हिन्दी के अनन्य साधक : आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल

कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 26 वर्षों(जनवरी 1933 से मई 1959) तक हिन्दी के पठन-पाठन से जुड़कर आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल ने पश्चिम बंगाल में हिन्दी के व्यापक प्रचार प्रसार एवं सम्मान हेतु निरंतर जो संघर्ष किया उसकी चर्चा आज बहुत कम होती है । हमारे वे विद्यार्थी एवं साहित्य प्रेमी मित्र जो सुकुल जी के अवदान को समझना चाहते हैं,उन्हें ध्यान में रखते हुए ही यह आलेख लिखा गया है।
डॉ सत्य प्रकाश तिवारी, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभागाध्यक्ष, दीनबंधु कॉलेज

आज के समय के बौद्धिक की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह सोचता कुछ है,लिखता कुछ है,करता कुछ है और जीता कुछ और ही है। कथनीऔर करनी में बहुत बड़ा फर्क हो गया है इन दिनों । कुछ विशेष प्राप्त कर लेने के लिए लगी होड़ के कारण स्पष्टवादिता और दृढ़ता का स्थान क्रमशः धूर्तता और भीरुता ने प्राप्त कर लिया है।

यद्यपि सभी बौद्धिक ऐसे नहीं हैं , कुछ अच्छे भी हैं, पर उनकी संख्या बहुत कम है । अतः हमें अपने उन पूर्ववर्ती बौद्धिकों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अवगत होना चाहिए जिनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं था । ऐसे रचनाकारों को याद करना अपनी जड़ों से जुड़ने के समान है। आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल एक ऐसे ही बौद्धिक, अध्यापक, रचनाकार थे जिनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं दिखता है ।
हिन्दी के इस अप्रतिम पुरोधा का जन्म 1902 की वसंत पंचमी के दिन बडनेरा (तत्कालीन बरार, वर्तमान में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में है।) में हुआ था ।वे उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के मूल निवासी थे । मलिक मऊ रोड पर वाजपेयी धर्मशाला के बगल में एक बड़े परिसर में “शुक्ला भवन” उनका स्थाई आवास था । उनके पिता डॉ शिवरतन बैजनाथ शुक्ल (आई.सी.एस.) एक सुप्रसिद्ध चिकित्सक थे। लगभग 09 वर्ष की उम्र में पिता की मृत्यु के पश्चात वे अपने भाई अवन्तिका प्रसाद शुक्ल के साथ रायबरेली आ गए। रायबरेली के गवर्नमेंट स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर विद्याध्ययन हेतु इलाहाबाद चले गए ।
1931 तक इलाहाबाद में ही रहते हुए विद्याध्ययन के उपरांत विभिन्न अकादमिक कार्यों में निरंतर सक्रिय रहे। 1932 में प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्होंने अपना आध्यापकीय जीवन प्रारम्भ किया । इसी वर्ष दिसम्बर में कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी प्रवक्ता पद के लिए साक्षात्कार देकर लौटने के बाद महामना मदन मोहन मालवीय से मिले । महामना ने इनकी बातें सुनने के बाद आशीर्वाद और आदेश देते हुए कहा –“हिन्दी की सेवा, कलकत्ते में, सरल
काम नहीं है , किन्तु तुम्हारे व्रत को सम्पन्न करने के लिए उससे अच्छा क्षेत्र भी नहीं है,इसलिए इस कठिन काम को संभालो ।” महामना का आशीर्वाद प्राप्त कर सुकुल जी जनवरी 1933 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रवक्ता पद पर आसीन हुए । कलकत्ता आने के बाद वे आजीवन यहीं के होकर रह गए । सादा जीवन उच्च विचार इनके जीवन का पर्याय रहा । वे एक बार जिससे मिल लेते थे वह उन्हें हमेशा याद रखते । आजीवन कलकत्ता और अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी की श्रीवृद्धि हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहे ।
