मंगल और मंगली दोष कारण एवं निवारण, जानें सब कुछ यहां

पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री, वाराणसी । मंगल एवं मंगली दोष का कारण एवं निवारण क्या है? जाने सब कुछ इस लेख में।

मंगल कि उत्पत्ति कैसे हुई?
शास्त्रों में मंगल ग्रह कि उत्पत्ति शिव से मानी गई हैं। मंगल को पृथ्वी का पुत्र माना गया हैं। मंगल की उत्पत्ति भारत के मध्यप्रदेश के उज्जैन में मानी गई हैं।

जैसे मंगल का रंग लाल या सिंदूर के रंगके समान हैं। इस लिये भगवान गणेश को भी सिंदूर चढाया जाता हैं। इसलिये गणेशजी को मंगलनाथ या मंगलमूर्ति भी कहाजाता हैं।

मंगल कुमार को गणेशजी नें मंगलवार के दिन दर्शन देकर उनहे मंगल ग्रह होने का वरदान दिया था इसके कारण ही भगवान गणेश को मंगल मूर्ति कहा जाता हैं और मंगलवार के दिन मंगलमूर्ति गणेश का पूजन किया जाता हैं।

विद्वानो ने देवी महाकाली जी का पूजन भी मंगलवार को श्रेष्ठ फल देने वाला माना हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल का प्रभाव मनुष्य के रक्त और मज्जा पर होता है। इसी से मंगली कुंडली वाले जातक थोड़े गुस्सैल और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं।

जन्म कुंडली में मंगली होना अथवा मंगल दोष होना किसी जातक के लिये अमंगलकारी नहीं हैं। मंगली होना कोई दोष नहीं हैं यह एक विशेष योग होता हैं जो कुछ विषेश जन्म कुंडली में पाये जाते हैं। मंगली जातक कुछ विशेष गुण लिये हुए प्रतिभा संपन्न होते हैं। हमारा उद्देश्य यहा मंगल दोष के प्रभाव को नकारना नहीं हैं, उससे जुडे भ्रम को दूर कर, उससे जुडे शास्त्रीय नियमों से आपको परिचित करना और उसके निवारण के उपाय बताना हैं।
मंगली – दोष विचार कैसे किया जाता हैं। इससे जुडे शास्त्रोक्त नियम इस प्रकार हैं।

अगस्त्य संहिता के अनुसार :
धने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे।
भार्या भर्तु विनाशाय भर्तुश्च स्त्री विनाशनम्।।

मानसागरी के अनुसार :
धनेर्तुविनाशाय भर्तुः कन्या विनश्यति।।

वृह्द ज्योतिषसार के अनुसार :
लग्ने व्यये चतुर्थे च सप्तमे वा अष्टमे कुजः।
भर्तारं नाशयेद् भार्या भर्ताभार्या विनाश्येत्।।

भावदीपिका के अनुसार :
लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे।
स्त्रीणां भर्तु विनाशः स्यात् पुंसां भार्या विनश्यति।।

वृह्द पाराशर होरा के अनुसार :
लग्ने व्यये सुखे वापि सप्तमे वा अष्टमे कुजे।
शुभ दृग् योग हीने च पतिं हन्ति न संशयम्।।

उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ है कि जन्म लग्न से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान मे मंगल स्थित होने पर मंगल दोष या कुज दोष बनता हैं। कुछ आचार्यों के अनुसार लग्न के अतिरिक्त मंगली दोष चन्द्र लग्न, शुक्र या सप्तमेश से इन्हीं स्थानो में मंगल स्थित होने पर भी होता हैं।

मंगली दोष का फल : मंगली दोष वैवाहिक जीवन को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करता है – विवाह में विघ्न, विलम्ब, व्यवधान या धोखा, विवाहोपरान्त दम्पति मे से किसी एक अथवा दोना को शारीरिक, मानसिक अथवा आर्थिक कष्ट, पारस्परिक मन – मुटाव, वाद – विवाद तथा विवाह – विच्छेद। अगर दोष अत्यधिक प्रबल हुआ तो दोनो अथवा किसी एक की मृत्यु भी हो सकती है।

कुंडली में यदि मंगली दोष हो तो उससे भयभीत या आतंकित नहीं होना चाहिये। प्रयास यह करना चाहिये कि मंगली जातक का विवाह मंगली जातक से ही हो क्याकि मंगल – दोष साम्य होने से वह प्रभावहीन हो जाता हैं तथा दोनो सुखी रहते हैं।

