IMG 20240313

न्याय की जीत- भारतीय स्टेट बैंक नें चुनावी बॉन्ड का डाटा चुनाव आयोग को सौंपा

सुप्रीम कोर्ट के एसबीआई को 24 घंटे के भीतर, चुनावी चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को सौंपने के आदेश का पालन हुआ
चुनाव आयोग की चुनावी बॉन्ड का डाटा 15 मार्च 2024 को शाम 5 बजे तक अपनी वेबसाइट पर पब्लिश करने की जिम्मेदारी पर दुनियां की नजर- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर भारतीय संवैधानिक संस्थाओं की कार्य प्रणाली की तारीफ अनेक देशों में की जाती है। विशेष रूप से भारतीय चुनाव आयोग, भारतीय न्याय प्रणाली जैसे कुछ संवैधानिक संस्थाएं दुनियां में ख्याति प्राप्त है। दिनांक 11 मार्च 2024 को इन्हीं दो संवैधानिक संस्थाओं की चर्चा पूरी दुनियां में हो पड़ी, जब माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय स्टेट बैंक की 6 मार्च की याचिका जिसमें चुनाव चुनावी बॉन्ड की विस्तृत जानकारी के लिए 30 जून 2024 तक समय बढ़ाने का अनुरोध किया था, इसको सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए, डाटा 24 घंटे के भीतर 12 मार्च 2024 को चुनाव आयोग को सौंपने के आदेश दिए और चुनाव आयोग को 15 मार्च 2024 को शाम 5 बजे तक डाटा को अपने वेबसाइट पर पब्लिश करने के आदेश दिए तो पूरी दुनिया की निगाहें भारतीय न्याय प्रणाली के अचूक निष्पक्ष निर्णय की ओर पड़ी और विश्वास का एक और अध्याय जुड़ गया। चूंकि एसबीआई द्वारा चुनावी बॉन्ड की पूरी जानकारी व डाटा चुनाव आयोग को आज 12 मार्च 2024 को सौंप दिया गया है, इसलिए आज हम मीडिया मेंउपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आलेख के माध्यम से चर्चा करेंगे, चुनाव आयोग की चुनावी बॉन्ड के डाटा 15 मार्च 2024 को शाम 5 बजे तक अपनी वेबसाइट पर पब्लिक करने की जिम्मेदारी पर दुनियां की नजर है।

साथियों बात अगर हम एसबीआई द्वारा 12 मार्च 2024 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन की करें तो, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने मंगलवार शाम को वर्किंग आवर खत्म होने से पहले भारतीय चुनाव आयोग को चुनावी बॉन्ड की तमाम डिटेल्स सौंप दी। अब आयोग को 15 मार्च की शाम पांच बजे तक बैंक द्वारा दी गई इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करना होगा। ताकि यह जानकारी आम हो सके। मामले में आयोग के एक अधिकारी ने मिडिया में बताया कि अभी इस पर काम किया जा रहा है। मीडिया में सूत्रों का कहना है कि एसबीआई की ओर से चुनावी बॉन्ड का जो विवरण आयोग को दिया गया है। वह काफी रॉ है। इसे वेबसाइट पर अपलोड करने के लायक बनाया जाएगा। तभी इसे अपलोड किया जाएगा।

हालांकि, आयोग की तरफ से केवल यही जानकारी दी गई कि एसबीआई ने चुनावी बॉण्ड का डेटा उन्हें सौंप दिया है। इसके अलावा आयोग की तरफ से आधिकारिक रूप से इस संबंध में कोई जानकारी शेयर नहीं की गई कि क्या आयोग इस डेटा को 15 मार्च की शाम पांच बजे तक ही अपनी वेबसाइट पर अपलोड करेगा या इससे पहले भी? इस मामले में 15 फरवरी और 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को चुनावी बॉन्ड की जानकारी 12 मार्च तक आयोग को सौंपने के आदेश दिए थे। आदेशों की ना फरमानी करने पर बैंक के उपर कोर्ट की अवहेलना का मामला बन सकता था। इस बात को देखते हुए बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार ही 12 मार्च की शाम कामकाजी समय समाप्त होने से पहले यह सारा डेटा आयोग को सौंप दिया। अब आगे आयोग का काम है कि वह 15 मार्च तक बैंक द्वारा दिए गए डेटा को अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दे।

यह भी पढ़ें:  गौरी श्योराण ने 25 मीटर स्पोर्टस पिस्टल टीम ईवेंट में जीता गोल्ड मेडल

