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डॉ. लोक सेतिया, स्वतंत्र लेखक और चिंतक

आपने सत्ता हासिल करने को लाख बार झूठ बोला झूठे सपने दिखलाये वोट पाने को जब भी जो भी किया। आपने संसद में गलत सही जानकारी दी भाषण में कोई सीमा कोई मर्यादा नहीं समझी तो भी हमने मान लिया अब देश की राजनीति में पतन की कोई हद नहीं है नैतिकता बची नहीं किसी भी राजनैतिक दल में।

आपने खूब मौज मस्ती की जनता के धन को बर्बाद किया अपने खास लोगों को मिलकर लूट की राह बनाने का काम किया। और निराशावादी बांटने की नफरत की विचारधारा और देश की सभी संस्थाओं की निष्पक्षता और परंपराओं को ताक पर रख समाज को ऐसी अंधी गली में धकेला जिसका कोई अंत नहीं नज़र आता।

मगर ये तो नहीं सोचा था कि कभी देश जब कोरोना जैसी आपदा से जीने मरने के कगार पर खड़ा होगा तब कोई भी सरकार गरीबों और बेबस लोगों की सहायता करने भी आधा झूठ आधा सच कहकर जनता से छल कर सकती है। दो महीने बाद भी मज़दूर सड़कों पर पैदल चलने को विवश हैं और आपके बीस लाख करोड़ की वास्तविकता कोई नहीं समझ सकता है कि ये भूखे लोगों की सहायता है या फिर इसमें भी लोगों को बदहाली में आटा गीला की तर्ज़ पर उधार लेने को बैंकों के भरोसे छोड़ने का काम किया है।

बैंक उनसे बदले में अगर कोई क़र्ज़ बढ़वाना चाहेगा तो गिरवी रखने को जो भी पास है ले लेंगे। जब कारोबार बंद हैं और मंदी की संभावना साफ दिखाई दे रही है क़र्ज़ लेना कितना सही है। अब ये कोई आपके बड़े बड़े अमीर उद्योगपति पहचान वाले भी नहीं जो विदेश भाग जाएंगे उनको तो जेल मिलेगी या कंगाली सब खोकर।

उस से बड़ा अपराध ये कि ऐसे में भी आपने अपने ख़ास लोगों के लिए सरकारी संस्थानों को बेचने या उन में एडीआई को बढ़ाने का काम किया है। ये कहने को भलाई जनता की मगर वास्तव में मलाई अपने लोगों को खिलाने बात है। आपदा में भी आपको ये ज़रूरी लगा ये कोई मेहरबानी नहीं है ये तो बर्बादी की तरफ जाना है।

नोट : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी व व्यक्तिगत हैं । इस आलेख में दी गई सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।

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