दम्पत्योर्जन्मकाले व्ययधनहिबुके सप्तमे लग्नरन्ध्रे।
लग्नाच्चन्द्राच्च शुक्रादपि भवति यदा भूमिपुत्रो द्वयोर्वै।।
तत्साम्यात्पुत्रमित्रप्रचुरधनपतां दंपती दीर्घ – काला।
जीवेतामेकहा न भवति मश्तिरिति प्राहुरत्रात्रिमुख्याः।।
अर्थातः यदि वर और कन्या के जन्मांग मे मंगल द्वितीय, द्वादश, चतुर्थ, सप्तम अथवा अष्टम भाव मे, चंद्रमा अथवा शुक्र से समभाव मे स्थित हो तो समता का मंगल दोष होने के कारण वह प्रभावहीन हो जाता है। लग्न परस्पर सुख, धनधान्य, संतति, स्वास्थ्य एवं मित्रादि की उपलब्धि होती हैं।

कुज दोष वत्ती देया कुजदोषवते किल।
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्यो सुखवर्धनम्।।
अर्थातः मंगल दोष वाली कन्या का विवाह मंगल दोष नहीं होता तथा वर – वधू के मध्य दांपत्य – सुख बढ़ता है।

मंगल के प्रभाव वाले जातक : आकर्षक, तेजस्वी, चिड़चिड़े स्वाभाव, समस्याओं से लडऩे की शक्ति विशेष रूप से प्रभावमान होता है। विकट से विकट समस्याओं में घिरे होने के बावजूद जातक अपना धैर्य नहीं छोड़ते हैं। ज्योतिष ग्रथो में मंगल को भले ही क्रूर ग्रह बताया गया है, मंगल केवल अमंगलकारी ही नहीं हैं यह मंगलकारी भी होता हैं।

मंगली होने के लाभ : मंगली कुंडली वाले जातक में अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाने का विशेष गुण होता हैं। मंगली व्यक्ति ज्यादातर कठिन से कठिन कार्य को समय से पूर्व ही कर लेने समर्थ होते हैं। ऐसे व्यक्ति में नेतृत्व करने की क्षमता जन्मजात पाई जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जल्द किसी से मित्रता नहीं करते और जल्द किसी से घुलते – मिलते नहीं हैं। ऐसे व्यक्ति जब मित्र या या संबंध बनाते हैं तो पूर्णत: निभाने का प्रयास अवश्य करते हैं। ऐसे व्यक्ति अत्याधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता हैं। ऐसे व्यक्ति उग्र स्वभाव के होने पर भी वह बहुत दयालु, शीध्र क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते हैं।

ऐसे व्यक्ति सहीं को सहीं और गलत को गलत कहने में नहीं हिचकिचाते। व्यक्ति किसी गलत के आगे झुकते नहीं और खुद भी गलत नहीं करते। किसी की खुशामद करना इन्हें ज्यादा रास नहीं आता। मंगली जातक प्रायः व्यवसायी, उच्च पद आसीत, राजनीति, डॉक्टर, इंजीनियर, अभिभाषक, तंत्र का जानकार और सभी क्षेत्रों में इन्हें विशेष योग्यता प्राप्त होती हैं। व्यक्ति विपरीत लिंग के प्रति विशेष संवेदनशील होते हैं, उनकी ओर विशेष झुकाव रखते हैं।

ज्योतिष शास्त्रों के अनुशार मंगली लडके – अपने जीवन साथी से विशेष अपेक्षाएं रखते हैं और अपने जीवन साथी के मामले में अधिक संवेदनशील होते हैं। इस कारण शास्त्रों में मंगली का विवाह मंगली से ही करने पर जोर दिया गया हैं। कुछ विद्वानो का मत हैं कि लड़के की कुंडली में मंगल हो और लड़की की एक में 4, 7, 8, 12 स्थान में शनि स्थित हो अथवा मंगल के साथ गुरु स्थित हो तब मंगल का प्रभाव समाप्त माना जाता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि मंगली जातक का विवाह विलंब से होता लेकिन अधिकांशतः अच्छी जगह होता हैं। इसीलिये मंगली कुंडली वाले व्यक्ति का विवाह मंगली से करना शुभ माना जाता हैं।

ज्योतिष महत्व : ज्योतिष में मंगल ऋण, भूमि, भवन, मकान, झगड़ा, पेट की बीमारी, क्रोध, मुकदमे बाजी और भाई का कारक होता हैं। मंगल हमें साहस, सहिष्णुता, धैर्य, कठिन, परिस्थितियों एवं समस्याओं को हल करने की योग्यता प्रदान करता है और खतरों से सामना करने की शक्ति देता हैं।

