नीलांबर कोलकाता का वार्षिकोत्सव लिटरेरिया 2020 सफलातापूर्वक सम्पन्न

कोलकाता : कोलकाता की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था नीलांबर का वार्षिकोत्सव लिटरेरिया 14 से 20 दिसंबर 2020 के बीच आयोजित हुआ। इस वार्षिकोत्सव का मुख्य उद्देश्य है— साहित्यकारों, नाटककारों, कलाकारों एवं संस्कृतिकर्मियों को एक मंच पर इकट्ठा करना। एक अखिल भारतीय साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश का निर्माण करना। साहित्य-कला और जनता के बीच की दूरी को कम करना। हिंदी प्रदेश की रचनात्मक भूमि को अधिक उर्वर और सरस बनाना। नीलांबर अपने शुरुआती दौर से ही साहित्य में नए प्रयोग एवं आधुनिक तकनीक के समावेश से साहित्य और कला को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रयासरत रहा है। इसी प्रयास की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है— लिटरेरिया 2020। इस बार लिटरेरिया का केन्द्रीय थीम था—साहित्य का अंचल। विषय का निर्धारण हिंदी के चर्चित कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशताब्दी वर्ष को ध्यान में रखकर किया गया था।

कार्यक्रम शुरू होने के पहले अपनी परंपरानुसार नीलांबर ने इस वर्ष दिवंगत हुए साहित्यकारों-कलाकारों को याद किया। इसी क्रम में मंगलेश डबराल की कविता तानाशाह पर एक वीडियो मोंताज प्रस्तुत किया गया। इसकी आवृत्ति ऋतेश कुमार ने की। लिटरेरिया 2020 की शुरुआत नीलांबर के संरक्षक मृत्युंजय कुमार सिंह, अध्यक्ष यतीश कुमार और सचिव ऋतेश कुमार द्वारा दीप प्रज्वलन से हुई। पहले दिन के कार्यक्रम की शुरुआत मृत्युंजय कुमार सिंह के लोकगीत और रेणु जी की कहानी पर आधारित फिल्म संवादिया के टीजर से हुई। इस सत्र का संचालन चर्चित युवा कवि विमलेश त्रिपाठी ने किया। इस दिन के सेमिनार सत्र की शुरुआत रेणु के बेटों पद्म पराग राय वेणु और दक्षिणेश्वर रेणु के वक्तव्य से हुई। इसके बाद कथा आलोचक वीरेन्द्र यादव, इतिहासकार पद्मनाभ समरेन्द्र और युवा आलोचक वेद रमण ने सेमिनार के पहले सत्र देश की बात वाया रेणु विषय पर अपनी बात रखी। वीरेन्द्र यादव ने रेणु को प्रेमचंद की परंपरा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचनाकार कहा। उन्होंने मैला आँचल में जाति और जमीन के प्रश्न को महत्त्वपूर्ण मानते हुए इस उपन्यास को स्वाधीन भारत का पहला राजनीतिक उपन्यास बताया।

वेद रमण ने मैला आँचल के मेरीगंज गांव के रूपक के सहारे देश के राष्ट्रीय, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव को स्पष्टता से रेखांकित किया। पद्मनाभ समरेंद्र ने हिंदी प्रदेश का जातिगत ढांचा और मैला आँचल विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने मैला आँचल पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विचार करते हुए कहा कि इस उपन्यास में जातियों में टकराव तो है पर कई अवसरों पर वे साथ हो कर भी काम करते हैं। एक जाति दूसरी जाति का शोषण करती ही है तो शोषित जाति शोषक जाति का प्रतिरोध भी करती है। कई जगह एक ही जाति के भीतर भी शोषण दिखता है। पद्मानाभ ने इस उपन्यास में चित्रित मेरीगंज के आधार पर कहा कि जाति-व्यवस्था के कारण शोषण तंत्र का निर्माण जरूर हुआ लेकिन शोषण-तंत्र के निर्माण के लिए जाति-व्यवस्था नहीं बनी थी। इस सत्र का संचालन कलकत्ते के युवा लेखक विनय कुमार मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन शैलेश गुप्ता ने किया।

