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विश्व शरणार्थी दिवस 20 जून 2025- मान्यता के माध्यम से एकजुटता

वैश्विक बदलते परिपेक्ष में जबरन स्वार्थी पलायन, शरणार्थी बनाम भय, उत्पीड़न, हिंसा व पर्यावरणीय जलवायु परिवर्तन पीड़ित शरणार्थी
दुनिया की बदलती परिस्थितियों से क्या अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी सम्मेलन 1951 व इसके प्रोटोकॉल 1967 के संशोधन की जरूरत नहीं है? भारत के ऑपरेशन पुशबैक व अमेरिका के टारगेट @3000 इसके सटीक उदाहरण

अधिवक्ता किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर हर वर्ष विश्व शरणार्थी दिवस 20 जून को मनाया जाता है जिसकी प्रतिवर्ष एक थीम होती है, जो 20 जून 2025 की थीम मान्यता के माध्यम से एकजुटता है। असल में, दुनिया भर में एक बड़ी संख्या में शरणार्थी रहते हैं। इनके साथ आए दिन प्रताड़ना, संघर्ष और हिंसा जैसी कई चुनौतियों के कारण इनको अपना देश छोड़कर बाहर भागने को मजबूर होना पड़ता है। जिसके बाद इन सभी को कई देशों में पनाह मिल जाती है। वहीं कई देशों से इनको निकाल भी दिया जाता है। बेशक इन्हें पनाह मिल जाए, लेकिन वो सम्मान और अधिकार नहीं मिल पाते। शरणार्थी के साहस, शक्ति और संकल्प के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इसके साथ ही इस दिन को मनाये जाने का एक अन्य उद्देश्य शरणार्थियों की बुरी दुर्दशा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना और उनकी समस्याओं का हल करना है।

संयुक्त राष्ट्र 1951 शरणार्थी सम्मेलन और इसके प्रोटोकाल 1967, हालांकि भारत अमेरिका ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, परंतु इसके अनुसार शरणार्थी सम्मेलन और इसका  1967 प्रोटोकॉल अत्यंत महत्वपूर्ण है। शरणार्थी दुनिया के सबसे कमजोर लोगों में से हैं। यह सम्मेलन और प्रोटोकॉल उनकी सुरक्षा में मदद करता है। वे एकमात्र वैश्विक कानूनी साधन हैं जो स्पष्ट रूप से एक शरणार्थी के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं को कवर करते हैं। उनके प्रावधानों के अनुसार, शरणार्थी कम से कम किसी दिए गए देश में अन्य विदेशी नागरिकों के साथ व्यवहार के समान मानकों के पात्र हैं और कई मामलों में नागरिकों के समान व्यवहार। 1951 के कन्वेंशन में कई अधिकार शामिल हैं और यह अपने मेजबान देश के प्रति शरणार्थियों के दायित्वों पर भी प्रकाश डालता है।

1951 के कन्वेंशन की आधारशिला गैर-रिफाउलमेंट का सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार, एक शरणार्थी को उस देश में नहीं लौटाया जाना चाहिए जहां उसे अपने जीवन या स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। शरणार्थियों द्वारा इस सुरक्षा का दावा नहीं किया जा सकता है, जिन्हें देश की सुरक्षा के लिए उचित रूप से खतरा माना जाता है या विशेष रूप से गंभीर अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है, उन्हें समुदाय के लिए खतरा माना जाता है। परंतु मैं यह मानता हूं कि अभी 1951 सम्मेलन तथा 1967 के प्रोटोकॉल को संशोधन करने की जरूरत आन पड़ी है? क्योंकि वर्तमान समय में हम अमेरिका-भारत-पाकिस्तान सहित अनेकों देशों में हो रहे गंभीर दंगों व आवर्ज़न विवादों के कारण माहौल दंगों में बदलने की संभावना हो गई है? भारत का ऑपरेशन पुशबैक व अमेरिका का टारगेट @3000 से दंगा भड़क उठा है। इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे वैश्विक परिपेक्ष में जबरन स्वार्थी पलायन, शरणार्थी बनाम भय उत्पीड़न हिंसा व पर्यावरणीय जलवायु परिवर्तन शरणार्थी की।