साथियों बात अगर हम कानून के हाथ लंबे होने की कहावत की करें तो, इसकी पकड़ से कोई बच नहीं सकता। बॉलीवुड की हर कोर्ट रूम ड्रामा फिल्म में ये डायलॉग एक ना एक बार तो इस्तेमाल होता ही है, लेकिन इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में ये लोगों को लाइव देखने को मिला। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की ना-नुकुर के बावजूद अब उसने इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ा सारा डेटा चुनाव आयोग को सौंप दिया है। इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी को इसे असंवैधानिक करार दिया था। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 के तहत दिए गए सूचना के अधिकार का उल्लंघन माना गया। इसके बाद एसबीआई को इससे जुड़ा सारा डेटा 6 मार्च तक चुनाव आयोग को सौंपने के लिए कहा था, लेकिन इस काम में एसबीआई ने असमर्थता जाहिर की और सुप्रीम कोर्ट से 30 जून तक का एक्सटेंशन मांगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यहीं पर कड़ा रुख अपनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई की एक्सटेंशन याचिका पर 11 मार्च को सुनवाई की, मामले में कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि एसबीआई ने इस मामले में 11 मार्च तक क्या प्रोग्रेस की? इस पर कोई जवाब एसबीआई की ओर से नहीं दिया गया। डेटा के मिलान की बात एसबीआई ने की तो इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने डेटा के मिलान का आदेश तो दिया ही नहीं, बल्कि सिर्फ डेटा उपलब्ध कराने को कहा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एसबीआई को 12 मार्च की शाम तक का वक्त दिया, जिसके अनुरूप अब एसबीआई ने सारा डेटा चुनाव आयोग को सौंप दिया है। अगर एसबीआई ऐसा करने में विफल रहता तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उसे अवमानना की कार्रवाई का सामना करना पड़ता। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चुनाव आयोग के लिए भी कोई ढील नहीं छोड़ी है, उसे भी ये डेटा 15 मार्च 2024 की शाम 5 बजे तक सार्वजनिक करने के लिए कहा गया है।

साथियों बात अगर हम चुनावी बॉन्ड को गहराई से समझने की करें तो चुनावी बॉण्ड प्रणाली को वर्ष 2017 में एक वित्त विधेयक के माध्यम से पेश किया गया था। इसे वर्ष 2018 में लागू किया गय। वे दाता की गुमनामी बनाए रखते हुए पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान देने के लिये व्यक्तियों और संस्थाओं हेतु एक साधन के रूप में काम करते हैं। केवल वे राजनीतिक दल जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हैं, जिन्होंने पिछले आम चुनाव में लोकसभा या विधानसभा के लिये डाले गए वोटों में से कम से कम 1 प्रतिशत वोट हासिल किये हों, वे ही चुनावी बांड हासिल करने के पात्र हैं। वर्ष 2018 में इसके शुरू होने के बाद हर साल करीब दो बार इसको जारी किया जाता है। अक्टूबर माह के शुरू में 11वें इलेक्टोरल बॉन्ड (चुनावी बॉन्ड) जारी किए गए। शुरू में उन्हें लेकर जहां ठंडा रुख दिखा था, वहीं इस साल चुनावों से पहले तक उनकी अच्छी खरीद हुई। इलेक्टोरल बांड के जरिए अब तक 5851 करोड़ रुपये जुटाए जा चुके हैं।

यह भी पढ़ें:  हरियाणा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस लागू करेगी ओपीएस: दीपेंद्र हुड्डा

पिछले साल मई माह में 822 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बांड खरीदे गए। जनवरी से लेकर मई 2019 तक भारतीय स्टेट बैंक की विभिन्न शाखाओं के जरिये 4794 करोड़ रुपये के बांड खरीदे गए, जबकि इससे पहले 2018 में 1000 करोड़ रुपये की बांड खरीदी हुई थीं। चुनावी बांड योजना को अंग्रेजी में इलेक्टोरल बॉन्ड्स स्कीम नाम से जाना जाता है, ये भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से मिलते हैं। जिन 29 शाखाओं से बॉन्ड्स खरीदे जा सकते हैं, वे नई दिल्ली, गांधीनगर, चंडीगढ़, बेंगलुरु, हैदराबाद, भुवनेश्वर, भोपाल, मुंबई, जयपुर, लखनऊ, चेन्नई, कलकत्ता और गुवाहाटी समेत कई शहर में है। इसे कोई भी खरीद सकता है। इन बांड्स को भारत का कोई भी नागरिक, कंपनी या संस्था चुनावी चंदे के लिए खरीद सकती है। ये बांड एक हजार, दस हजार, एक लाख और एक करोड़ रुपये तक के हो सकते हैं। देश का कोई भी नागरिक किसी भी राजनैतिक पार्टी को चंदा देना चाहता है तो उसे एसबीआई से चुनावी बॉन्ड खरीदने होंगे। वो बॉन्ड खरीदकर किसी भी पार्टी को दे सकेगा।