कार्यक्रम के दूसरे दिन की शुरुआत कविता मोंताज किसान यात्रा की प्रस्तुति द्वारा हुई। यह मोंताज ममता पाण्डेय और हरिश्चंद्र पाण्डेय की कविताओं के अंश पर आधारित था। इस सत्र का संचालन नीलू पाण्डेय ने किया। सेमिनार के दूसरे सत्र देश की बात वाया रेणु में उत्तर औपनिवेशिक चिंतक हरीश त्रिवेदी, चर्चित कवि-कथाकार अनामिका और आलोचक संजीव कुमार ने शिरकत की। हरीश त्रिवेदी ने कहा कि उत्तर औपनिवेशिक विमर्श का जो रूप पश्चिम में रहा वही भारत में नहीं रहा। उन्होंने मैला आँचल को हिंदी का पहला उत्तर औपनिवेशिक उपन्यास कहा और अपने सुसंगत तर्कों से उसे पुष्ट किया। हिंदी की चर्चित कवि-कथाकार अनामिका ने रेणु की कथा भाषा पर बात करते हुए कहा कि उनकी भाषा ‘स्त्री-भाषा’ के करीब है। भाषा संबंधी सिद्धांतों की चर्चा करते हुए उन्होंने रेणु के कथा साहित्य और लेखन की चर्चा की। ‘आलोचना’ के संपादक संजीव कुमार ने राष्ट्रवाद को एक बनती-बिगड़ती सतत प्रक्रिया बताते हुए मैला आँचल की नई व्याख्या करने की कोशिश की। इस सत्र का संचालन करते हुए युवा आलोचक योगेश तिवारी ने लिटरेरिया को हिंदी का इन्द्रधनुष कहा। धन्यवाद ज्ञापन पूजा पाठक ने दिया।

लिटरेरिया के तीसरे दिन प्रभात मिलिंद, वाजदा खान, व्योमेश शुक्ल, उपासना झा और गौरव भारती ने अपनी कविताएँ पढ़ीं। इस सत्र का संचालन आनन्द गुप्ता ने किया। इस दिन के संवाद सत्र में कविता का अंचल विषय पर संवाद करते हुए वरिष्ठ कवि सवाई सिंह शेखावत ने हिंदी कविता में राजस्थानी अंचल की विशिष्टता बताई। युवा कवि संदीप तिवारी ने कहा कि लोकचेतना से सम्पन्न कवि के यहाँ अंचल किसी रोमानी रूप में नहीं, बल्कि अपने अंतर्विरोधों और संघर्षों के साथ समग्र रूप से प्रकट होता है। उन्होंने अवधी अंचल से जुड़े कवियों की भाषा और शैली पर बात करते हुए उसे वहाँ के जन-जीवन के बहुत निकट माना। इस सत्र का संचालन करते हुए युवा आलोचक आशीष मिश्र ने कहा कि हिंदी कविता में अंचल बहुत आत्ममुग्ध और तनावहीन लगता है। यह उच्चवर्णी पुरुषों का विमर्श है, जिसे दलित और स्त्रियाँ याद भी नहीं करना चाहतीं। धन्यवाद ज्ञापन पूनम सोनछात्रा ने दिया।

लिटरेरिया के चौथे दिन के कविता सत्र में कवियों ने इन्द्रधनुषी छटा बिखेरी। इस सत्र में शामिल कवि थे—प्रयाग शुक्ल, नील कमल, रंजना मिश्र, मृत्युंजय और रूपम मिश्र। सत्र का संचालन स्मिता गोयल ने किया। इस दिन के संवाद सत्र में देहाती दुनिया की कथाएँ विषय पर अपनी बात रखते हुए सुपरिचित कथाकार वन्दना राग ने कहा कि आंचलिकता बनाम आधुनिकता आज के संदर्भ में बहुत मौजूं मेटाफर है। आज जब दुनिया एक प्राकृतिक आपदा से साझे हथियार, साझी सोच और साझी रणनीति से जूझ रही है तब कथा साहित्य भी एक साझा अर्थ अख्तियार कर रही है। आलोचक अरूण होता ने कहा कि उन्नीसवीं शताब्दी में आंचलिक उपन्यास एक आंदोलन के रूप में उभरा था। आजाद भारत में हिंदी साहित्य में इसे रेणु ने प्रतिष्ठित किया। युवा कथाकार मनोज पाण्डेय ने कहा कि आँचलिक चेतना के संदर्भ में ज्यादातर लोगों का सोचना यह है कि चरित्रों के सुख-दुख और जीवन का बयान या बखान करते समय उन चरित्रों की भाषा और लोकल के चित्रण पर अतिरिक्त रूप से ध्यान दिया जाय। ऐसी स्थिति में लोकल अपनी स्थानीय रंगत में रचा जाता है और ऐसा करते हुए स्थानीय भाषा और ध्वनियों के साथ साथ स्वाद, रंग और गंध का भी विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। आँचलिक चेतना की इस रूप में व्याप्ति के सबसे बड़े उदाहरण रेणु हैं। उनके समूचे कथा साहित्य को एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। रेणु के यहाँ पूर्णिया जैसे खुद ही अपनी कहानी कहने लगती है। इस सत्र का संचालन जगन्नाथ दूबे ने किया। धन्यवाद ज्ञापन रचना शरण ने दिया।

