नई दिल्ली । अक्सर देखा गया है कि जैसा हम सोचते रहते है, जिन लोगों के साथ हम रहते हैं, जिन किताबों को हम पढ़ते हैं, उनका पूरा-पूरा असर हमारे ऊपर होता है और वैसा ही एक दिन बन भी जाते ही हैं। एक बार कहीं पढ़ा था की एक मादा भेड़िया मनुष्य के एक बच्चे को उठाकर चली गई, उस बच्चे को अपनी मांद में लाकर पाल ली। कुछ लोग अचानक से उस बच्चे को देखकर बड़ी ही कठिनाई से उसे पकड़े। बच्चा बड़ा हो गया था, पर उसमे सारे के सारे ही गुण भेड़िये वाली ही आ चुकी थी। वह जो की मनुष्य का बच्चा था वो जीवित जानवरों को फाड़ कर खाता था, मांद में ही रहना पसंद करता था और तो और भेड़िये की तरह ही गुर्राता भी था।

इससे तो यही पता चलता है कि जिस प्रकार के वातावरण में बच्चो का पालन पोषण होता है, उनकी बुद्धि व शरीर भी उसी दायरे में विकसित होती है। याद रहे बालक ही नहीं बल्कि जवान और बुड्ढे भी संगति से प्रभावित होते हैं। कुछ तो उनके कार्यों को देख कर कुछ उनके वातावरण से जुड़ कर तथा गुप्त रूप से उनकी मानसिक लहरों से प्रभावित होकर साथी पर ऐसा असर पड़ता है कि वह उसी सांचे में ढलने लगता है।

हमने कई पालतू जानवरों को अपने घर पर लाया कुछ ही दिनों में देखा कि वह हम इंसानों जैसा ही रूठना, खेलना, कूदना मस्ती करना कुछ ही दिनों में करने लगे, अक्सर देखा गया है कि ये हमारे जैसे ही व्यवहार भी करने लगते हैं। मैं खुद कई पालतू जानवर पाल रखा हूं जो हुबहू वैसे ही वे भी व्यवहार करते हैं जैसे हम करते है। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार की ज्ञान की या आपको जिस भी क्षेत्र में सफल होना है उसी प्रकार के लोगों से अपनी मेलजोल बढ़ाइए उसी प्रकार के वातावरण में रहिए व साथ ही उसी प्रकार की पुस्तकों का भी अध्ययन करते रहिए एक दिन आप वह बन जाएंगे जो आप सोच रहे हैं।

vikram
डॉ. विक्रम चौरसिया

चिंतक/आईएएस मेंटर/दिल्ली विश्वविद्यालय

Shrestha Sharad Samman Awards

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