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बरेली के बाजार में झुमका

श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और औद्योगिक दृष्टि से उन्नत उत्तर प्रदेश का बरेली शहर अपनी विविध वैशिष्ठताओं के कारण भारत में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आध्यात्मिक, पौराणिक, शिक्षा, संगीत, कला, हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना और अपने गौरवशाली इतिहास को अपने में समेटे भारत का एक वृहद सांस्कृतिक शहर है। नाथ सम्प्रदाय के कई प्राचीन मंदिरों जैसे अलखनाथ मंदिर, मढ़ीनाथ मंदिर, वनखंडीनाथ मंदिर, त्रिवटीनाथ मंदिर, धोपेश्वरनाथ मंदिर आदि से चतुर्दिक आच्छादित होने के कारण बरेली को जहाँ एक ओर ‘नाथ-नगरी’ कहा जाता है, तो दूसरी ओर ‘दरगाह आला हजरत’ और ‘खानकाह-ए-नियाजिया’ जैसे प्रसिद्ध दरगाहों के कारण इसे ‘बरेली-शरीफ’ भी कहा जाता है। फलतः यह हिन्दू-मुस्लिम की संयुक्त संस्कृति का एक प्रसिद्ध केंद्र है।

बरेली का प्राचीन संबंध महाभारत काल के पाँचल जनपद से बताया जाता है, जहाँ की पाण्डु कुलबधू रानी द्रौपदी थी। लोककथाओं के अनुसार बरेली को ‘बरेल’ राजपूतों द्वारा बसाया गया है। जबकि कुछ सरकारी लेखों के अनुसार इसकी स्थापना सन् 1537 में मुगल प्रशासक ‘मकरंद राय’ के द्वारा मानी जाती है। अठारहवीं सदी में यह शहर ‘रूहेलों’ के नियंत्रण में चला गया था। फलतः यह ‘रोहिलखंड’ के रूप में भी प्रसिद्ध है। 1774 में यह अवध के नवाबों के आधीन रहा और फिर 1801 में बरेली को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया था। 1857 के विद्रोह के समय बरेली, अंग्रेजों के खिलाफ हुए प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केंद्र भी रहा था।

जो भी हो, समय के उतार-चढ़ाव में ‘बरेली’ को पाँचाल, नाथनगरी, ‘बरेलीशरीफ, रूहेलखण्ड, बाँसबरेली, सुरमानगरी, जरीनगरी, कठेर आदि नामों से जाना जाता रहा है। इसका हर एक नाम इसकी विशिष्ठताओं, क्रिया-कलापों और कार्यों को ही प्रतिध्वनित करता है। बरेली में ‘सुरमे’ का व्यापार आज भी बड़े पैमाने पर होता है। ‘सुरमे’ से संबंधित कईं वर्षों पुरानी दुकानें यहाँ आज भी मौजूद हैं। फलतः देशभर में बरेली को ‘सुरमे वाली बरेली’ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन वर्तमान में बरेली की ख्याति सुरमा या फिर इसके अन्य किसी वस्तुओं से न होकर ‘झुमका’ के कारण प्राप्त है। तो क्या बरेली में ‘झुमका’ का निर्माण होता है? जी नहीं। ऐसी कोई बात नहीं है।

सन् 1966 में राज खोसला द्वारा निर्मित सुनील दत्त और साधना द्वारा अभिनीत, मदन मोहन द्वारा संगीत के सरगम में ध्वनित फिल्म ‘मेरा साया’ प्रदर्शित हुआ, जिसमें गीतकार राजा मेहंदी अली खान ने एक गाना ‘झुमका ग‍िरा रे बरेली के बाजार में’ लिखा। उसे अभिनेत्री साधना पर फिल्माया गया। फिर तो ‘बरेली’ और ‘झुमका’ दोनों एक-दूसरे के पूरक ही हो गए हैं। जबकि उस फ‍िल्‍म में न तो बरेली संबंधित कोई घटना ही थी और न कोई दृश्य ही था। लेक‍िन गीत के लेखक शायर राजा मेहंदी अली खान ने उस गीत के माध्यम से ‘बरेली’ और ‘झुमके’ को दुन‍ियाभर के लोगों की जुबान पर सर्वदा के लिए स्थापित ही कर द‍िया।