साथियों बात अगर हम अमेरिका की करें तो, वहां भी घुसपैठ का हाल कमोबेश ऐसा ही है। यह जब एक बार घुसपैठिया अंदर आ जाता है तो उसको डिपोर्ट करना भी इसी तरह एक लंबा और विवादास्पद मामला बन जाता है। अमेरिका में लॉस एंजिल्स न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे कुछ ऐसे शहर हैं, जहाँ अधिकारियों को इन घुसपैठियों से पूछताछ करने या उन्हें हिरासत में लेने की अनुमति नहीं है। ये शहर डिपोर्ट करने के आदेशों या पुलिस के साथ सहयोग करने से साफ इनकार करते हैं। उन्हें कानून प्रवर्तन के राजनीतिक हथियार के रूप में देखते हैं। जून 2025 की शुरुआत से लॉस एंजिल्स में इसी से जुड़ा एक नाटक चल रहा है। यहाँ घुसपैठियों पर जब एक्शन चालू हुआ तो इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे।

पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और रबर की गोलियाँ चलाई। यहाँ इसके बाद यूनियन नेता को गिरफ्तार कर लिया गया, सरकार ने इसके बाद टाइटल 10 कानून के तहत 4,000 नेशनल गार्ड सैनिकों और 700 मरीन को तैनात करके जवाब दिया। इसके बाद तो बवाल और बढ़ा। कई कारों को जला दिया गया, सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया, कई पत्रकारों को घायल कर दिया गया। इस पूरे बवाल से ट्रंप सरकार की घुसपैठियों को लेकर नीति और किसी शहर को उनके लिए स्वर्ग बनाने की राजनीति माना जा सकता है। इन सब चक्करों में डिपोर्टेशन और भी कठिन हो जाता है। भले ही अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति सख्त सीमा प्रवर्तन और भूमि से अवैध अप्रवासियों को हटाने के लिए जोर दे रहे हैं, लेकिन कानूनी प्रणाली और कुछ विशिष्ट शहर इससे कड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं।

साथियों बात अगर हम भारत की करे तो यहाँ भी वर्तमान में ऑपरेशन पुशबैक चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का प्रयास हो रहा है। यह कार्रवाई अभी कुछ हजार लोगों तक ही सीमित है। असल में एक बार जब अवैध प्रवासी किसी देश में प्रवेश कर जाते हैं तो चाहे वह भारत हो, अमेरिका फिर या यूरोप के देश, तो उन्हें वापस भेजना कानूनी अड़चन, राजनीतिक विरोध और एक्टिविज्म का एक चक्रव्यूह बन जाता है। कायदा तो यह होना चाहिए कि किसी देश में अवैध रूप से रहने वालों को उठा कर सीधे वापस भेज दिया जाना चाहिए। हालाँकि, यह लंबी अदालती लड़ाइयों, एक्टिविज्म और कानूनी दाँवपेंच में बदल गया है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ भारत जैसे देशों में घुसपैठियों को बाहर निकालना मुश्किल का काम है, वहीं पाकिस्तान धड़ाधड़ अफगानिस्तान के लोगों को निर्वासित कर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2025 तक, पाकिस्तान ने 8 लाख से ज़्यादा अफगानों को बिना किसी बवाल के डिपोर्ट कर दिया है।

