नई दिल्ली। बिहार में विधानसभा का चुनावी रंडभेरी बज चुकी है। अब आपका समय है मेरे आत्मीय अपने अपने मत का प्रयोग जरूर करें और अपने भविष्य का फैसला खुद से करें। याद रखिए, एक वोट से ही बदलाव की शुरुआत होती है।
जागरूक बनें, सोच-समझ कर मतदान करें, और बिहार को नई दिशा दें, जिससे विकसित भारत का रास्ता बिहार से होकर अब दौड़ पड़े। लोकतंत्र की बुनियाद जनता की सेवा पर टिकी होती है।
राजनीति दल भी टिकट उन्हीं लोगों को दे जो वास्तव में समाज की सेवा करने वाले सच्चे सेवक हो। जनता का प्रतिनिधि केवल कुर्सी पाने या शक्ति दिखाने का साधन नहीं, बल्कि समाज की भलाई और राष्ट्र निर्माण का जिम्मेदार पद है, तभी तो भारत पुनः विश्व गुरु बनेगा।
इतिहास देखे तो सिखाता ही है न कि महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह व भीमराव अंबेडकर जैसे बहुत से अन्य नेता जनता की सेवा और ईमानदारी से महान जननेता बने।
हमें चाहिए ऐसे नेता जो जनता की आवाज सुनें, सदन में जनता के सवाल उठाएँ, बिना भेदभाव जनता के लिए काम करें। आज देखे तो दुर्भाग्य से ही राजनीति में धनबल, बाहुबल, जातिवाद, भाई-भतीजावाद, यहाँ तक कि अब मनोरंजन और दिखावे पर ज़ोर दिया जा रहा है।
जो अधिक पैसा खर्च कर सके, जो धमक दिखा सके या किसी जातीय समीकरण का हिस्सा बन जाए, वही टिकट और पद पा जाता है। नतीजा यह होता है कि असली समाजसेवी जो जनता के बीच रहकर उनकी तकलीफें समझते हैं, वे पीछे ही रह जा रहे हैं।
ध्यान रखें कि जनप्रतिनिधि वही बनना चाहिए जो शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और न्याय के लिए संघर्षरत हो, संसद में जनता की आवाज बुलंद करे, जो ईमानदारी से नीतियाँ बनाए और उनके क्रियान्वयन पर ध्यान दे, न कि केवल पार्टी लाइन पर ताली बजाने का काम करे।
राजनीति का असली उद्देश्य जनसेवा है, न कि सत्ता का सुख। अगर समाज सेवा करने वाले लोग आगे आएँगे तो राजनीति फिर से सम्मान और आदर्शों की मिशाल बनेगी।
जनता को ही अब चुनाव के समय सही प्रतिनिधि चुनने की जिम्मेदारी उठानी होगी ताकि लोकतंत्र वास्तव में “जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का” बन सके।
देशवासियों से विनम्र आग्रह करता हूं कि राजनीति में जनप्रतिनिधि वही अब चुनना जो समाज की सेवा, लोगों की समस्याओं को समझने और हल करने की क्षमता रखता हो।
लोकतंत्र की असली ताक़त जनता के चुने हुए प्रतिनिधि में होती है, और अगर वही लोग चापलूसी, धनबल, बाहुबल या परिवारवाद के दम पर आएंगे तो वे आपकी आवाज कभी ईमानदारी से नहीं उठा पाएंगे।
जनता के बीच रहना, उनकी भाषा, संस्कृति और दुख-दर्द को समझना अगर ऐसे लोग राजनीति में आएंगे, तभी लोकतंत्र मज़बूत होगा और देश विकसित होकर विश्व गुरु बनेगा।

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)
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