लिटरेरिया के पांचवें दिन की शुरुआत विमलेश त्रिपाठी के लोकगीत गायन से हुई। दूसरे भाग में कविता कुंभ का आयोजन हुआ जिसमें नीलेश रघुवंशी, महादेव टोप्पो, विवेक चतुर्वेदी, अनुपम सिंह और प्रमिता भौमिक ने शिरकत की। इसका संचालन अनिला राखेचा ने किया। इसके बाद पंजूराम बरेठ द्वारा छत्तीसगढ़ की चर्चित लोक गायिकी बाँसगीत की प्रस्तुति हुई। इस अंश का संचालन करते हुए पीयूष कुमार ने बाँसगीत का विस्तृत परिचय दिया। इस दिन के संवाद सत्र में परती परिकथाओं की स्त्रियाँ विषय पर बोलते हुए अमिताभ राय ने कहा कि विमर्शों के हिंदी में चर्चा होने के पहले ही रेणु का महत्त्वपूर्ण साहित्य रचा जा चुका था। इसलिए इसे और इस तरह के साहित्य को विमर्शों को खाके में लाने से एक अन्तर्विरोध निर्मित होता है। इन अंतर्विरोधों से समाज में गति आती है। उषा किरण खान ने रेणु की रचना परती परिकथा को पूर्वांचल के महाभारत की संज्ञा दी। उनके अनुसार उस कथा में वर्णित समस्याएं आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। नदियों का तांडव, विकास कार्य का जल-जंगल-जमीन पर कुप्रभाव अब भी दिख रहा है। उन्होंने नागार्जुन के उपन्यासों की भी चर्चा की। अपने उपन्यास फागुन की चर्चा करते हुए उन्होंने कई आंचलिक समस्याओं का जिक्र किया। रजनी पाण्डेय ने चार भिन्न आंदोलन से आई स्त्रियों की दशा और दिशा को दिखाते हुए स्त्री अस्मिता के विकास को रेखांकित किया। उन्होंने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यासों के माध्यम से हिन्दी प्रदेश के पहाड़ी अंचल को रेखांकित किया। इस सत्र का संचालन करते हुए रश्मि भारद्वाज ने कहा कि परती परिकथाओं वाले इस देश में एक परती मन की भी होती है। यह परती मन समाज और व्यवस्था की विषमताओं, अन्धविश्वासों, संसाधनों के असमान वितरण से बना है। इसका सबसे बड़ा शिकार स्त्रियां हैं। प्रेमचंद से लेकर फणीश्वरनाथ रेणु, नागार्जुन और वर्तमान में उषाकिरण खान, मैत्रेयी पुष्पा आदि तक के कथा साहित्य में उन स्त्रियों के शोषण और संघर्ष के सजीव चित्र मिलते हैं। धन्यवाद ज्ञापन सीमा शर्मा ने किया।

लिटरेरिया के छठे दिन के कार्यक्रम में लोक संस्कृति की झलक देखने को मिली। शुरुआत स्मिता गोयल द्वारा निर्मल वर्मा की चर्चित कहानी धूप का एक टुकड़ा के अभिनयात्मक पाठ से हुई। इस दिन का मुख्य आकर्षण प्रसिद्ध लोक गायिका चंदन तिवारी के द्वारा लोकगीत की प्रस्तुति थी। इस सत्र का संचालन आशा पाण्डेय और ऋतु तिवारी ने किया। संवाद सत्र कौन ठगवा नगरिया लूटल हो में बाज़ारवाद, भूमंडलीकरण और तीव्र औद्योगिकरण से प्रभावित होते गाँवों की स्थिति पर विस्तृत चर्चा करते हुए सुप्रतिष्ठित आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि आज हमारा राष्ट्र कॉर्पोरेट जगत के हाथ में बंधा है। कॉर्पोरेट का ‘कल्चर’ बड़ा ‘स्मार्ट’ और दायित्व वाला होता है लेकिन इनके भीतर के चक्रव्यूह को देखने की आवश्यकता है। राकेश बिहारी ने कहा कि भूमण्डलीकरण को अगर साहित्य में बांध दें तो उसे व्यापक रूप से नहीं समझ पाएंगे। उसके लिए हमें उसे आर्थिक- सामाजिक आधार पर देखना होगा। विकास की गति पीछे नहीं जा सकती पर विकास का रथ किस तरह सबके पास पहुंचे इस पर ध्यान देना होगा। युवा लेखक और ‘बनास जन’ के संपादक पल्लव ने कहा कि भूमंडलीकरण के बाद के जमाने में साहित्यकारों को हमारी संस्कृति को बचाए रखना एवं उसका प्रचार प्रसार करना होगा। संस्कृति का अर्थ है मनुष्य को मनुष्य बनाना। इस सत्र का संचालन विनय कुमार मिश्र ने किया। धन्यवाद ज्ञापन रौनक अफरोज ने किया।

