डॉ. विक्रम चौरसिया, नई दिल्ली । अमीरों व गरीबों मे लगातार बढ़ती दूरी, देश में बहुत बड़ी भेदभाव का कारण बनती जा रही है। एक तरफ जहां लोग ओवर न्यूट्रिशन से परेशान हैं तो वही दूसरी तरफ देखा जा रहा है कि कुपोषण देश के लिए एक बड़ी चुनौती भी बनती जा रही है। हमने देखा भी कि कोविड़ से उपजी वैश्विक महामारी का सबसे ज्यादा हमारे देश के गरीब, मध्यम वर्गो पर ही असर पड़ा। एक रिपोर्ट में कहा गया है की कोरोना काल में मध्यम और निम्न वर्ग के अधिकतर लोगों की आमदनी कम हुई या कहे की बहुतों की खत्म हो गई। जिससे गरीब और गरीब हो गया, कोरोना महामारी के दौरान 4 करोड़ 60 लाख लोग गरीबी के दायरे में आए और करीब 84 फीसदी भारतीय परिवारों की आय कम हो गई।

आंकड़े बताते है की देश के सबसे अमीर 10 फीसदी लोगों के पास देश की 45 फीसदी सम्पत्ति है। अगर गरीबों की बात की जाए तो देश की 50 फीसदी गरीब आबादी के पास सिर्फ 6 फीसदी सम्पत्ति है। ऐसे में इस बढ़ती भेदभाव से समाज में अड़चन पैदा होगी। ध्यान रहे किसी भी राष्ट्र के लिए केवल अरबपतियों का बढ़ना कभी भी अच्छी अर्थव्यवस्था का नहीं बल्कि बुरे अर्थव्यवस्था का संकेत होता है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में बराबरी की बात कही गई है, लेकिन यह लगातार बढ़ती खाई कहीं ना कहीं समाज में बड़े स्तर पर भेदभाव को जन्म दे रही है।

सोचिए जो किसान कड़ी मेहनत करके राष्ट्र के सभी जनता के लिए खेतो में दिन रात डटकर अनाज उपजा रहे हो, फैक्ट्रियों में काम कर रहे है, उन्हें अपने बच्चों के स्कूल का फीस भरने, दो वक्त का रोटी या इलाज के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। कई बार मैंने देखा है कि गरीबों व मध्यम वर्गों के लोगो को अपने कानूनी अधिकारों के लिए भी बहुत ही संघर्ष करना पड़ता है। वहां चरम स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अमीर गरीब के बीच बढ़ती दूरी कही न कही लोकतंत्र को ही खोखला कर रही है व देश में भ्रष्टाचार को बढ़ा रही है।

हमने कई बार देखा है कि अगर में दो पक्षों के बीच में किसी बात को लेकर झगड़े हुए मामले थाने में पहुंची तो देखा गया है कि जिस व्यक्ति का बड़े-बड़े लोगो तक पहुंच या अच्छे कपड़े, गाड़ी के साथ ही अच्छी अंग्रेजी बोल रहा हो तो उसे बैठाकर कई बार देखा गया है कि उसे चाय नाश्ता देते हुए सम्मान दिया जाता है। वही जो गरीब, मजदूर लाचार है जिसका कोई बड़े-बड़े लोगो तक पहुंच नही है निर्दोष होते हुए भी उसकी बाते सुनी तक नहीं जाती। अगर कभी सुने भी जाते हैं तो गंभीरता से नहीं लेते बल्कि कई बार फटकारकर पीड़ित को ही भगा भी दिया जाता है। ऐसे ही हालात को देखकर जिसके साथ अन्याय भी हुआ होता है ओ अक्सर थाने तक अपनी रिपोर्ट भी नही लिखवाते। ऐसे में पीड़ित, वंचित, गरीब को न्याय कैसे मिले?

किसी भी राष्ट्र के समाज में आर्थिक रूप से निचले स्तर पर आजीविका के लिए संघर्षरत किसी व्यक्ति के लिए नैतिकता व ईमानदारी भी कभी-कभी अपना मूल्य खो देती है, यानि की इससे सामाजिक असमानता भी जन्म लेती है जो टकराव का कारण बनती है। ध्यान देना होगा कि चंद हाथों में सिमटी समृद्धि की वजह से देश का एक बड़ा वंचित तबका अमानवीयता से शून्य अपसंस्कृति का शिकार हो रहा है।

vikram
डॉ. विक्रम चौरसिया

चिंतक/आईएएस मेंटर/दिल्ली विश्वविद्यालय /इंटरनेशनल यूनिसेफ कौंसिल दिल्ली डायरेक्टर

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