Nehru 1947

कोलकाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने देश की आजादी के 75वें वर्ष की गौरवमय पूर्ति और 76 वाँ स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इस वर्ष अपनी आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने की खुशी में देश 75 सप्ताह तक चलने वाला “आजादी का अमृत महोत्सव” मना रहा है, जिसका शुभारंभ विगत वर्ष ही 12 मार्च को “नमक सत्याग्रह” की 72 वें जयंती पर हो चुका है । इस वर्ष सरकार ने ‘भारतीय तिरंगा कोड’ में भी कुछ बदलाव कर ‘हर घर तिरंगा’ अभियान भी चलाया है । उम्मीद है कि भारत के हर घर में तिरंगा फहराया जाएगा, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक अविस्मरणीय मिसाल होगी ।

संभवतः आपको विदित होगा कि 1930 से लेकर 1947 तक ‘स्वतंत्रता दिवस’ प्रति वर्ष 26 जनवरी को ही मनाया जाता था, जिसका फैसला 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हुआ था । इसी अधिवेशन में ‘पूर्व स्वराज’ की भी घोषणा की गई थी । 1930 के दशक की भारतीय राजनीति द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की भागीदारी, कांग्रेस द्वारा असहयोग का फैसला और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा मुस्लिम राष्ट्रवाद की मांग जैसी घटनाओं से युक्त काफी उथल-पुथल की रही थी। फिर कांग्रेस-मुस्लिम लीग के बीच परस्पर राजनीति तनाव बढ़ता ही गया, जिसका अंत भारत के विभाजन से हुआ ।

द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1946 तक ब्रिटेन सरकार की आर्थिक दशा बहुत सोवहनीय हो चुकी थी । उन्हें समझ में आ गई थी कि न तो उन्हें घर में, या फिर बाहर से ही कोई समर्थन प्राप्त हो सकता है । ऐसे में आजादी के लिए भारतीय आंदोलन को दबा पाने की उनकी शक्ति भी कमजोर पड़ने लगी थी । अतः फ़रवरी 1947 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेण्ट रिचर्ड एट्ली ने घोषणा की, कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 में भारत को पूर्ण स्वराज्य प्रदान कर देगी ।

images - 2022-08-15T075450.878लेकिन नए-नए बने भारत के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख को और आगे बढ़ा दिया । उन्होंने सत्ता हस्तानन्तरण की तिथि 15 अगस्त, 1948 को निश्चित करते हुए भारतीय नेताओं से बात करना शुरू कर दिया । पेंच तब फंसा गया, जब जिन्ना अपने लिए अलग देश की मांग पर अड गए, जिसे लेकर नेहरू और जिन्ना के बीच रस्साकशी शुरू हो गई । दोनों के बीच उत्पन्न मतभेदों का असर देश के आम जनमानस पर भी पड़ता दिखाई दिया। देश के कई हिस्सों में साम्प्रदायिक झगड़े बढ़ने लगे। वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को लगा कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार बढ़ते विवाद के कारण अंतरिम सरकार का पतन हो सकता है।

परंतु देश में निरंतर बिगड़ती स्थिति को देख कर उन्होंने 15 अगस्त 1947 को ही सत्ता हस्तनान्तरण करने की बात निश्चित का दी । ब्रिटिश संसद ने ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ के अनुसार 15 अगस्त 1947 को ‘ब्रिटिश भारत’ को ‘भारत’ और ‘पाकिस्तान’ नामक दो नए स्वतंत्र उपनिवेशों में विभाजित किया जाना और नए देशों के संबंधित असेंबलियों को पूरा संवैधानिक अधिकार दिया जाना स्वीकार कर लिया । इस अधिनियम को 18 जुलाई 1947 को को शाही स्वीकृति भी मिल गई।

लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की आजादी के लिए 15 अगस्त 1947 की तारीख निश्चित कर दी थी । इसके पीछे भी एक ठोस कारण है । 15 अगस्त, 1945 के दिन ही द्वितीय विश्र्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश के सामने जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था । उस समय ब्रिटिश की सेना में लार्ड माउंटबैटन अलाइड फोर्सेज़ में कमांडर थे । इस कार्य का पूरा श्रेय माउंटबैटन को ही दिया गया था । जिसके चलते उन्होंने 15 अगस्त को अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा दिन मान लिया था । भारत की आजादी को भी 15 अगस्त के दिन प्रदान कर इस दिन को और ऐतिहासिक बना लेने की बात उन्होंने सोच रखी थी ।

images - 2022-08-15T075325.575हालांकि देश के ज्योतिषी इस तारीख को लेकर नाखुश थे । उनकी गणना के अनुसार 15 अगस्‍त 1947 का दिन अशुभ और अमंगलकारी था । ऐसे में इसका विरोध जताते हुए किसी और तारीख की मांग की गई । लेकिन माउंटबेटन अपनी व्यक्तिगत इच्छा से 15 अगस्‍त की तारीख पर ही अड़े रहे । ऐसे में बीच का रास्ता निकाला गया । ज्योतिषियों ने 14 और 15 अगस्‍त की मध्‍यरात्रि का समय सुझाया । ज्योतिषियों ने तर्क दिया कि अंग्रेजी परंपरा में रात 12 बजे के बाद नया दिन शुरू होता है।