लिटरेरिया के सातवें दिन संवाद सत्र में सोना माटी की मूरतों की दुनिया विषय पर संस्कृतकर्मी विद्या बिन्दु सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारा लोक अंचल की वैविधता को प्रसारित करता है। सांस्कृतिक विविधता के बावजूद भारत एक सूत्र में बंधा है। लेखक अपनी रचनाओं और फिल्मकार फिल्मों में जब लोक को लाता है तो उनमें ताजगी मिलती है। मनुष्य-मनुष्य में सौहार्द हमारी संस्कृति में मिलती है। गीली माटी का लचीलापन हमारी लोक संस्कृति में भी मिलता है। लोक संस्कृति का भदेसपन ही उसकी खासियत है। लोक छवियों और लोक आकृतियों को अपनी कूची से विशिष्ट पहचान देलेवाले चर्चित चित्रकार मुकेश बिजौले ने कहा कि लोक कला की आत्मा हमारे ग्राम में बसती है। रंग और रेखाएँ मुझे बचपन से आकर्षित करती रही हैं। साहित्य ने मुझे दिशा दी जो कि मनुष्य की बात करता है। मैंने जीते-जागते जीवन को अपने केनवास पर उतारा। रंग और रेखाओं के माध्यम से लोक को बृहद जनसमुदाय के सामने लाने की कोशिश की। कथाकार रणेन्द्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रकृति का विविध रूप आदिवासी लोक को रसमय बनाता है। आदिवासी समाज लोक का एक विस्तृत फलक है। इसी दुनिया के रहस्य को उजागर करते हुए संगीता गुन्देचा ने कहा कि लोक रंगमंच और शास्त्रीय रंगमंच का गहरा संबंध है। उन्होंने नाचा परम्परा पर विस्तृत चर्चा की। भोजपुरी लोक कवि प्रकाश उदय ने भोजपुरी लोक साहित्य और संस्कृति की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए कहा कि भोजपुरी संस्कृति दूसरी संस्कृतियों से संवाद करती हुई संस्कृति है। उन्होंने भोजपुरी लेकगीतों के हवाले से राम सीता के मिलने और बिछुड़ने की अद्भुत व्याख्या की। सीता द्वारा बनाए भित्ति-चित्रों से प्रभावित होकर राम सीता से विवाह करते हैं। लंका से लौटने पर सीता द्वारा अपनी ननद के कहने पर रावण का चित्र बनाने पर राम सीता को अपने से दूर भेजते हैं। इस सत्र का संगीतमय संचालन भोजपुरी लोकगायक और कथाकार मृत्युंजय कुमार सिंह ने किया।

लिटरेरिया के समापन सत्र की शुरुआत हावड़ा नवज्योति टीम द्वारा समूह नृत्य की प्रस्तुति से हुई। तत्पश्चात सुप्रसिद्ध नृत्यांगना रश्मि बंदोपाध्याय द्वारा विद्यापति और जयदेव के गीतों पर आधारित भरतनाट्यम की प्रस्तुति की गई। इसके बाद प्रभाकर पांडेय और समूह द्वारा लोकगीतों की प्रस्तुति की गई। सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात संस्था द्वारा इस वर्ष के लिए घोषित रवि दवे सम्मान सुपरिचित नाट्य निर्देशक गौतम चटर्जी को एवं निनाद सम्मान पद्मश्री मधु मंसूर हंसमुख को सुप्रतिष्ठित कलाकार प्रबुद्ध बनर्जी के हाथों दिया गया। सम्मान पत्र का पाठ क्रमशः अल्पना नायक और निर्मला तोदी ने किया। इतु सिंह और पूनम सिंह ने शॉल और नारियल प्रदान करके सम्मानित अतिथियों का अभिनंदन किया। सत्र के अंत में प्रयोगशाला, पटना की टीम द्वारा रेणु की कहानी पर आधारित नाटक रसप्रिया की प्रस्तुति की गई। इसके निर्देशक थे राजीव रंजन। इस सत्र का संचालन नीलांबर की संस्कृति सचिव ममता पांडेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पूनम सिंह ने किया। कार्यक्रम के संयोजन में प्रियंकर पालीवाल, वेदरमण एवं आशीष मिश्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सात दिन तक फेसबुक के माध्यम से आयोजित इस कार्यक्रम में नीलांबर की तकनीकी टीम की अहम भूमिका रही। इस टीम में मनोज झा के नेतृत्व में विशाल पांडेय, अभिषेक पांडेय, दीपक कुमार, निधि पांडेय और मंटू कुमार शामिल थे। तकनीकी टीम के अथक प्रयास से ही कोरोना काल के इस दौर में भी लिटरेरिया का निर्विघ्न आयोजन संभव हो सका। सातों दिन के कार्यक्रम को फेसबुक के माध्यम से बहुत संख्या में दर्शकों ने देखा, सराहा एवं संवाद किया।

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