कोलकाता (निप्र.): पवन टर्बाइन एक ऐसा उपकरण है, जो हवा की गतिज ऊर्जा को विद्युत शक्ति में परिवर्तित करता हैं। यह नवीकरणीय ऊर्जा की आधारशिला हैं, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को काफी हद तक कम करता है। वैश्विक स्तर पर, पवन टर्बाइन दुनिया की 6% से अधिक बिजली की आपूर्ति करते हैं, यह आंकड़ा प्रौद्योगिकी प्रगति और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ने के साथ बढ़ता ही जा रहा है।
भारत ने भी अपनी नवीकरणीय ऊर्जा रणनीति के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में पवन ऊर्जा को अपनाया है। देश में 37 गीगावाट से अधिक स्थापित पवन क्षमता है, जो इसे दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक बनाती है। इसका मतलब है कि पूरे देश में हजारों पवन टर्बाइन चल रहे हैं।
आईलीड कोलकाता ने “वेस्ट टू वेल्थ” की पहल की है जिसका मकसद पर्यावरणीय स्थिरता और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है,जिससे संभावित पर्यावरणीय विनाशकों को मूल्यवान संसाधनों में बदला जा सके। आईलीड के प्रमुख श्री प्रदीप चोपड़ा ने आज बताया कि यह देखते हुए कि फाइबरग्लास को आसानी से नष्ट या रीसाइकिल नहीं किया जा सकता है, आईलीड ने एक अनूठा उपाय ढूंढ निकाला है।
आईलीड के अनुसार फाइबरग्लास ब्लेड का उपयोग तटबंधों को मजबूत करने के तौर पर किया जा सकता है। क्योंकि फाइबरग्लास अविश्वसनीय रूप से मजबूत और जंग प्रतिरोधी है, जो इसे एक बेहतर बाढ़ अवरोधक बनाता है। साथ ही ब्लेड के पुनः उपयोग करने से इसकी लागत भी अपेक्षानुसार कम पड़ता है। मौजूदा सामग्रियों का उपयोग करने से कार्बन से जुड़े नई सामग्रियों के उत्पादन को कम करने में मदद मिलेगी।
गौरतलब है कि भारत में कई नदियों और जल निकायों में बाढ़ आती है, जिससे फसलें और गांव बर्बाद हो जाते हैं। ऐसे में बाढ़-ग्रस्त क्षेत्रों में तटबंधों को मजबूत करने के लिए अवरोधों के रूप में पवन टर्बाइन ब्लेड का उपयोग किया जाना वाक़ेई सराहनीय पहल होगी। आईलीड ने अपने इस अनूठे उपाय को पेटेंट करने का आवेदन भी दे दिया है और जल्द ही वह मुशिर्दाबाद और सुंदरवन के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में इसके उपयोग के लिए प्रयासरत है।
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।