अनेक लोग तो यही मनाने लगे हैं कि ‘झुमके’ सर्वाधिक बरेली में ही तैयार किए जाते हैं अतः बरेली ही ‘झुमका नगरी’ है। लोगों के विश्वास को तब और अधिक सबलता प्राप्त हुई, जब सालों बाद फरवरी, 2020 में ‘बरेली विकास प्राधिकरण’ ने ‘झुमका ग‍िरा रे बरेली के बाजार में’ गाने में ‘बरेली’ और ‘झुमके’ के परस्पर अभेद महत्ता को समझा और 55 लाख रुपये खर्च करके लखनऊ-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग 24 पर बरेली शहर के प्रवेश मार्ग ‘जीरो पॉइंट’ पर स्थित ‘परसआखेड़ा’ तिराहे पर 30 मीटर शंकुकार घेरे वाला लगभग 2 क्विंटल का एक बड़ा-सा ‘झूमका’ 14 मीटर की ऊँचाई पर लटका दिया। इसका उद्घाटन बरेली के सांसद और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने किया था। यह ‘बरेली का झुमका’ काफी दूर से ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसके उद्घाटन समारोह में आगत सभी अतिथियों को प्रतीक स्वरूप एक-एक ‘झुमका’ भी उपहार में प्रदान किया गया था। उस बड़े झुमका के आसपास ही तीन बड़े ‘सूरमे दानी’ को भी सजाया गया है, जो बरेली के वर्तमान उद्योग की विशेष पहचान है। अब तो उस तिराहा को ‘झुमका तिराहा’ ही कहा जाता है।

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पर मजेदार बात यह है कि ‘बरेली के बाजार में झुमका’ गिरने की घटना कोई पूर्णतः काल्पनिक या फिल्मी मात्र ही नहीं है, बल्कि इसमें कुछ यथार्थ है। उस घटना का सीधा संबंध हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय ‘बच्चन’ और उनकी दूसरी पत्नी तेजी बच्चन से जुड़ा हुआ है। जब वे दोनों प्रथम बार बरेली आए थे, पर दोनों एक-दूसरे से अपरिचित ही थे। उस घटना का चश्मदीद गवाह गीतकार राज मेंहदी अली खान साहब भी थे, जो हरिवंशराय ‘बच्चन’ और तेजी सूरी दोनों के ही मित्र थे।

हिन्दी हालावादी कवि के रूप में प्रसिद्ध हरिवंशराय ‘बच्चन’ और तेजी बच्चन दोनों के प्रथम मिलन और खूबसूरत प्रेम के विभिन्न पलों का साक्षात् गवाह बना था, बरेली शहर। उनकी नौकरी भी बरेली के एक कालेज में एक प्रोफेसर के रूप में लग गई थी। लेकिन उन्होंने उसे अभी ज्वाइन नहीं की थी। क्रिसमस की शीतल छुट्टियाँ चल रही थीं। कुछ समय पूर्व ही हरिवंश राय ‘बच्चन’ अपने पिता और अपनी पहली पत्नी श्यामा, दोनों को खो चुके थे। बात 1941 के अंतिम दिन, अर्थात 31 दिसंबर की है। अंदर से पूरी तरह टूट चुके हरिवंश राय ‘बच्चन’ बरेली में अपने एक मित्र अंग्रेजी के प्रोफेसर प्रेम प्रकाश जौहरी के सिविल लाइंस में कंपनी बाग के पास स्थित निवास पर पहुँचे थे। ऐसे ही समय प्रोफेसर जौहरी साहब के घर में एक दूसरी मेहमान भी पहुँची हुई थीं, लाहौर के खजान सिंह सरदार की पुत्री तेजी सूरी, जो मनोविज्ञान के प्रोफेसर थीं। तेजी सूरी के कॉलेज की प्रिंसिपल प्रेमा जौहरी थीं, जो बरेली की ही रहने वाली और प्रोफेसर प्रेम प्रकाश जौहरी की पत्नी थी। तेजी सूरी की सगाई विदेश में पले-बढ़े एक लड़के से हो चुकी थी। उन दोनों के विचारों में काफी अंतर थे। तेजी सूरी उस बेमेल विचार वाले लड़के को अपना जीवन साथी बनाने के पक्ष में न थीं। तेजी सूरी के दिल की बात को प्रेमा जौहरी तब अच्छी तरह से जानती थी।

