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वरिष्ठ चित्रकार आर.एस. शाक्या के 24 चित्रों की प्रदर्शनी का हुआ शुभारंभ

चित्रों में प्रकृति के विविध रंगों और आयामों की अभिव्यक्ति है – हरिओम
(शाक्या के चित्रों में वास्तविक और अतियथार्थवादी भाव)

लखनऊ। लखनऊ उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार आर एस शाक्या के चित्रों की प्रदर्शनी शीर्षक “ट्रान्सेंडैंटल नेचर (Transcendental Nature)” शुक्रवार को लखनऊ में लगाई गई। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन शुक्रवार, 29 सितम्बर, 2023 को सायं 5:00 बजे सराका आर्ट गैलरी, होटल लेबुआ, माल एवेन्यू में मुख्य अतिथि हरी ओम (प्रिंसिपल सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर, उत्तर प्रदेश सरकार) के द्वारा किया गया। इस कला प्रदर्शनी की क्यूरेटर वंदना सहगल,कोऑर्डिनेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना हैं। प्रख्यात भारतीय चित्रकार आर.एस. शाक्या स्व-शिक्षित कलाकार हैं और उन्होंने चित्रकला के क्षेत्र में एक नाम कमाया है। उन्हें विभिन्न माध्यमों में काम करने में अच्छा लगता आता है, लेकिन वह ज़्यादातर कैनवास पर तैल माध्यम में चित्रण के पक्षधर हैं। समसामयिक भारतीय कला की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति ‘पत्तियों’ को अपने हस्ताक्षर के रूप में जोड़ लेगा। उनकी तकनीक सुसंगत है और माध्यम पर वर्षों के काम और नियंत्रण का प्रमाण है।9823e749-ef00-4cfd-b8d0-2d88e2e81809

प्रदर्शनी की क्यूरेटर वास्तुविद, अकादमिक, कलाकार डॉ. वंदना सहगल लिखती हैं कि तैल माध्यम में काम करते समय उनकी तकनीक अनोखी है। वह मोनोटोन रंग पैलेट में धुंधली प्रतिबिंब बनाने के लिए रंग लगाने और फिर उसके कुछ हिस्सों को तेल के साथ कैनवास से हटाने के नियम का पालन करते हैं। यह प्रतिबिंब पैमाने और परिप्रेक्ष्य की सभी नियमित धारणा को अस्वीकार करता है। उनका कैनवास प्रचुर मात्रा में ‘पत्तियों’ का है, कभी-कभी छोटी, कभी-कभी बड़ी जो आकाश, ज़मीन और बीच में व्याप्त हो जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि एक से अधिक लुप्त बिंदु हैं जो आंख को विभिन्न बिंदुओं पर कैनवास के अंदर यात्रा कराते हैं और आंख के स्तर को कैनवास के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में लगातार घुमाते हुए बदलते हैं, जिससे अनुभव चंचल हो जाता है।

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इन पत्तों के भीतर रखी गई एक मानवीय वस्तु उस पैमाने को चुनौती देती है और व्यक्ति दृश्य की विशालता में खुद को खो देता है। पैमाने और अस्पष्ट लुप्त बिंदुओं का यह द्वंद्व अवास्तविक और तीव्र लेकिन ‘पत्तियों’ के यथार्थवाद का एहसास देता है, और उनकी पुनरावृत्ति उनके कैनवास को शांत, उदास और शांतिपूर्ण बनाती है। शाक्या के चित्रों पर टिप्पणी करना कठिन है क्योंकि उनके चित्र आरामदायक तो हैं ही, साथ ही वे दिलचस्प भी हैं। रंग पैलेट की एकरसता सुखदायक और शांतिपूर्ण है लेकिन कैनवास में दृश्य गहराई दर्शकों को इसमें आकर्षित करती है। ऐसा उनके काम में ज्यामिति के खेल के कारण होता है, जो एक ही समय में अनुभव को यथार्थवादी, अतियथार्थवादी और सुखद बनाता है।

एक से अधिक लुप्त बिंदु हैं जो आंख को कैनवास के अंदर विभिन्न बिंदुओं पर यात्रा करवाते हैं, जिससे आंख का स्तर लगातार बदलता रहता है जिससे कैनवास के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की ओर उड़ता रहता है। इसके अलावा, आंखें कैनवास पर मौजूद अंधेरे छिद्रों की ओर भी जाती हैं, जो सामान्य लुप्त बिंदुओं से भिन्न होते हैं, जिससे अनुभव विरोधाभासी हो जाता है। अन्य उल्लेखनीय पहलू ‘पत्तियों’ का पैमाना है, जो ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज तल में समान हैं, जो इसे आइसोमेट्रिक सिद्धांत के अनुसार परिपूर्ण बनाता है। फिर भी, जब कोई पूरी पेंटिंग को देखता है, तो कोई किनारा नहीं होता है जो ज़मीनी सतह को ऊर्ध्वाधर सतह से अलग करता हो। पैमाने का खेल भी अपने आप में विरोधाभासी है।60b1ccd0-42af-42cc-a27c-91c2b1adb12a

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‘पत्तियाँ’ अपने विवरण से ध्यान आकर्षित करती हैं। उनके भीतर जो मानवीय वस्तु रखी गई है, वह उसी पैमाने को चुनौती देती है और व्यक्ति दृश्य की विशालता में खुद को खो देता है। पैमाने और अस्पष्ट लुप्त बिंदुओं का यह द्वंद्व देखने वाले को अतियथार्थवाद की भावना देता है लेकिन पत्तियों का यथार्थवाद इसे एक सुखद अनुभव बनाता है। इंद्रियों का यह द्वंद्व शाक्य के कार्य को सरल, फिर भी गहन बनाता है; चंचल, फिर भी उदास; शांतिपूर्ण, फिर भी गहन है। प्रदर्शनी के कोऑर्डिनेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया यह प्रदर्शनी 20 अक्तूबर 2023 तक कला प्रेमियों के लिए अवलोकनार्थ लगी रहेंगी। इस प्रदर्शनी में तैल माध्यम में बनी कुल 24 कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया है। नवनीत सहगल, अजेश जायसवाल, जयंत कृष्णा,धीरज यादव, राकेश मौर्या, रत्नप्रिया कांत समेत काफी संख्या में कलाकार, कलाप्रेमी उपस्थित रहे।351d09e1-1381-44c1-8899-e70c4716ff34

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