कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में कभी हर दूसरी दीवार पर लिखा जाने वाला ‘बोनदुकर नोल-ए, खोमोतर उत्सा’ (सियासी सत्ता बंदूक की नली से निकलती है) नारा अब दिखाई नहीं पड़ता है। 1920 के दशके के माओत्से तुंग के नारे को भारत में मशहूर करने वाले चारू मजूमदार की मौत आज की तारीख को 50 साल पहले पुलिस हिरासत में हो गई थी। लेकिन उसकी यादें आज भी उन पीढ़ियों को डरा देती हैं, जिन्होंने उस दौर का खूनखराबा और हिंसा देखी है जो मजूमदार के नक्सलियों ने किया था।

चारू मजूमदार के 62 वर्षीय बेटे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (लिब्रेशन) के पश्चिम बंगार राज्य के महासचिव अभिजीत मुखर्जी ने साक्षात्कार में कहा, “ नक्सलबाड़ी आंदोलन के पीछे उनके विचार और विचारधारा, जो उत्तर बंगाल में बटाईदार अधिकारों की मांग करने वाला एक किसान आंदोलन था, आज भी प्रासंगिक है। किसानों का आंदोलन अब भी जीवित है।”

उन्होंने कहा, “ जी हां, हम संवैधानिक लोकतंत्र को बचाने पर अब ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि फासीवाद, सामंतों और बड़े कारोबारियों के गठजोड़ के खिलाफ लड़ाई में यह आज ज्यादा अहम है।” अभिजीत ने कहा कि मौजूदा फोकस चारू मजूमदार और मूल भाकपा (एमएल) के मूल उद्देश्यों का ही हिस्सा है। भाकपा (एमएल) की स्थापना वर्ष  1969 में हुई थी। मूल भाकपा (एमएल) कई धड़ों में बंट गई है जिसमें भाकपा एमएल (एल) सबसे बड़ा है और सक्रिय राजनीतिक पार्टी है।

भाकपा (एमएल) संवैधानिक लोकतंत्र में यकीन नहीं करता है और यह माकपा से बना है इसके कट्टरपंथियों ने संसदीय लोकतंत्र का अनुसरण करने के लिए पार्टी नेताओं पर बदलने का आरोप लगाया था और उन्हें निष्कासित कर दिया गया था। ये कट्टरपंथी लेनिन की जयंती पर 22 अप्रैल 1969 में कोलकाता में मिले और नई पार्टी का गठन किया। उत्तर बंगाल के दो नेताओं चारू मजूमदार और सरोज दत्ता ने नई पार्टी की अगुवाई की।

उत्तर बंगाल के एक कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर अभिजीत ने देखा था कि उनके पिता को पुलिस के मुर्दाघर से जल्दी से निकाल कर पुलिस और सीआरपीएफ कर्मियों की निगरानी में कोलकाता के केओराताला श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार कर दिया गया।  उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, “ भीमा-कोरोगांव आंदोलन में शामिल बुद्धिजीवियों पर ‘शहरी नक्सली’ होने का आरोप लगाना दिखाता है कि आंदोलन अब भी प्रासंगिक है।”

भाकपा एमएल (एल) के महासचिव दिपांकर भट्टाचार्य ने कहा “ हम चारू मजूमदार की विरासत को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन पहले ‘तेभागा’ बंटाईदार आंदोलन का नतीजा था जो चीन से नहीं आया था। हां (नक्सल आंदोलन में) कुछ गलतियां की गई हैं। तब का मशहूर नारा ‘चीन का अध्यक्ष, हमारा अध्यक्ष है’ गलत था। आंदोलन स्वदेशी था और किसानों, आदिवासियों और छात्रों के अधिकारों के लिए था।”

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