आजादी के कुछ वर्ष पूर्व जब यह चर्चा होने लगी कि भारत कि राष्ट्रभाषा क्या हो ? इस समय कुछ अंग्रेजी समर्थक लोग यह कहते हुए हिन्दी का विरोध करने लगे कि भारत एक बहुभाषी देश है , अतः हिन्दी को राष्ट्रभाषा कैसे बनाया जा सकता है ? हिन्दी राष्ट्रभाषा हेतु कैसे उपयुक्त है इसे रेखांकित करते हुए आचार्य सुकुल ने लिखा –“सिद्धांत रूप से इतना कहना पर्याप्त होगा कि ‘भाषा’ अधिक व्यापक ‘संज्ञा’ है , जिससे समान रूपवाली विविध ‘बोलियों’ के समूह का ज्ञान होता है – यानी प्रत्येक भाषा का संगठन बोलियों तथा उपबोलियों को लेकर ही होता है ।
समानरूपता के प्रधानतः तीन आधार होते हैं – शब्द भंडार , शब्द गुंथन और शब्दोचारण । जिन बोलियों में इन तीनों अंगों की उचित समानता दीख पड़ती है वे एक समूह के रूप में संगठित हो जाती हैं । इसी समूह को भाषा की संज्ञा दी जाती है । ”1 समय समय पर जब जैसी जरूरत होती हिन्दी के पक्ष में अपनी आवाज तर्कपूर्ण तरीके से उठाते रहते ।
इस आलेख में उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि आखिर हिन्दी ही राष्ट्रभाषा के उपयुक्त क्यों है –“इस समय सारी भारतीय भाषाओं में हिन्दी ही सबसे अधिक प्रगतिशील तथा युग –प्रवाह के साथ चलनेवाली मानी जाती है। आधुनिक संसार के बौद्धिक योगदान का जितना अंश हिन्दी के कोश में आ चुका है उतना अभी तक अन्य किसी भी भारतीय भाषा को प्राप्त नहीं हुआ । 2”
समाज और साहित्य में चर्चित विभिन्न विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ थी । विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में उनके 100 से भी अधिक आलेख बिखरे पड़े हैं। हिन्दी,हिंदुस्तानी और अंग्रेजी के मुद्दे पर उन्होंने काफी लिखा है। समय समय पर होनेवाले विभिन्न हिन्दी सम्मेलनों के गिरते स्तर से वे काफी चिंतित थे ।
हिन्दी के नाम पर हिन्दी का भला न कर अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास करनेवालों से वे काफी क्षुब्ध रहते थे –“ हिन्दी आज केवल हिन्दी भाषा –भाषियों की ही नहीं , भारतीय राष्ट्र की पवित्र वाणी है । ………….. इने गिने गुमराह स्वार्थ – लोलुप व्यक्ति अपनी नासमझी में उसकी नींव कमजोर न करने पावें इसी में राष्ट्र का कल्याण है । यह भूलना न होगा कि यदि विवेकी जन इस समय अपना कर्तव्य भूल गये , वांछित दृढ़ता खो बैठे और कहीं दुर्भाग्य से इन नासमझों को खुलकर खेलने का मौका दे दिया गया तो यह गगनचुंबी प्रासाद एक बार गिरकर फिर बनाये न बनेगा । ”3
आचार्य सुकुल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । संस्कृति और परंपरा कि समझ पूर्वजों से विरासत में मिली थी । पूर्वजों से प्राप्त उच्च संस्कारों के कारण बगैर किसी लाग – लपेट के सच बोलने से तनिक भी हिचकते नहीं थे । साहित्यिक एवं सामाजिक मुद्दों से रूबरू होते हुए उन्होंने कई उत्कृष्ट निबंध भी लिखे, जिसमें – ‘जाहि कहौ हित आपना, सोई बैरी होय’ , ‘यश अपयश विधि हाथ’ , ‘दिल ये कहता है जरा और तमाशा देखें’ , ‘तुम्हीं ने दर्द दिया अब तुम्हीं दवा दोगे’ , ‘तुम न अच्छा कर सके यह भी बहुत अच्छा हुआ,’ ‘इनको खुदा कहूँ के खुदा को खुदा कहूँ ’, ‘कसौटी पर हिन्दी साहित्य’, ‘हिन्दी और बंगला का साहित्यिक आदान –प्रदान’, ‘नई तुला पर हिन्दी साहित्य’, ‘मानवता कब हँसी और कब रोई’, ‘राष्ट्र निर्माण में हिन्दी साहित्य’, ‘भारतीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी की शिक्षा’ इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।
