विकास लापता सुरक्षा घायल ( व्यंग्य-कथा ) : डॉ लोक सेतिया

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डॉ. लोक सेतिया, स्वतंत्र लेखक और चिंतक

जहां कहीं भी हो देश की व्यवस्था को तुम्हारी तलाश है। खोजने वाले को ईनाम दस गुणा बढ़ा देने का वादा किया है विकास बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है उनको जिनसे विकास का मधुर संबंध कितने साल से रहा है। उनको बेमौत मार दिया दिल तोड़ दिया उनकी वफाओं का ये कैसा सिला दिया है। जिसकी उम्मीद नहीं होती वही दिल के टुकड़े टुकड़े करता है तो मुश्किल होती है कैसे बताएं किस किस को कैसे समझाएं कि हमारी किसी से कैसी मुहब्बत रही है।

बदनाम खुद भी होना पड़ता है अपने आशिक़ की बेवफ़ाई की दास्तां सुनाने में बंद दरवाज़े की राज़ की बात होने लगी है ज़माने में। दिल का क्या हाल हुआ दिल लगाने में किसी को अपना बनाने किसी के भाग जाने में , लोग डूब गए हैं गंगा नहाने में। गंगा मैली हुई और भी पाप धोने धुलवाने में बस इतना ही फर्क है पास आने दूर जाने में।

इधर मामला संगीन है बहुत लोग देशभक्ति और धर्म की अपनी परिभाषा मानते हैं मनवाते हैं। उनका कुतर्क है सत्ता से सवाल मत करो सत्ता और उनके तथाकथित भगवान को झूठ बोलने का अधिकार है इतना ही नहीं उसका झूठ भी बड़े काम का है उस के झूठ को दुनिया सच मानती है और अब देश को उनका झूठ ही बचा सकता है जितवा सकता है। ये वही लोग हैं जो नोटेबंदी में परेशान थे कैसे अपने ही पैसे को अपना बताकर अपना धंधा या कोई भी काम करें मगर ऐसे लोगों को सत्यमेव जयते या सत्य ही ईश्वर है जैसे शब्द दीवार पर लिखने को होते हैं

वास्तव में आचरण करने को नहीं। देशभक्ति धर्म ईमानदारी उनके लिए बड़ी बड़ी अच्छी लगने वाली ऐसी बातें हैं जिनका पालन वो कभी नहीं करते हैं कोई उनको आईना नहीं दिखला सकता है। ये समझदार लोग उनको नासमझ बतलाते हैं जो देश की मौजूदा हालत पर सत्ता और सरकार से सवाल करते हैं उनका विचार है कि सवाल विपक्ष से किये जाने चाहिएं और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य से शिक्षा की खराब दशा का इल्ज़ाम पहले की सरकारों के सर जाना चाहिए।

विकास विकास की रट लगाते विनाश को घर बुलाते रहे , अपराधी दाग़ी नेताओं को सत्ता पाने को अपना हमजोली बनाते रहे उनको निर्दोष साबित करने से लेकर मुकदमे वापस लेने तक सब बेशर्मी से करते रहे। जिस व्यक्ति पर खुद कितने आपराधिक मुकदमें दर्ज थे उसी को राज्य का मुखिया बनाते रहे जो सत्ता मिलते ही हज़ारों को मुकदमे वापस लेने की राहत देने का फ़रमान सुनाते रहे। अपराधी दनदनाते रहे और लोग उनके गीत गाते रहे झूमते नाचते गुनगुनाते रहे ज़ख़्म खाते रहे मुस्कुराते रहे।

विकास उनको धोखा देकर उनको उन्हीं की बिछी बिसात पर पटखनी देकर उनकी आंखों में धूल झौंककर गायब हो गया है तब समझ आया घर का भेदी लंका ढाये और बोये पेड़ बबूल के आम कहां से खाय। इक विकास ने कितनों को नंगा कर दिया है ये सत्ता का हम्माम है जिस में सभी नंगे हैं। विकास की बात ख़त्म नहीं होने वाली है अभी चलती रहेगी और विकास को सरकार सुरक्षा बल ढूंढते रहेंगे जैसे देश की जनता अच्छे दिनों को ढूंढती फिरती है। आखिर में इक ग़ज़ल से विषय को अल्पविराम देते हैं विराम देना मुमकिन नहीं है।

 

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