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जयंती विशेष… : “सतीत्व ही नारीत्व नहीं हो सकता है” – शरतचंद्र

श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। नारी सशक्तिकरण जनित इस प्रबल भावप्रधान कथन को आज से कोई सौ-सवा सौ वर्ष पहले ही विश्वविख्यात बांग्ला कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी विविध कृतियों में दृष्टांत स्वरूप परिभाषित करते हुए समाज की निगाह में पतिता, कुलटा, पीड़ित, दबी-कुचली और प्रताड़ित नारियों की पीड़ा को शब्द-स्वर प्रदान कर उनके प्रति घृणा नहीं, बल्कि प्रेमपूर्वक संवेदना व्यक्त किया और उन्हें यथोचित सामाजिक महत्व प्रदान करने की साहित्यिक प्रचेष्टा की।

19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में बंगाल सहित पूरे भारत में ‘विधवा नारी-हन्ता’ जनित “सती प्रथा” के विरोधात्मक सामाजिक पुनर्जागरण का जो स्वर एक विराट जन-आन्दोलन का स्वरूप धारण किया था, उसके प्रतिफलन में भारतीय समाज में नारी-उत्थान संबंधित विचार सुगबुगाने लगी थी, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय विविध साहित्यों पर भी पड़ने लगा था। नारी-मुक्ति आंदोलन सम्बन्धित स्त्री-शिक्षा, नारी-स्वाधीनता, उनके सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़े विभिन्न प्रश्नों को लेकर नयी प्रगतिशील विचारधारा के लेखकों का एक विशेष वर्ग तैयार होने लगा था,

उसी प्रगतिशील विचारधारा के अग्रदूत थे – बंगला भाषा के प्रसिद्ध लेखक ‘शरतचंद्र चट्टोपाध्याय’। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से स्त्रियों के परम्परागत सतीत्व और नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बजाय, वर्तमान परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को स्थापित करने के लिए उन्हें आवश्यक संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया था।

साहित्य, कला और सांस्कृतिक से सिंचित बंगाल की शस्य-श्यामल धरती पर हुगली जिला के देवानन्दपुर ग्राम में भुवनमोहिनी देवी और मोतीलाल चट्टोपाध्याय के आँगन में की नौवीं संतान के रूप में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का 15 सितंबर, 1876 को जन्म हुआ था। उनका बाल्यकाल देवानन्दपुर में, जबकि कैशोर्य ननिहाल आदमपुर, भागलपुर, वर्तमान बिहार में बिता था । इसी तरह से उनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी देवानन्दपुर में और परवर्तित शिक्षा भागलपुर में ही सम्पन्न हुई थी।

शरतचन्द्र स्वभाव से बहुत ही नटखट, पर कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। बचपन में अपने समवयस्क मामाओं और बाल सखाओं के साथ मिलकर बहुत शरारत किया करते थे, जिसका हृदयग्राही चित्रांकन उन्होंने अपनी रचनाओं में विविध बाल पात्रों की क्रिया-कलापों के रूप में किया है। तरुणाई में ही शरतचन्द्र में साहित्य रचना के प्रति अभिरुचि सुगबुगाने लगी थी। मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने “बासा” (घर) नाम से एक लघु उपन्यास लिख डाला, जो दुर्भाग्यवश प्रकाशित न हो पाया। सन् 1900 में उन्मुक्त विचार के स्वामी शरतचन्द्र परिजन से किसी बात पर नाराज होकर संन्यासी वेश धारण कर घर-संसार त्यागी भी बन गए थे, पर पिता की आकस्मात मृत्यु की खबर उन्हें वापस घर ले आई। इसी दौर में उनकी पहली कहानी ‘मंदिर’ प्रकाशित हुई थी।

बाद में शरतचंद्र अपने मामा लाल मोहन गंगोपाध्याय के पास कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) पहुँच गये, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय के विख्यात वकील थे। यहीं पर रह कर उन्होंने कई हिन्दी पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद करने का कार्य भी किया, जिसके बदले में उन्हें प्रतिमाह तीस रूपये मिलते थे। बाद में 1903 से लेकर 1916 तक उन्होंने रंगून (वर्तमान यांगून) सहित कई पूर्वी प्रान्तों में नौकरी करते हुए बिताया। परन्तु इस प्रवास और नौकरी काल में भी उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ पूर्वरत जारी ही रही थीं।