आज कोलकाता के साथ-ही-साथ पूरे पश्चिम बंगाल में हिन्दी की जो आभा व्याप्त है , आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल उसकी नींव की ईंट हैं । उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण सभी उनका सम्मान करते थे । अपनी बात को दृढ़ता , विनम्रता एवं स्पष्टता के साथ रखने में उन्हें महारत हासिल थी । उनकी इच्छा थी कि कलकत्ता में एक विशुद्ध साहित्यिक संस्था की स्थापना की जाय ।
इस उद्देश्य से 09 सितम्बर 1945 को आचार्य सुकुल की अध्यक्षता में प्रो० कल्याणमल लोढ़ा , आचार्य अंबिका प्रसाद वाजपेयी , श्री मोहन सिंह सेंगर इत्यादि की गरिमामयी उपस्थिती में सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज , कलकत्ता के सभागार में आयोजित एक सभा में सर्वसम्मति से ‘बंगीय हिन्दी परिषद’ की स्थापना का निर्णय लिया गया । सबके सहयोग से 08.10.1947 को परिषद का पंजीकरण भी हो गया ।
कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक के रूप में हिन्दी से जुड़े विभिन्न आवश्यक मुद्दों को सुकुल जी समय – समय पर उठाते रहे ।इसकी वजह से इन्हें काफी कष्ट भी उठाने पड़े । निष्काम भाव से निरंतर वे अपना कार्य करते रहे । प्रो० कल्याणमल लोढ़ा ने इनकी इसी जीवटता को रेखांकित करते हुए लिखा है –“जीवन उनके लिए एक संघर्ष और चुनौती रहा । परिस्थितियाँ कभी उनके अनुकूल नहीं रहीं और न उन्हें अनुकूल बनाने में उन्होंने अपना निश्चित और निर्धारित मार्ग ही छोड़ा । कलकत्ता आने के कुछ समय बाद वे जीवन में अकेले पड़ गए ।
विश्वविद्यालय के भीतर और बाहर हिन्दी की गौरव रक्षा के हेतु , अधिकारियों के असंतोष की परवाह न करके , उन्हें निरंतर संघर्ष करना पड़ता था । वे थे जो अकेले ही लड़ते गए , जूझते गए । रवीन्द्र की उक्ति को रवीन्द्र के ही प्रदेश में चरितार्थ कर दिया – “ यदि तोर डाक सुने केऊ ना आसे तबे एकला चलो रे – एकला चलो रे ” और अकेले ही चलकर वे अपनी मंजिल पर पहुँच गए।
बंगाल में उनके आने के पूर्व हिन्दी क्या थी और पीछे क्या हो गई – यही इसका प्रमाण है। हिन्दी के लिए उन्होंने क्या नहीं किया । एक दृढ़ प्रतिज्ञ वीर सेनानी की भांति वे आजीवन उसके गौरव के प्रहरी रहे । बंगाल में, हिन्दी के नाम पर फैले हुए कूड़ा – करकट को दूर करने में , उन्होंने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया ।”4
वैसे तो 1919( हिन्दी साहित्य :बंगीय भूमिका – कृष्णबिहारी मिश्र के अनुसार ) में ही कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर स्तर पर हिन्दी साहित्य के अध्यापन का शुभारंभ हो चुका था परंतु लंबे समय तक हिन्दी विभाग को उसका अपेक्षित सम्मान प्राप्त न हो सका था । उस समय हिन्दी , मॉडर्न इंडियन लैड्ग्वेजेज के अंतर्गत थी । अपनी नियुक्ति के आरंभिक दिनों से ही आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल निरंतर यह प्रयास करते रहे कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी को उसका अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो।
