Climate कहानी, कोलकाता | 28 दिसंबर 2025: साल 2025 दुनिया के लिए महज़ एक और कैलेंडर वर्ष नहीं रहा, बल्कि यह जलवायु संकट की वह चेतावनी बनकर सामने आया जिसे अब नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन होता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राहत संगठन Christian Aid की ताज़ा रिपोर्ट Counting the Cost 2025 के मुताबिक, बीते साल जलवायु से जुड़ी आपदाओं ने वैश्विक स्तर पर 120 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान पहुंचाया।
यह नुकसान सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है—इसके पीछे हज़ारों ज़िंदगियां, उजड़े घर और टूटे भविष्य छिपे हैं, जो हर आपदा के साथ और गहरे होते चले गए।

दस बड़ी आपदाएं, अरबों डॉलर का नुकसान
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया भर में कम से कम 10 ऐसी बड़ी जलवायु आपदाएं दर्ज की गईं, जिनमें से हर एक ने एक अरब डॉलर से अधिक का नुकसान किया।
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कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में लगी भीषण आग ने अकेले 60 अरब डॉलर से ज़्यादा की क्षति पहुंचाई
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दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में आए तूफानों और बाढ़ में 1,700 से अधिक लोगों की मौत हुई और करीब 25 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया
भारत-पाकिस्तान समेत एशिया सबसे अधिक प्रभावित
भारत और उसके पड़ोसी देशों के लिए 2025 बेहद भारी साबित हुआ।
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भारत और पाकिस्तान में आई भीषण बाढ़ में 1,860 से अधिक लोगों की जान गई
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आर्थिक नुकसान का अनुमान 5.6 अरब डॉलर से अधिक लगाया गया
रिपोर्ट बताती है कि एशिया उन क्षेत्रों में शामिल रहा जहां सबसे ज्यादा तबाही हुई, जबकि इन देशों का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान अपेक्षाकृत कम है।
“ये प्राकृतिक आपदाएं नहीं, राजनीतिक नाकामी हैं”
Christian Aid की रिपोर्ट साफ शब्दों में कहती है कि ये घटनाएं महज़ “प्राकृतिक” नहीं हैं। इम्पीरियल कॉलेज लंदन की प्रोफेसर जोआना हेग के अनुसार— “ये आपदाएं किसी अनहोनी का नतीजा नहीं हैं, बल्कि दशकों से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता और राजनीतिक टालमटोल का परिणाम हैं।”
उनका कहना है कि जब तक उत्सर्जन घटाने और जलवायु अनुकूलन पर गंभीर कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक तबाही का यह सिलसिला और तेज़ होगा।
अमीर देशों में आंकड़े, गरीब देशों में असली पीड़ा
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि आर्थिक नुकसान अक्सर अमीर देशों में ज़्यादा दिखाई देता है, क्योंकि वहां बीमा और संपत्ति का दायरा बड़ा है लेकिन वास्तविक मानवीय त्रासदी गरीब देशों में सामने आती है।
नाइजीरिया, कांगो, ईरान और अफ्रीका के कई हिस्सों में हज़ारों लोग प्रभावित हुए, लेकिन उनकी पीड़ा अक्सर वैश्विक आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो पाती।
“यह भविष्य नहीं, आज की सच्चाई है”
Christian Aid के सीईओ पैट्रिक वॉट ने चेतावनी देते हुए कहा— “जलवायु संकट अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि आज की हकीकत है। अगर सरकारें जीवाश्म ईंधन से दूरी नहीं बनातीं और जलवायु वित्त पर अपने वादे पूरे नहीं करतीं, तो इसकी कीमत सबसे कमजोर लोगों को चुकानी पड़ेगी।”
सीमाएं नहीं मानता जलवायु संकट
रिपोर्ट के अनुसार 2025 में
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रिकॉर्ड तोड़ गर्मी
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जंगलों की आग
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सूखा और भीषण तूफान
दुनिया के हर कोने में महसूस किए गए। यहां तक कि स्कॉटलैंड जैसे ठंडे इलाकों में भी जंगलों में आग लगी और समुद्रों का तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।
चेतावनी या आख़िरी मौका?
Counting the Cost 2025 महज़ आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक सख़्त चेतावनी है। सवाल अब यह नहीं कि दुनिया ने कितना खो दिया। सवाल यह है कि क्या अब भी हम आने वाली तबाही को रोकने का साहस दिखा पाएंगे?
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