साथियों बात अगर हम भारत अमेरिका के 1951 के शरणार्थी सम्मेलन व 1967 के प्रोटोकॉल में शामिल नहीं होने की करें तो, भारत शामिल नहीं है। इसका मतलब है कि भारत कानूनी रूप से इन अंतर्राष्ट्रीय समझौतों द्वारा बाध्य नहीं है, जो शरणार्थियों के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और देशों को उन्हें वापस अपने देशों में भेजने से रोकते हैं। हालांकि, भारत ने हमेशा पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों को मानवीय आधार पर स्वीकार किया है और उनके साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार किया है। भारत का मानना है कि शरणार्थी समस्या एक द्विपक्षीय मुद्दा है और स्थिति सामान्य होने पर शरणार्थियों को अपने देशों में वापस लौट जाना चाहिए। भारत में शरणार्थियों के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत, सभी व्यक्तियों को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार है, चाहे वे भारत के नागरिक हों या नहीं। इसका मतलब है कि शरणार्थियों को भी इस अधिकार से सुरक्षा मिलती है और उन्हें मनमाने ढंग से वापस नहीं भेजा जा सकता है।

भारत में शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए एक स्पष्ट शरणार्थी नीति की आवश्यकता है जो शरणार्थियों के प्रबंधन के लिए पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था का निर्माण करे। अमेरिका 1951 के अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी सम्मेलन में शामिल नहीं है, लेकिन उसने 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं, 1967 का प्रोटोकॉल 1951 के सम्मेलन के दायरे को व्यापक बनाता है। इसका मतलब है कि अमेरिका ने शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित कुछ दायित्वों को स्वीकार किया है, लेकिन सभी दायित्वों को नहीं। 1951 का शरणार्थी सम्मेलन शरणार्थियों की परिभाषा और उन्हें प्रदान किए जाने वाले अधिकारों को निर्धारित करता है, 1980 का शरणार्थी अधिनियम अमेरिकी आव्रजन कानून में शरणार्थी की परिभाषा और शरण की प्रक्रिया को शामिल करता है। इस अधिनियम में, अमेरिका ने 1967 के प्रोटोकॉल के तहत अपने दायित्वों को पूरा करने की बात कही है।

साथियों बात अगर हम सही अर्थो में शरणार्थी दिवस के समर्पित पीड़ितों की करें तो, बता दें कि विश्व शरणार्थी दिवस उन लोगों के लिए समर्पित दिन है, जो किसी मजबूरी के कारण अपने घर से बाहर रहने के लिए मजबूर होते हैं और वहां पर कई तरह की परेशानियों का सामना करते हैं। दुनिया भर के कई देशों में देखा गया है कि लोग आपदा, बाढ़, किसी महामारी, युद्ध के कारण, हिंसा समेत अन्य कारणों से अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व भर में ऐसे लोगों के मदद और उनके संघर्षों के लिए इस दिन को उनके लिए समर्पित किया है। इतना ही नहीं इन शरणार्थी को प्रेरित किया जाता है, वह दूसरे देशों में जाकर खुद के जीवन को दोबारा से शुरू कर सकते हैं। जिससे उन्हें और उनके परिवार को वहां पर नया जीवन मिले और उन्हें जीवन जीने के लिए बेहतर सुविधाएं भी मिल सके।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी : संकलनकर्ता, लेखक, कवि, स्तंभकार, चिंतक, कानून लेखक, कर विशेषज्ञ

अतः अगर हम अपरूप पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि विश्व शरणार्थी दिवस 20 जून 2025 – मान्यता के माध्यम से एकजुटता वैश्विक बदलते परिपेक्ष में जबरन स्वार्थी पलायन शरणार्थी बनाम भय उत्पीड़न हिंसा व पर्यावरणीय जलवायु परिवर्तन पीड़ित शरणार्थी। दुनिया की बदलती परिस्थितियों से क्या अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी सम्मेलन 1951 व इसके प्रोटोकॉल 1967 के संशोधन की जरूरत नहीं? भारत के ऑपरेशन पुशबैक व अमेरिका के टारगेट @3000 इसके सटीक उदाहरण है।

(स्पष्टीकरण : उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। यह जरूरी नहीं है कि कोलकाता हिंदी न्यूज डॉट कॉम इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।)

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