करते हुए ‘शताब्दी का कवि’ बनकर फिर इस दुनिया से मौन-मूक कुछ ऐसे कूच कर गए कि यह दुनिया हैरान होकर  देखती रह गई कि ‘ऐसे भी कोई भला जाता है’! जिस किसी ने भी ‘निराला’ को एक बार भी पढ़ा हो, उसे भला सड़क पर आते किसी ‘भिक्षुक’ को देख या फिर सड़क के किनारे कड़ी धूप में काम करती किसी ‘मजदूरनी’ को देख उसके मन-मस्तिष्क में क्योंकर न ‘निराला’ उमड़ पड़ेंगे? यही ‘निराला’ का यथार्थ है, निरालापन है। हम ‘निराला’ से दूर हो ही नहीं सकते हैं।

श्रीराम पुकार शर्मा

श्रीराम पुकार शर्मा  
ई-मेल सम्पर्क सूत्र – [email protected]।com

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