कुंडली के योग ही दूर करते हैं मंगल दोष : यदि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्ठम व द्वादश भावों में कहीं भी मंगल हो तो उसे मंगल दोष कहा जाता है लेकिन उन दोषों के बावजूद अगर अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि या युति निम्नलिखित प्रकार से हो, तो मंगल दोष खुद ही प्रभावहीन हो जाता है :-

1. यदि मंगल ग्रह वाले भाव का स्वामी बली हो, उसी भाव में बैठा हो या दृष्टि रखता हो, साथ ही सप्तमेश या शुक्र अशुभ भावों (6/8/12) में न हो।

2. यदि मंगल शुक्र की राशि में स्थित हो तथा सप्तमेश बलवान होकर केंद्र त्रिकोण में हो।

3. यदि गुरु या शुक्र बलवान, उच्च के होकर सप्तम में हो तथा मंगल निर्बल या नीच राशिगत हो।

4. मेष या वृश्चिक का मंगल चतुर्थ में, कर्क या मकर का मंगल सप्तम में, मीन का मंगल अष्टम में तथा मेष या कर्क का मंगल द्वादश भाव में हो।

5. यदि मंगल स्वराशि, मूल त्रिकोण राशि या अपनी उच्च राशि में स्थित हो।

6. यदि वर-कन्या दोनों में से किसी की भी कुंडली में मंगल दोष हो तथा कुंडली में उन्हीं पाँच में से किसी भाव में कोई पाप ग्रह स्थित हो। कहा गया है।
शनि भौमोअथवा कश्चित्‌ पापो वा तादृशो भवेत्‌।
तेष्वेव भवनेष्वेव भौम-दोषः विनाशकृत्‌॥

इनके अतिरिक्त भी कई योग ऐसे होते हैं, जो मंगली दोष का परिहार करते हैं अतः मंगल के नाम पर मांगलिक अवसरों को नहीं खोना चाहिए।

सौभाग्य की सूचिका भी होती है मंगली कन्या : कन्या की जन्मकुंडली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में मंगल होने के बाद भी प्रथम (लग्न, त्रिकोण), चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम तथा दशम भाव में बलवान गुरु की स्थिति कन्या को मंगली होते हुए भी सौभाग्यशालिनी व सुयोग्य पत्नी तथा गुणवान व संतानवान बनाती है।

मंगल दोष के शांति उपाय : जिनकी राशि में मंगल अशुभ फल देने वाला है उन्हें निम्न उपाय करने से मंगल अनुकूल हो जाएगा व्यवसाय और जीवन में आ रही बाधा कम होगी।

मंगल शांति के लिए मंगल का दान : (लाल रंग का बैल, सोना, तांबा, मसूर की दाल, बताशा, लाल वस्त्र आदि) किसी गरीब जरूरतमंद व्यक्ति को दें।

मंगल का मंत्र :
ऊँ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताये धीमहि तन्नौ भौम: प्रचोदयात्।
इस मंत्र का नित्य जप करें।

मंगलवार का व्रत रखें : मंगलवार को किसी गरीब को पेटभर खाना खिलाकर तृप्त करें।
अपने घर में भाई-बहनों का विशेष ध्यान रखें। मंगलवार को उन्हें कुछ विशेष उपहार दें।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल हमारे शरीर के रक्त में स्थित माना गया है। अत: ऐसा खाना खाएं जिससे आपका रक्त शुद्ध बना रहे।

मंगल प्रभावित व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का, चिढ़-चिढ़ा हो जाता है, अत: प्रयत्न करें की क्रोध आप पर हावी न हो। लाल बैल दान करें।

मंगल परम मातृभक्त हैं। वह सभी माता-पिता का सेवा-सम्मान करने वाले लोगों पर विशेष स्नेह रखते हैं अत: मंगलवार को अपनी माता को लाल रंग का विशेष उपहार दें।
मंगल से संबंधित वस्तुएं उपहार में भी ना लें।

लाल रंग मंगल का विशेष प्रिय रंग हैं अत: कम से कम मंगलवार को खाने में ऐसा खाना खाएं जिसका रंग लाल हो, जैसे इमरती, मसूर की दाल, सेवफल आदि।
अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए। मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है। अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है।

* जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है।
* प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है।
* मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है।
* कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है।
* महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है। इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है।
* लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है।

नोट : जहाँ तक संभव हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें।
फिर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार अपने पारिवारिक संबंध के कारण पूर्ण संतुष्ट हो, तब भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए। ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो ‘पीपल’ विवाह, कुंभ विवाह, शालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।

जोतिर्विद वास्तु दैवज्ञ
पं. मनोज कृष्ण शास्त्री
9993874848

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