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अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने इंटरस्टिशियल लेज़र थेरपी का इस्तेमाल करते हुए अजन्मे बच्चे को दिया नया जीवन

पूर्वी भारत में पहली बार हुई है इस तरह की घटना

कोलकाता। पूर्वी भारत में पहली बार, अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने डायोड लेज़र का इस्तेमाल करते हुए इंटरस्टिशियल लेज़र थेरपी द्वारा एक अजन्मे बच्चे को नया जीवन दिया है। इंटरस्टिशियल डायोड लेज़र थेरपी में बीमार जुड़वा के भीतर कुछ लेज़र बीम्स रिलीज़ करने के लिए एक महीन सुई को माँ के गर्भाशय में डाला जाता है, इस प्रोसेस में बीमार जुड़वा अपने स्वस्थ सह-जुड़वे को बचाने के लिए टर्मिनेट हो जाता है। इस प्रक्रिया को अल्ट्रा साउंड के लगातार समर्थन के साथ किया जाता है।

अधिक उम्र में माता-पिता बनने का निर्णय लेने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ चुकी है और इससे आईवीएफ की मात्रा भी बढ़ी है, साथ ही दुनिया भर में जुड़वा बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्तमान में हर पचास गर्भधारणों में से एक में जुड़वां बच्चे होते हैं और जुड़वां गर्भधारण हमेशा उच्च जोखिम वाले होते हैं।

सभी जुड़वां गर्भधारणों में, लगभग 66% डिकोरियोनिक होते हैं (2 अलग-अलग अंडों और शुक्राणुओं से बच्चे बनते हैं और उनमें गर्भाशय के अंदर अलग-अलग रक्त प्रवाह के साथ अलग-अलग कम्पार्टमेंट्स होते हैं) और 33% मोनोकोरियोनिक होते हैं (1 अंडे और 1 शुक्राणु से बच्चे बनते हैं और उनमें गर्भाशय के अंदर एकल रक्त प्रवाह के साथ समान कम्पार्टमेंट्स होते हैं)।

मोनोकोरियोनिक जुड़वा गर्भधारण में क्रॉस (चुनिंदा) इंट्रायूटेरिन वृद्धि प्रतिबंध यानी ट्विन-टू-ट्विन-ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम (टीटीटीएस) की संभावना काफी ज़्यादा होती है जो जुड़वा बच्चों में जन्म के पहले मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। आम तौर पर यह सिंड्रोम करीबन 10 से 15% मोनोकोरियोनिक जुड़वा गर्भधारणों में, दूसरी तिमाही में होता है और जुड़ावों में से एक बच्चा उम्मीद के मुताबिक और दूसरे की तुलना में नहीं बढ़ पाता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक ही प्लेसेंटा को साझा करने से जुड़वा बच्चों के बीच रक्त प्रवाह का असंतुलन हो जाता है, उनमें से एक भ्रूण तथाकथित दाता बन जाता है और दूसरा प्राप्तकर्ता। अगर इलाज न किए जाए, तो प्रसव के दौरान मृत्यु अपरिहार्य है, एक बच्चे की मृत्यु पोषण की कमी और दूसरे की अधिक पोषण के कारण होती है। पोषण की कमी के कारण यदि कमजोर बच्चे में कोई क्लॉट या हृदय रोग होता है, तो क्लॉट या हृदय संबंधी समस्या समान प्लेसेंटा के ज़रिए स्वस्थ बच्चे तक स्थानांतरित हो जाती है।

जिससे कमजोर बच्चे की मृत्यु के 72 घंटे के भीतर स्वस्थ बच्चे की भ्रूण के अंदर मृत्यु हो जाती है। इस मामले में, 14 सप्ताह की गर्भावस्था में माँ में इस समस्या का पता लग चूका था, जब गर्भ के अंदर उचित विकास सुनिश्चित करके दोनों बच्चों को बचाना असंभव था।

इंटरस्टिशियल लेज़र थेरेपी एकमात्र ऐसी प्रक्रिया है जो दो में से कम से कम एक बच्चे को बचा सकती है। एकल उपचार प्रक्रिया में, भ्रूण और प्लेसेंटा को देखने के लिए अल्ट्रा साउंड की मदद से, तकनीक दो बच्चों के बीच वाहिकाओं के कनेक्शन को अलग करती है। परिणामवश, कमजोर दाता बच्चे को पोषण मिलना बंद हो जाता है जबकि स्वस्थ बच्चा भ्रूण के अंदर बढ़ता रहता है।

अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स, कोलकाता के निदेशक और एचओडी, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डॉ जयंता कुमार गुप्ता ने कहा, “जन्म से पहले जुड़वा बच्चों में से एक को छोड़ना माता-पिता के लिए बहुत ही कठिन निर्णय है, लेकिन दूसरे बच्चे को बचाने का यही एकमात्र तरीका है, वरना दोनों बच्चों की जान जा सकती है। हमने यहां पूर्वी भारत में पहली बार अपोलो में इंटरस्टिशियल लेज़र थेरेपी की प्रक्रिया की ताकि हम कम से कम एक जुड़वा बच्चे को बचा सकें। उपचार को ट्विन-टू-ट्विन-ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम (टीटीटीएस) के मामले में लागू किया गया था, जो समान जुड़वा बच्चों के लिए अद्वितीय है, यह बच्चे एकल प्लेसेंटा द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं।

हमें उम्मीद है कि ट्विन-टू-ट्विन-ट्रांसफ्यूजन सिंड्रोम वाली अधिक गर्भवती महिलाओं पर यह इलाज कर पाएं ताकि गर्भाशय के भीतर विकास प्रतिबंध की इस स्थिति के कारण उन्हें अपने बच्चों को खोना न पड़ें। इसके लिए, गर्भावस्था के दौरान यूएसजी सहित नियमित जांच के माध्यम से समस्या का ज़ल्द से ज़ल्द पता लगाना महत्वपूर्ण है।”

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