विनय सिंह बैस कि कविता : बुढ़ापे में…
बुढ़ापे में… विनय सिंह बैस जब बाल सफेद हो जाएंगे, कमर झुक जाएगी, आंखों पर
आदित्य त्रिपाठी की कविता : शाप से स्वीकृति तक
।।शाप से स्वीकृति तक।। आदित्य त्रिपाठी ऋषि वाल्मीकि के पृष्ठों से एक कथा पुरानी आती
आदित्य त्रिपाठी जी की कविता : पाषाण में प्राण
।।पाषाण में प्राण।। आदित्य त्रिपाठी जहाँ सभ्यता की धार खुद को ही काटने में लगी,
डॉ. विक्रम चौरसिया की कविता – राष्ट्र की रीढ़ का दर्द
।।राष्ट्र की रीढ़ का दर्द।। जागो युवाओं, बुलंद अपनी आवाज करो राष्ट्र की युवा शक्ति
डी.पी. सिंह की रचना : पार्थ को गाण्डीव कसना चाहिए
।।पार्थ को गाण्डीव कसना चाहिए।। सिद्धि को सपनों का पलना चाहिए सुप्त प्रतिभा को निखरना
अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता – निस्तब्धता के उस पार
“निस्तब्धता के उस पार…” अशोक वर्मा “हमदर्द” निस्तब्धता के उस पार जब चेतना स्वयं को
अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता : बेरोजगारी – एक जीवित नर्क
।।बेरोजगारी – एक जीवित नर्क।। अशोक वर्मा “हमदर्द” नर्क देखना है तो आग की लपटों
अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता : सजीव मूर्ति
।।सजीव मूर्ति।। अशोक वर्मा “हमदर्द” लोग पूजा करते हैं किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए,
अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता
न कोई खौफ अब शेष है, न अहंकार का कोई भार जिस दिन समझ लिया
प्रांजल वर्मा की कविता : सास कभी बुरी नहीं होती
।।सास कभी बुरी नहीं होती।। प्रांजल वर्मा सास कभी बुरी नहीं होती… वह बस उम्र
