डीपी सिंह की रचनाएं

मत घबराओ, दूर अँधेरे होते हैं
हर रजनी के बाद सवेरे होते हैं

जब भास्कर का भास भुवन पर छाता है
वह रथ पर आरूढ़ गगन में आता है
नीड़ पुनः गुञ्जित होते हैं कलरव से
अल्प समय के तम के फेरे होते हैं

मत घबराओ, दूर अँधेरे होते हैं
हर रजनी के बाद सवेरे होते हैं

हरदम दीप जलाये रखना आशा के
अपने दूर न हों अपनी परिभाषा से
रातों के घनघोर तिमिर में अक्सर ही
कुछ मायावी जाल बिखेरे होते हैं

मत घबराओ, दूर अँधेरे होते हैं
हर रजनी के बाद सवेरे होते हैं

हार नहीं माना करते हैं कष्टों से
राहों में रोड़े अटकाते भ्रष्टों से
सूर्य नहीं थमता है चाहे कुछ भी हो
मेघ-कुहासे उसको घेरे होते हैं

मत घबराओ, दूर अँधेरे होते हैं
हर रजनी के बाद सवेरे होते हैं

–डीपी सिंह

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