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शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने कल्पनावाद के झूठे-चमकीले धरातल को नहीं, बल्कि यथार्थवाद के ठोस धरातल को ग्रहण कर अपनी वृहद इच्छाशक्ति के साथ साहित्य रचना के क्षेत्र में उतरे थे, जो बंगला साहित्य के लिए लगभग नई वस्तु ही थी। उन्होंने जब लिखना शुरू किया और उनकी रचनाएँ छपने लगी, तो बंगाल के प्रबुद्ध लोगों ने उन्हें अपने ‘युगपुरुष’ के रूप में स्वीकार कर अपने सर-माथे पर बैठा लिया। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय से वे अब ‘शरत बाबू’ बन गए। उन्होंने अपनी विविध रचनाओं के द्वारा समाज में व्याप्त रूढ़ि परम्पपराओं और नारी के प्रति संकुचित भावनाओं पर कठोर प्रहार किया और अपने पाठकों को घिसी-पिटी लीक से हटाकर कुछ विशेष सोचने के लिए बाध्य किया।

शरत बाबू के प्रवास काल के दौरान ही सन् 1913 में कलकत्ता से प्रकाशित ‘यमुना’ पत्रिका के सम्पादक फणीन्द्रनाथ पाल ने उनके ‘बोडो दीदी’ का औपन्यासिक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित करवाया, जो शरत बाबू की प्रथम मुद्रित पुस्तक थी। उसकी तीन हजार से अधिक प्रतियाँ मात्र तीन महीने में ही बिक गई। यह ‘बोडो दीदी’ ने शरत बाबू को बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकारों की श्रेणी में प्रतिष्ठित कर दिया। हालाकि इसकी जानकारी उन्हें पाँच साल बाद प्रवास से लौटने पर मिली थी। सन् 1916 में शरतचन्द्र रंगून की अपनी नौकरी को त्याग कर हावड़ा के ‘बाजे शिवपुर’ में आकर बस गए और अपना प्रसिद्ध उपन्यास ‘श्रीकांत’ को पूरा किये।

यहीं पर रहते हुए उन्होंने ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’, ‘निष्कृति’, ‘पल्ली समाज’, ‘चंद्रनाथ’, ‘आरक्षणीय’, ‘पंडित मोशाय’, ‘दत्ता’, ‘गृहदाह’, ‘बमुनेर मेये’, ‘देना-पाओना’, ‘नब बिधान’ आदि कई प्रसिद्ध रचना की। यहीं पर उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन की विषय-वस्तु पर आधारित ‘पोथेर दाबी’ उपन्यास लिखा था। इसी बीच शरत बाबू ‘नोबल पुरुस्कार से सम्मानित विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर और लब्ध प्रतिष्ठित बंगला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी के भी स्नेह-भाजन बन चुके थे।

लगभग दस वर्षों तक हावड़ा के ‘बाजे शिवपुर’ में रहने के बाद शरत बाबू रूपनारायण नदी के किनारे बसा हुआ ‘सामता’ ग्राम में एक घर (शरत कुटीर) बनाकर रहने लगे। उनके द्वारा यहाँ रचित ‘बैकुंठेर बिल’, ‘मेजो दीदी’, ‘दर्पचूर्ण’, ‘अभागिनेर स्वर्गों’, ‘मामलार फल’, ‘अनुपमार प्रेम’, ‘सती’, ‘विप्रदास’, ‘शेष प्रसनों’, ‘शुभदा’, ‘शेषेर परिचय’ आदि रचनाओं में पास की बहती रूपनारायण की कल-कल करती धार के मधुर भाव-धारा प्रवाहित होती महसूस होती है। देखते ही देखते बहुत ही कम समय में ही उनके पचीसों उपन्यास, पचासों कहानियाँ, दर्जनों नाटक और निबंध प्रकाशित हो गए। उनकी अधिकांश कृतियों में गाँव के लोगों की जीवनशैली, उनके संघर्ष एवं उनके द्वारा झेले गए संकटों का ही चित्रण है। वास्तव में शरतचंद्र अपने नाम के अनुरूप ही ‘शरद’ का शीतल ‘चन्द्र’ बनकर अपनी साहित्यिक ‘चन्द्रिमा’ से बंगाल सहित भारतीय साहित्य जगत को मधुरिमा प्रदान करने लगे थे।

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शरत बाबू में नारियों के प्रति बहुत सम्मान-भाव थे। वे नारी हृदय के सच्चे पारख़ी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री के रहस्यमय चरित्र, उसकी कोमल भावनाओं, दमित इच्छाओं, अपूर्ण आशाओं, अतृप्त आकांक्षाओं, उसके छोटे-छोटे सपनों, मन की छोटी-बड़ी उलझनों और उसकी महत्त्वकांक्षाओं का जैसा सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक चित्रण-विश्लेषण किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ ही है। उनका मानना है कि – “सतीत्व ही नारीत्व नहीं हो सकता है। वह तो प्रेम, त्याग, ममता, स्नेह का प्रतीक है। उसे भी स्वतंत्र वातावरण में अपने मन के अनुकूल जीने का पूर्ण हक़ है। औरतों को हमने केवल औरत बनाकर ही रखा है, मनुष्य बनने ही नहीं दिया है।”