बहुत कम लोगों को पता है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी को स्वतंत्र विभाग का दर्जा मिले इसके लिए उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में देश – भर के हिन्दी प्रेमी लोगों का उन्हें अभूतपूर्व साथ मिला परंतु न जाने किन कारणों से कुछ अपनों का ही साथ न मिलने की वजह से अपने जीवन काल में वे विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग को स्वतंत्र विभाग के रूप में न देख सके । हिन्दी के मुद्दे पर इन्होंने कभी समझौता नहीं किया।
इनके शिष्य श्रीनारायण पाण्डेय (भूतपूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग, बर्दवान विश्वविद्यालय) से बातचीत के क्रम में यह ज्ञात हुआ कि “कलकत्ता में हिन्दी सेवा के प्रति आचार्य सुकुल का इतना समर्पण था कि बहुत सारे प्रलोभनों को त्यागकर भी सदा के लिए यहीं रुक गए ।“ विद्यार्थियों के लिए वे नारियल के समान थे । आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए अपने एक संस्मरण में लिखा है –“एम.ए. में सफलता प्राप्त करने के बाद मैं उन्हें प्रणाम करने गया।
अत्यंत स्नेहपूर्वक उन्होनें मेरा स्वागत किया और पीठ ठोकतें हुए कहा , “अब आप मास्टर ऑफ आर्ट्स हो गए हैं , इस मास्टर शब्द का अर्थ समझ लीजिए । विद्या के क्षेत्र में मास्टर का अर्थ स्वामी ……. अधिकारी नहीं होता । उन बच्चों को मास्टर कहा जाता है न , जो अपने पैरों चलने-फिरने लगते हैं ।” ………… सौभाग्य से मैं शीघ्र ही प्राध्यापक भी बन गया । पुनः प्रणाम करने गया । इस बार उनका स्नेह प्रगाढ़तर था । अपने विद्यार्थी कि उन्नति से आचार्य को आंतरिक प्रसन्नता थी।”05
सुकुल जी चाहते तो अधिकारियों की हाँ में हाँ मिलाते हुए अपने विश्वविद्यालय की नौकरी आराम से कर सकते थे परंतु ऐसा कर वे हिन्दी का मार्ग अवरुद्ध नहीं करना चाहते थे । इनके निरंतर प्रयासों का ही यह नतीजा था कि 1953 के प्रारम्भ से ही कलकत्ता का हिन्दी साहित्य प्रेमी समाज कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्वतंत्र हिन्दी विभाग के प्रति अपनी निरंतर प्रतिबद्धता जाहिर करने लगा ।
इसी वर्ष 11 मई 1953 को नवभारत टाइम्स, कलकत्ता में स्वतंत्र विभाग की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रो० कल्याणमल लोढ़ा का एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ जिसमें लिखा था – “कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के लेक्चरर श्री कल्याणमल लोढ़ा ने एक वक्तव्य द्वारा कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्वतंत्र हिन्दी विभाग स्थापित करने की मांग को अनुचित बताते हुए कहा है कि सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं का सम्मिलित विभाग रहने से साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में पारस्परिक आदान – प्रदान होगा ।”6
स्पष्ट है कि आचार्य सुकुल हिन्दी के स्वतंत्र विभाग की अपनी न्यायसंगत मांग के कारण जहां पहले से ही कुछ मुट्ठी भर हिन्दी विरोधी लोगों के निशाने पर थे वहीं प्रो० लोढ़ा के वक्तव्य ने उनलोगों को और भी उत्साहित कर दिया । मुट्ठी भर उन हिन्दी विरोधियों को तब और भी बल मिला जब 15 जुलाई 1953 के नवभारत टाइम्स, कलकत्ता में श्री सत्येंद्र का एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के लिए अलग विभाग की मांग को वे उचित नहीं समझते।
