2 फरवरी 2022 माघ गुप्त नवरात्रि आरंभ…

पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री, वाराणसी । दस महाविद्या की पूजा आराधना का पवित्र पर्व है गुप्त नवरात्रि। माँ दुर्गा को कैसे करें प्रसन्न? गुप्‍त नवरात्र‍ि की शुरुआत 2 फरवरी 2022 दिन बुधवार से हो रही है, इस दौरान मां दुर्गा के नौ स्‍वरूप मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा तो होती ही है, इसके साथ ही गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्यायों- माँ काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला की भी गुप्त तरीके से पूजा-उपासना की जाती है।

गुप्त नवरात्रि का महत्व :-
नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा की गुप्त तरीके से पूजा करने का विधान है। गुप्त नवरात्रि में विशेष तरह की इच्छापूर्ति और सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूजा और अनुष्ठान किया जाता है। गुप्त नवरात्रि में तंत्र-मंत्र और सिद्धि प्राप्त करने का विषेश महत्व माना गया है। गुप्त नवरात्रि में तांत्रिक, साधक या अघोरी तंत्र-मंत्र और सिद्धि प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा की साधना करते हैं।

परन्तु गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा अराधना कोई भी साधक (गुरु मार्ग दर्शन में) कर सकता है।
मां की पूजा करने से आपके जीवन के सभी संकटों का नाश होता है।

माँ दुर्गा को प्रसन्न करने हेतु मार्कण्डेय ऋषि द्वारा बहुत ही अद्भुत ग्रथं की रचना की गई है जो है “दुर्गा सप्तशती” परन्तु इसको पढ़ने के बहुत ही कड़े नियम और कायदे है।

।।दस महाविद्या की स्तुति।।
1. काली स्तुति :
रक्ताsब्धिपोतारूणपद्मसंस्थां पाशांकुशेष्वासशराsसिबाणान्। शूलं कपालं दधतीं कराsब्जै रक्तां त्रिनेत्रां प्रणमामि देवीम्॥

2. तारा स्तुति :
मातर्तीलसरस्वती प्रणमतां सौभाग्य-सम्पत्प्रदे प्रत्यालीढ – पदस्थिते शवह्यदि स्मेराननाम्भारुदे।
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रो कपालोत्पले खड्गञ्चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये॥

3. षोडशी स्तुति :
बालव्यक्तविभाकरामितनिभां भव्यप्रदां भारतीम् ईषत्फल्लमुखाम्बुजस्मितकरैराशाभवान्धापहाम्।
पाशं साभयमङ्कुशं च ‍वरदं संविभ्रतीं भूतिदा।
भ्राजन्तीं चतुरम्बजाकृतिकरैभक्त्या भजे षोडशीम्॥

4. छिन्नमस्ता स्तुति :
नाभौ शुद्धसरोजवक्त्रविलसद्बांधुकपुष्पारुणं भास्वद्भास्करमणडलं तदुदरे तद्योनिचक्रं महत्।
तन्मध्ये विपरीतमैथुनरतप्रद्युम्नसत्कामिनी पृष्ठस्थां तरुणार्ककोटिविलसत्तेज: स्वरुपां भजे॥

5. त्रिपुरभैरवी स्तुति :
उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम्॥

6. धूमावती स्तुति :
प्रातर्यास्यात्कमारी कुसुमकलिकया जापमाला जयन्ती मध्याह्रेप्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम्।
सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालोका पातु युष्मान्॥

7. बगलामुखी स्तुति :
मध्ये सुधाब्धि – मणि मण्डप – रत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम्।
पीताम्बराभरण – माल्य – बिभूतिषताङ्गी देवीं स्मरामि धृत-मुद्गर वैरिजिह्वाम्॥

8. मातङगी स्तुति :
श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां भक्ताभीष्टप्रदात्रीं सुरनिकरकरासेव्यकंजांयुग्माम्।
निलाम्भोजांशुकान्ति निशिचरनिकारारण्यदावाग्निरूपां पाशं खङ्गं चतुर्भिर्वरकमलकै: खेदकं चाङ्कुशं च॥

9. भुवनेश्वरी स्तुति :
उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनवययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुश पाशभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥

10. कमला स्तुति :
त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुबल्लभे।
यथा त्वमचल कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा॥

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