31 दिसंबर, 1941 की सुबह प्रोफेसर प्रेम प्रकाश जौहरी के घर पर ही चाय पर दोनों अजनबी, अर्थात हरिवंश राय ‘बच्चन’ और तेजी सूरी की पहली मुलाकात हुई थी । स्वयं ‘बच्चन’ साहब ने एक स्थान पर लिखा है, कि तेजी सूरी का रूप पहली नजर में ही किसी को भी अभिभूत करने के लिए काफी था। एक तरफ तेजी सूरी बेमेल विचार धारक संबंधों से असहज थीं, तो दूसरी तरफ हरिवंश राय ‘बच्चन’ भी अपनी पहली पत्नी श्यामा की मौत से आंतरिक आहत थे। इसलिए प्रेम प्रकाश जौहरी दंपति के मन में इन दोनों टूटे हुए दिलों को एक करने का नेक ख्याल भी आया था। फिर उसी 31 दिसंबर 1941 की रात को प्रेम प्रकाश जौहरी के एक मित्र शहर के नामी वकील रामजी शरण सक्सेना के घर पर ‘थर्टी फर्स्ट की पार्टी’ थी। उस ‘पार्टी’ में जौहरी दंपति अपने दोनों मेहमानों अर्थात हरिवंश राय ‘बच्चन’ और तेजी सूरी को भी अपने साथ ही ले गए। उक्त पार्टी में दोनों अजनबी अपने-अपने व्यथित दिल सहित एक-दूसरे के करीब शांत-मौन बैठे थे। बहुत करीब के दोनों व्यथित दिल एक-दूसरे के दर्द को अनुभव कर रहे थे और शायद एक-दूसरे के दिल के तारों को जोड़ने की कोशिश भी कर रहे थे। उस पार्टी में गीतकार राजा मेहंदी अली खान भी मौजूद थे। रात को ही जब उस ‘पार्टी’ से लौटे, तो प्रोफेसर प्रेम प्रकाश जौहरी जी ने ‘बच्चन’ साहब को नए साल पर कोई एक एक कविता सुनाने का आग्रह किया।

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जैसे ही हरिवंश राय ‘बच्चन’ ने एक कविता सुनाते हुए कहा, ‘उस नयन में बह सकी कब, इस नयन की अश्रुधार’। कविता के उस बोल को सुनते ही तेजी सूरी की आँखों से झर-झर अश्रू-धारा बहने लगी, जिसे देखकर कवि हृदय ‘बच्चन’ साहब भी अपने अश्रू को न रोक पाए। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति युक्त नमी थी। यह देख प्रेमा जौहरी और उनके पति प्रेम प्रकाश जौहरी उन दोनों को अकेले ही कमरे में छोड़कर उसी समय बाहर चले जाना मुनासिब समझा। फिर ‘बच्चन’ साहब और तेजी सूरी दोनों एक-दूसरे के गले से लिपटकर बहुत देर तक उन्मुक्त भाव से रोते रहें। दोनों के आत्मीय तार एक-दूसरे से कभी न टूटने वाले मजबूत बंधन में बंध चुके थे। नए साल 1942 के प्रथम दिन की सुबह में दोनों के अरमान और जिंदगी पूरी तरह से बदल कर एक हो चुके थे । 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि दो अजनबी व्यथित आत्मा एक हो चुके थे।