सत्येंद्र जी अभी हाल ही में रीडर ( हिन्दी ) पद पर कलकत्ता विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए थे। अतः उनके इस वक्तव्य से हिन्दी विभाग को स्वतंत्र विभाग के रूप में स्थापित करने की मांग को काफी झटका लगा। इन तथ्यों को और भी गंभीरता पूर्वक समझने के लिए मैंने 1953 के नवभारत टाइम्स, कलकत्ता के पुराने अंकों को ढूँढना शुरू किया। नवभारत टाइम्स, कलकत्ता के 16 जुलाई 1953 के अंक में प्रो० ललिता प्रसाद सुकुल द्वारा लिखित “राष्ट्रभाषा का विशेष स्थान : द्रव्य के अभाव का रोना बेकार” शीर्षक एक आलेख मिला जिसमें उन्होंने कहा है – “नवभारत टाइम्स के गत 15 जुलाई के अंक में प्रकाशित हिन्दी के नव नियुक्त रीडर , श्री सत्येंद्र जी के वक्तव्य की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट हुआ।
श्री सत्येंद्र विश्वविद्यालय में हिन्दी सेवा का व्रत लेकर नए उत्साह और नवीन चेतना के साथ पधारे हैं, इनका स्वागत है । मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हिन्दी के अनुभवी और उत्साही सेवक होते हुए भी परिस्थिति को भलीभांति समझे बिना ही उन्होंने घोषणा की कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए अलग विभाग की मांग को वे उचित नहीं समझते। ऐसा वक्तव्य ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे जिम्मेदार एवं प्रतिष्ठित पत्र में प्रकाशित न होता तो, मैं शायद इस पर विश्वास भी न करता। अब भी विश्वास करने की इच्छा नहीं होती है कि सत्येंद्र के ऐसे विचार हो सकते हैं ।”7
इस आलेख में सुकुल जी ने हिन्दी के स्वतंत्र विभाग की अपनी मांग के औचित्य को स्पष्ट करते हुए श्री सत्येंद्र के बयान से प्राप्त दु:ख की चर्चा भी की है। श्री सत्येंद्र के इस वक्तव्य के पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के स्वतंत्र विभाग के पक्ष और विपक्ष में बहुत सारी बातें होने लगी । आचार्य सुकुल ने हिन्दी के पक्ष में जो माहौल बनाया था वह अब विवादों मे पड़कर बिगड़ने लगा ।
इसके बावजूद वे हार नहीं माने । इनके अदम्य उत्साह को तब और भी बल मिला जब पश्चिम बंगाल के साथ-ही-साथ सम्पूर्ण भारत के अधिकांश हिन्दी प्रेमी बुद्धिजीवियों का भी नैतिक समर्थन इन्हें मिलने लगा। नवभारत टाइम्स, कलकत्ता ने 27.07.1953 के अंक में इस मुद्दे पर सुप्रसिद्ध आलोचक गुलाब राय की टिप्पणी प्रकाशित की थी जो इस प्रकार है -” कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी का स्वतंत्र विभाग तथा स्वतंत्र बोर्ड स्थापित करने कि मांग का औचित्य स्वीकार करते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक तथा आगरे से प्रकाशित ‘साहित्य-संदेश के संपादक श्री गुलाब राय ने लिखा है कि सभी स्थानों में जहां हिन्दी का स्वतंत्र स्थान नहीं है, इसके स्वतंत्र करने का व्यापक उद्योग करना चाहिए ।
…………… श्री ललिता प्रसाद सुकुल ने यूनिवर्सिटी की स्थिति पर जो प्रकाश डाला है , उससे स्वतंत्र विभाग और स्वतंत्र बोर्ड की मांग का पुरजोर समर्थन होता है । उसके स्वतंत्र न होने में जो कठिनाइयाँ उन्होंने दिखाई हैं, वे वास्तविक हैं । मेरी निजी राय अवश्य हिन्दी के स्वतंत्र विभाग के होने के पक्ष में है ।”8