शरत बाबू की विशद साहित्यिक रचनाओं को देख-पढ़ कर मन में अवश्य ही शंका उत्पन्न होती है कि क्या यह वही शरतचंद्र हैं, जिन्हें समाज के कठोर तानों को सुनना पड़ा था, कुछ गरीबी में जीना पड़ा था, पूरी ज़िन्दगी समस्याओं से जूझना पड़ा था, जिसने बेपरवाही और निश्चिंतता से तंबाकू पीते हुए साधू बनकर सन्यासियों के साथ घूमते महीनों गुज़ार दिए? मगर हाँ! उन सारी परिस्थितियों से लड़कर, जूझकर भी शरत बाबू ने अपनी कलम को कभी न रुकने दिया और सदियों से शोषित नारी तथा विकास से कोसों दूर नीचे तबके के शोषित जनों के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते रहें।

विश्वास तो नहीं होता है, पर वास्तविकता तो यही है कि यह वही शरतचंद्र थे। इनका सम्पूर्ण साहित्य ही नारी के उत्थान से पतन और पतन से उत्थान की करुण गाथाओं से परिपूर्ण है। इनके साहित्य में नारी के लघुतम और महानतम दोनों रूपों के एक साथ दर्शन होते हैं, जिसे देख कर पाठक वर्ग कुछ समय के लिए सन्न रह जाते हैं। उनके इसी दुस्साहसिक चित्रण कार्य के लिए उन्हें कुछ तथाकथित सभ्य समाज से रोष का पात्र भी बनना पड़ा था। शायद यही वजह रही कि हिन्दी साहित्य के विशिष्ठ रचनाकार विष्णु प्रभाकर ने उन्हें ‘आवारा मसीहा’ की संज्ञा दे डाली।

शरत बाबू अकेले ऐसे भारतीय कथाकार हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फ़िल्में तथा अनेक धारावाहिक भी बने हैं। इनकी कृतियाँ ‘देना पावना’, ‘राजलक्ष्मी ओ श्रीकांत’, चंद्रनाथ’, ‘गृहदाह’, ‘बिराज बउ’, ‘सब्यासाची’, ‘मेजो दीदी’ (मँझली दीदी), ‘बिदूर छेले (छोटी बहु)’, ‘दत्ता’, ‘आलो छाया (आलो ओ छाया)’, ‘रामेर सूमोती’, ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकान्त’, ‘परिणीता’ आदि सफल फिल्में बनी हैं । जबकि ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’, दत्ता’ और ‘श्रीकान्त’ पर तो एक बार नहीं, बल्कि कई-कई बार कई भाषाओं में फिल्में बनी हैं। हर बार ये फिल्में अपनी सफलता के परचम भी लहराई हैं, जो लेखक के विचारों की प्रासंगिकता का बोध करता है।

शरत बाबू अर्थात शरतचंद्र चट्टोपाध्याय को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए समयानुसार ‘जगतारिणी गोल्ड मैडल’ (कलकाता विश्वविध्यालय), मानद डी. लिट्. (डाका विश्वविद्यालय), ‘कुंतोलिन पुरस्कार’ आदि से सम्मानित किया गया था। शरतचंद्र ही एकमात्र ऐसे बंगला साहित्यकार हैं, जिनकी सभी रचनाएँ हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित हुई हैं और वे आज भी बड़ी ही चाव से पढ़ी जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि सरलता और लोकप्रियता के मामले में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय बांग्ला भाषा के प्रख्यात साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से भी बहुत आगे निकल गए हैं।

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नारी को मुक्ति-मार्ग दिखाने वाले शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने 62 वर्ष की अवस्था में 16 जनवरी 1938 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में सर्वदा के लिए अपनी आँखें बंद कर ली। बचपन से ही स्वभाव से मस्त, फक्कड़ ‘आवारा’, परन्तु पीड़ित नारी के प्रति संवेदशील ‘मसीहा’ अर्थात ‘आवारा मसीहा’ बंगला साहित्य के शिरोमणि ‘शरतचंद्र चट्टोपाध्याय’ को उनकी गौरवशाली 146 वीं जयंती पर हम उन्हें नमन करते हैं।

Sriram pukar Sharma
श्रीराम पुकार शर्मा

श्रीराम पुकार शर्मा
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