प्रोफेसर प्रेम प्रकाश जौहरी जी ने अपनी पत्नी सहित दोनों के गले में फूल-मालाएँ डालकर दोनों की सगाई की शुभ घोषणा कर दी। इस तरह दोनों का प्रेम एक ही दिन में कुछ इस तरह से परवाना चढ़ा कि तेजी सूरी के मन का ‘झुमका’ बरेली के उस बाजार में प्रेम के उस निश्छल मन-आलिंगन में कहीं खो ही गया। अब तो मन उछल-उछल कर कह रहा था, – ‘सैया आए नैन झुकाएँ घर में चोरी चोरी, बोले झूमका मैं पहना दूँ आजा बाँकी छोरी।’

और फिर अगले ही दिन तेजी सूरी अपने पिता का आशीर्वाद लेने के लिए लाहौर चली गईं। हरिवंश राय ‘बच्चन’ जी भी शादी की अग्रिम तैयारियों के लिए इलाहाबाद लौटे। अभी दोनों ने शादी नहीं की थी। ऐसे ही समय में एक किसी साहित्यिक कार्यक्रम में राजा मेहंदी अली खान उपस्थित थे, जिसमें तेजी सूरी भी उपस्थित थीं। जब खान साहब ने तेजी सूरी से पूछा कि ‘ये सब कब तक चलेगा?’ तो तेजी सूरी ने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में उत्तर दिया, कि ‘मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया है। अब फेरे भी लगा ही लेंगे।’

उस घटना को बीते लगभग 25 वर्ष हो गए। लेकिन राजा मेहंदी अली खान के मन-मस्तिष्क में तेजी सूरी का वह उत्तर ‘मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया है। अब फेरे भी लगा ही लेंगे।’ एक स्थायी स्थान बना चुका था। ऐसे में जब उन्हें ‘मेरा साया’ फिल्म के लिए गीत लिखने का मौका मिला, तब राजा मेहंदी अली खान साहब को 25 वर्ष पूर्व का वह किस्सा और तेजी बच्चन का वह उत्तर याद आ गया और फिर तेजी सूरी के बरेली में गिरे ‘झुमके’ पर उन्होंने एक गाना ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में’ लिख डाला, जिसे फिल्म में अभिनेत्री साधना के नृत्य पर फिल्माया गया और वह गाना काफी प्रसिद्ध हुआ। फिर इस गाने ने भी तेजी सूरी और हरिवंश राय ‘बच्चन’ की भाँति ही ‘झुमका’ और ‘बरेली’ को भी एक साथ अटूट बंधन में सदा के लिए ही बाँध दिया।

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श्रीराम पुकार शर्मा, लेखक

अब तो जो भी लड़के-लड़कियाँ या मुसाफिर बरेली में पहुँचते हैं, वे एक बार ‘बरेली के बाजार में झुमका गिरा रे’ के ‘झुमके’ को देखना या फिर ढूँढना अवश्य ही चाहते हैं। प्रतीत तो होता है कि शायद उनका ही ‘झुमका’ बरेली के बाजार में कहीं गिर गया हो। परंतु अब उस गिरे या खोए हुए ‘झुमके’ को कहीं ढूँढने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उस ‘झुमका’ को बरेली के ‘झुमके तिराहा’ पर लटका दिया गया है, जिसे पाकर अब खोजकर्ताओं को संतुष्टि और परमानन्द प्राप्त होता है। फिर उस ‘झुमके’ के साथ अपना एक फ़ोटो लेना नहीं भूलते हैं। अब तो बरेली को ‘झुमका सिटी बरेली’ भी कहा जाने लगा है।

श्रीराम पुकार शर्मा
हावड़ा, 711101 (पश्चिम बंगाल)
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com

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