जबकि हिंदी गणना के अनुसार सूर्योदय के साथ ही नए दिन का आरंभ होता है । साथ ही साथ उस दिन अभिजीत मुहूर्त रात्रि 11 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 15 मिनट तक के लिए मात्र 24 मिनट की अवधि का ही था । अतः सत्ता हस्तनान्तरण का कार्य इसी शुभ मुहूर्त में किया जाना निश्चित हुआ । वैसा ही किया भी गया था ।

भारत की संविधान सभा ने नई दिल्ली में संविधान हॉल में 14 अगस्त को रात्रि 11 बजे डॉo राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में पाँचवे सत्र की बैठक की । जैसे ही मध्‍यरात्रि की पवित्र घड़ी आई, भारत ने अपनी स्‍वतंत्रता प्राप्त की और विश्व मंच पर भारत एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र के रूप में अवतरित हो गया । 14 अगस्त की देर रात पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश के आजादी की घोषणा की । इस सत्र में जवाहर लाल नेहरू ने भारत की आजादी की घोषणा करते हुए ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ (नियति से वादा) नामक ऐतिहासिक भाषण भी दिया ।

उन्होंने भाषण में कहा था कि ‘आज रात 12 बजे जब पूरी दुनिया सो रही होगी, उस वक्त भारत एक आजाद जीवन के साथ नई शुरूआत कर रहा होगा । कई वर्षों पहले देश के भाग्य को बदलने की कोशिश शुरू हुई थी और अब वक्त आ गया है कि देश अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करे ।’

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फिर 15 अगस्त, 1947 की सुबह सूरज की स्वर्णिम किरणें देश भर में आजादी की स्वर्णिम आनंद-लहर लेकर आई थीं । पं० जवाहरलाल नेहरू की इच्छा के अनुरूप भारत की आजादी की पहली सुबह का शानदार स्वागत शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां ने अपने साथियों के साथ अपनी शहनाई की धुन के साथ किया था । सुबह 8. 30 बजे संविधान सभा ने भारत की स्‍वतंत्रता-समारोह को आरंभ किया, जिसमें अधिकारों का हस्‍तांतरण किया गया । पंo जवाहर लाल नेहरू प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में तथा वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन प्रथम गवर्नर जनरल के रूप में अपने-अपने पदभार को संभाले ।

सभा के सदस्यों ने औपचारिक रूप से देश की सेवा करने की शपथ ली । महिलाओं के एक समूह ने सभा को औपचारिक रूप से ‘राष्ट्रीय ध्वज’ भेंट किया । इसके बाद प्रधान मंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरु जी ने लाल किला पर ध्वजारोहण किया और उसकी बुलंद प्राचीर से देश को सम्बोधित किया था, जो एक परंपरा ही बन गई है और वह आज तक कायम है । तभी से 15 अगस्त को ‘भारतीय स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाये जाने की हमारी पवित्र राष्ट्रीय परंपरा रही है ।

आज भी देश के राष्ट्रपति स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर “राष्ट्र के नाम संबोधन” करते हैं । अगले ही दिन दिल्‍ली में लाल किले पर देश के प्रधान मंत्री द्वारा तिरंगा झंडा फहराया जाता है, जिसे 21 तोपों की सलामी दी जाती है । इसके बाद वहीं से प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं । देश के सभी राज्यों की राजधानी में उस राज्य के मुख्यमंत्री के द्वारा राष्ट्रीय झण्डा को फहराया जाता है । स्थानीय प्रशासन, जिला प्रशासन, नगरीय निकायों, पंचायतों आदि में भी इसी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम अपने उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को स्मरण करते हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व, यहाँ तक कि कइयों ने तो अपने प्राण तक को भी न्योछावर कर दिए थे । यह विशेष दिन देश के वीर सपूतों के प्रति हमारे सम्मान को प्रदर्शित करने, राष्ट्र के प्रति आपसी एकजुटता और निष्ठा दिखाने का दिन है । इसके साथ ही युवा पीढ़ी को आजादी के महत्व और देश के प्रति कर्तव्य को समझाने का भी दिन है ।

Sriram pukar Sharma
श्रीराम पुकार शर्मा

श्रीराम पुकार शर्मा,
अध्यापक, श्री जैन विद्यालय, (हावड़ा)

ई-मेल सूत्र – [email protected]

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