Special Story : विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर बिहार का नालंदा

राजीव कुमार झा, बिहार : नालंदा की पहली यात्रा पर जाने का मौका मुझे पंद्रह-सोलह साल पहले मिला था। यहाँ के प्राचीन महाविहार के खंडहर नालंदा रेलवे स्टेशन से दो किमी. दूर स्थित है। यहाँ बिहारशरीफ – गया रोड से नालंदा के खंडहर तक जाने के लिए आज भी तांगेवाले यात्रियों, पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की बाट जोहते दिखायी देते हैं।

हमारे देश में नालंदा प्राचीन बौद्ध स्थल के रूप में प्रसिद्ध है और यहाँ के गुप्तकालीन महाविहार के जीर्ण शीर्ण अवशेष के बारे में कहा जाता है कि यह 12वीं शताब्दी तक संसार में महान शिक्षा केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध था और यहाँ चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया के अलावा कोरिया और अन्य एशियाई देशों से छात्रगण अध्ययन के लिए आया करते थे।

यह भी कहा जाता है कि सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा पर आने वाले चीन के यात्री ह्वेनसांग ने यहाँ रहकर इस महाविहार के विशाल और समृद्ध पुस्तकालय में अध्ययन अनुवाद का कार्य किया था।नालंदा के खंडहर को यूनेस्को ने विश्व दाय स्मारक (विश्व धरोहर) यानी वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में शामिल किया है। यहाँ प्राचीन महाविहार के खंडहर कई विस्तृत परिसरों में फैले हैं और इसमें स्थित भवन जिनकी पहचान अध्ययन कक्ष, मंदिर, प्रार्थना कक्ष, छात्रावास और पाकशाला – भोजनालय के रूप में की जाती है। इनमें से ज्यादातर की छतें अब धराशायी हो गई है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा नालंदा महाविहार के जीर्णावशेषों के संरक्षण के कार्य यहाँ अक्सर संपन्न होते दिखायी देते हैं। नालंदा बिहार में पटना से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और पटना – मोकामा रेलमार्ग पर बख्तियारपुर से यहाँ आने के लिए ट्रेन मिलती है। इसके अलावा पटना – दिल्ली से यहाँ के लिए सीधी रेलसेवा भी उपलब्ध है। बिहारशरीफ और राजगीर इन दोनों शहरों को नालंदा का पड़ोसी नगर कहा जा सकता है।

राजगीर और नालंदा ये दोनों प्राचीन नगर हैं और नालंदा को गौतम बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्य सारिपुत्त की जन्मभूमि भी कहा जाता है। उनकी स्मृति में यहाँ मौर्य सम्राट अशोक के द्वारा स्तूप की स्थापना की गयी थी। अशोक बौद्धधर्म को स्वीकार करने के बाद अपने राज्यारोहण के 12 वें वर्ष में जब धम्मयात्रा पर रवाना हुआ था तो इस दौरान वह नालंदा भी आया था। उसके शिलालेखों में इस बात की चर्चा है।

हावड़ा से भी नालंदा के लिए ट्रेन सेवा उपलब्ध है। बनारस से राजगीर आने वाली बुद्ध पूर्णिमा एक्सप्रेस भी नालंदा होकर गुजरती है और यहाँ इसका ठहराव भी है। राजगीर – तिलैया रेलमार्ग से गया से भी नालंदा सीधे आया जा सकता है।

नालंदा हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की सुंदर कथा है। यहाँ इस महाविहार की स्थापना का श्रेय गुप्त सम्राट कुमारगुप्त को दिया जाता है। इसे हर्षवर्द्धन ने भी कई गाँवों की भूमि अनुदान में प्रदान किया था। नालंदा में पाल वंश के राजाओं के अभिलेख भी मिले हैं। इस राजवंश के राजाओं ने भी नालंदा की देखरेख में योगदान किया था। 12वीं शताब्दी में तुर्क आक्रमण और विध्वंश से नालंदा का पतन हो गया।

भारत सरकार के द्वारा प्राचीन नालंदा महाविहार के खंडहर के पास नवनालंदा महाविहार की स्थापना की गयी है। यह एक डीम्ड विश्वविद्यालय है और यहाँ संस्कृत, हिंदी, अँग्रेजी, पालि और प्राकृत के अलावा बौद्ध – जैन धर्म दर्शन की उच्च शिक्षा दी जाती है। बिहार सरकार ने भी यहाँ नालंदा ओपेन यूनिवर्सिटी को स्थापित किया है। यहाँ सैनिक स्कूल भी है। यह एक छोटा सा रमणिक नगर है और यहाँ के बाग बगीचे तालाब और नीले आकाश के नीचे विस्तीर्ण शांति सुषमा सबके मन को आनंद से भर देती है।

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