डॉ धीरेन्द्र वर्मा , आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी , डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र जैसे विद्वानों ने भी कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के स्वतंत्र विभाग की मांग का समर्थन करते हुए आचार्य सुकुल की मांग का समर्थन किया था । सुकुल जी का पूरा जीवन ही संघर्षपूर्ण रहा । 1925 में नलिनी देवी से इनका विवाह हुआ परंतु 1935 में ही क्रूर काल ने इनसे नलिनी देवी को छीन लिया । इनकी कोई संतान नहीं थी । युवा अवस्था में ही विधुर होने के पश्चात भी इन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया ।
आजकल ग्रेटर नोएडा में रह रहे आचार्य सुकुल के नाती श्री मनोज शुक्ल (सुपुत्र गंगाधर शुक्ल)से फोन पर बातचीत के दौरान जब मैंने इस संबंध में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि “अपने भाइयों के बच्चों को ही वे अपने बच्चों कि तरह मानते थे । अक्सर छुट्टियों में वे जयपुर व रायबरेली आया करते थे । मुझे इतना याद है कि वे जब भी आते मेरे लिए टॉफी जरूर लाते ।” पत्नी की असामयिक मृत्यु के पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय एवं बंगीय हिन्दी परिषद के माध्यम से हिन्दी की सेवा को ही इन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था ।
हिन्दी के मुद्दे पर वे किसी से भी भिड़ जाते थे । इनके इसी स्वभाव का वर्णन करते हुए प्रो० विष्णुकांत शास्त्री ने लिखा है – ” हिन्दी के प्रश्न पर बड़ों – बड़ों से भिड़ गये और छोटों के प्रति सदैव वत्सल रहे ।”9 मुझे लगता है हिन्दी के लिए इनका संघर्ष उसी प्रकार का था जैसा मीरा का कृष्ण के लिए । सुकुल जी अक्सर गुनगुनाया करते थे –
” कबिरा आप ठगाइए , और न ठगिये कोय ।
आप ठगे सुख होत है , और ठगे दुख होय ।”
इनके संघर्षपूर्ण जीवन का उल्लेख करते हुए प्रो० कल्याणमल लोढ़ा ने लिखा है – “किसी भी विपरीत परिस्थिति में उनकी स्फूर्ति और तेजस्विता कम नहीं हुई । हारे वे कभी नहीं । कर्तव्य के लिए ही कर्तव्य करना उनका धर्म था – वे उसे निभाते गए । “10 हिन्दी के इस मौन साधक को जो श्रेय मिलना चाहिए था वह आज तक नहीं मिला क्योंकि उन्होंने अपना पूरा ध्यान हिन्दी के विकास पर ही केन्द्रित रखा । आत्मप्रचार से सदैव दूर रहे।
कठिन परिस्थितियों में भी वे हिन्दी सेवा के व्रत से कभी पीछे नहीं हटे। यहाँ तक कि “जब फंड कि कमी के कारण विश्वविद्यालय ने 600 रु का ग्रेड देने में अपनी असमर्थता व्यक्त की तो सुकुलजी ने उसी वेतन को स्वीकार कर अपनी सेवाएँ जारी रखीं । प्रतिमास 200 रु के वेतन पर उन्होंने 20 वर्षों तक कार्य किया ।”11
जीवन के अंतिम दिनों में सुकुल जी काफी अस्वस्थ हो गए थे ।उन्हें कैंसर हो गया था । कलकत्ता में काफी इलाज हुआ लेकिन उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार न होने कि वजह से 09 मई 1959 को उनके भतीजे गंगाधर शुक्ल उन्हें बेहतर चिकित्सा हेतु कलकत्ता से जयपुर ले गए । जयपुर में भी उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ ।
आखिर 25 मई 1959 को जयपुर में पोलोविकटरी टाकीज़ के नजदीक स्थित अपने भतीजे के आवास पर ही सुकुल जी ने अंतिम सांस ली । कैंसर से लड़ते हुए हिन्दी का यह अप्रतिम योद्धा परलोकवासी हो गया । अपने अध्यापकीय दायित्वों के प्रति वे इतने सचेत थे कि शायद ही कभी छुट्टी लेते थे। मृत्यु के पश्चात भी उनकी लगभग 15 महीने की छुट्टी बाकी थी ।