सरकार की ओर से आरबीआई ये बांड्स जारी करता है। दान देने वाला बैंक से बांड खरीदकर किसी भी पार्टी को दे सकता है। फिर राजनीतिक पार्टी अपने खाते में बॉन्ड भुना सकेगी। बॉन्ड से पता नहीं चलेगा कि चंदा किसने दिया। ये बांड जब बैंक जारी करता है तो इसको लेने की अवधि 15 दिनों की होती है। चुनावी बांड खरीदकर किसी पार्टी को देने से बांड खरीदने वाले को कोई फायदा नहीं होगा, न ही इस पैसे का कोई रिटर्न है, ये अमाउंट पॉलिटिकल पार्टियों को दिए जाने वाले दान की तरह है। इससे 80जीजी 80जीजीबी के तहत इनकम टैक्स में छूट मिलती है। चुनावी बांड एक तरह की रसीद होती है। इसमें चंदा देने वाले का नाम नहीं होता, इस बांड को खरीदकर, आप जिस पार्टी को चंदा देना चाहते हैं, उसका नाम लिखते हैं। इस बांड का पैसा संबंधित राजनीतिक दल को मिल जाता है। इस बांड पर कोई रिटर्न नहीं मिलता। अलबत्ता हम इस बांड को बैंक को वापस कर सकते हैं और अपना पैसा वापस ले सकते हैं लेकिन उसकी एक अवधि तय होती है।

साथियों बात अगर हम चुनावी बॉन्ड की चुनौतियों की करें तो चुनावी बांड राजनीतिक दलों को दी जाने वाली दान राशि है जो दानदाताओं और प्राप्तकर्ताओं की पहचान को गुमनाम रखती है। वे जानने के अधिकार से समझौता कर सकते हैं,जो संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। दानदाता के डेटा तक सरकारी पहुँच के चलते गुमनामी से समझौता किया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि सत्ता में मौजूद सरकार इस जानकारी का लाभ उठा सकती है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बाधित कर सकता है, घोर पूंजीवाद और काले धन के उपयोग का खतरा, घोर पूंजीवाद एक आर्थिक प्रणाली है जो व्यापारियों और सरकारी अधिकारियों के बीच घनिष्ठ, पारस्परिक रूप से लाभप्रद संबंधों की ओर बढ़ाती है। कॉरपोरेट संस्थाओं के लिये पारदर्शिता और दान सीमा के संबंध में कई खामियां हैं। कंपनी अधिनियम 2013 के अनुसार, कोई कंपनी तभी राजनीतिक योगदान दे सकती है जब उसका पिछले तीन वित्तीय वर्षों का शुद्ध औसत लाभ 7.5 प्रतिशत हो। लेकिन ये धारा हटा दी गई है, जिससे शेल कंपनियों के ज़रिये राजनीतिक फंडिंग में काले धन के योगदान को लेकर चिंता बढ़ गई है।

यह भी पढ़ें:  दुनिया में प्रचलित न्याय की देवी के प्रतीक में भारतीय बदलाव की पहल- आंखों की पट्टी ख़ोल हाथ में संविधान दिया
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी : संकलनकर्ता, लेखक, कवि, स्तंभकार, चिंतक, कानून लेखक, कर विशेषज्ञ

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि न्याय की जीत- भारतीय स्टेट बैंक ने चुनावी बॉन्ड का डाटा चुनाव आयोग को सौंपा। सुप्रीम कोर्ट के एसबीआई को 24 घंटे के भीतर चुनावी चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को सौंपने के आदेश का पालन हुआ। चुनाव आयोग की चुनावी बॉन्ड का डाटा 15 मार्च 2024 को शाम 5 बजे तक अपनी वेबसाइट पर पब्लिश करने की जिम्मेदारी पर दुनियां की नजर।

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए आंकड़े/विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च करफॉलो करें।

Kolkata News Desk Avatar

Kolkata News Desk

News Editor MA

कोलकाता और पश्चिम बंगाल की ब्रेकिंग न्यूज, स्थानीय घटनाओं, खेल, राजनीति और सामाजिक मुद्दों की खबरों को कवर करता है। हमारी डेस्क टीम 24×7 सक्रिय रहकर पाठकों को ताज़ा और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराती है।

Areas of Expertise: Sports, Politics & West Bengal
Fact Checked & Editorial Guidelines

Our Fact Checking Process

We prioritize accuracy and integrity in our content. Here's how we maintain high standards:

  1. Expert Review: All articles are reviewed by subject matter experts.
  2. Source Validation: Information is backed by credible, up-to-date sources.
  3. Transparency: We clearly cite references and disclose potential conflicts.
Reviewed by: Subject Matter Experts

Our Review Board

Our content is carefully reviewed by experienced professionals to ensure accuracy and relevance.

  • Qualified Experts: Each article is assessed by specialists with field-specific knowledge.
  • Up-to-date Insights: We incorporate the latest research, trends, and standards.
  • Commitment to Quality: Reviewers ensure clarity, correctness, and completeness.

Look for the expert-reviewed label to read content you can trust.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

three × two =