सुकुल जी के मरणोपरांत जब प्रो० कल्याणमल लोढ़ा को विभाग की ज़िम्मेदारी दी गई उसके बाद इन्होंने हिन्दी के स्वतंत्र विभाग कि मांग (1960 में) की और कलकत्ता विश्वविद्यालय की सीनेट ने सर्वसम्मति से हिन्दी का स्वतंत्र विभाग स्थापित कर दिया । आचार्य सुकुल के निःस्वार्थ भाव से किए गए प्रयासों के फलस्वरूप ही 1960 तक आते-आते ऐसी स्थिति बनी कि कलकत्ता विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग एक स्वतंत्र विभाग के रूप में स्थापित हो सका ।
आज पश्चिम बंगाल में हिन्दी कि जो इमारत खड़ी है , आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल उसकी नींव की ईंट हैं । हिन्दी के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा के कारण इन्हें जिस प्रकार के कष्ट झेलने पड़े उसे निम्नलिखित पंक्तियों से समझा जा सकता है –
” तन्हा तन्हा दु;ख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गायेँगे
जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनायेंगे । ” 12

संदर्भ :

01.ललिता प्रसाद सुकुल-हिन्दी ही क्यों ?, विशाल भारत , अंक – अप्रैल 1944
02.ललिता प्रसाद सुकुल-हिन्दी ही क्यों ?, विशाल भारत , अंक – अप्रैल 1944
03.ललिता प्रसाद सुकुल- अजल कहते हैं उस लहमे को जब दिल को करार आए (संकलित – इन से), संस्करण-नवम्बर 1957,हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय , वाराणसी , पृ.55
04.प्रो० कल्याणमल लोढ़ा – निकटता के वे क्षण , संकलित – जनभारती , संपादक – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र, वर्ष – 07 , अंक 2 एवं 3 , संवत 2016, बंगीय हिन्दी परिषद , कोलकाता , पृ० 34-35
05.प्रो० विष्णुकांत शास्त्री- वंदना के स्वरों में एक स्वर मेरा मिला दो , संकलित – जनभारती , संपादक – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र, वर्ष – 07 , अंक 2 एवं 3 , संवत 2016, बंगीय हिन्दी परिषद , कोलकाता , पृ० 54
06.नवभारत टाइम्स, कलकत्ता , 11 मई 1953
07.प्रो० ललिता प्रसाद सुकुल- राष्ट्रभाषा का विशेष स्थान : द्रव्य के अभाव का रोना बेकार, नवभारत टाइम्स, कलकत्ता , 16 जुलाई 1953
08.नवभारत टाइम्स, कलकत्ता , 27 जुलाई 1953
09.प्रो० विष्णुकांत शास्त्री- वंदना के स्वरों में एक स्वर मेरा मिला दो , संकलित – जनभारती , संपादक – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र, वर्ष – 07 , अंक 2 एवं 3 , संवत 2016, बंगीय हिन्दी परिषद , कोलकाता , पृ० 54
10.प्रो० कल्याणमल लोढ़ा – निकटता के वे क्षण , संकलित – जनभारती , संपादक – डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र, वर्ष – 07 , अंक 2 एवं 3 , संवत 2016, बंगीय हिन्दी परिषद , कोलकाता , पृ० 35
11.डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी – आचार्य ललिता प्रसाद सुकुल(संकलित – विचार- विहग) श्री बड़ाबाजर कुमारसभा पुस्तकालय, कोलकाता , प्रथम संस्करण 2019, पृ.12
12.निदा फ़ाज़ली- सफर में धूप तो होगी , संपादक – शीन काफ़ निज़ाम/ नंदकिशोर आचार्य, संस्करण 2000 , वाग्देवी प्रकाशन , बीकानेर , पृ० 39
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