नई दिल्ली। आज वोमेन्स डे (महिला दिवस) है। आज के दिन स्त्रियों का महत्व रेखांकित किया जाना चाहिए, उनकी महत्ता बताई जानी चाहिए, उनका गुणगान होना चाहिए। इसमें भला क्या बुराई है, किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?
लेकिन मुझ जैसे तमाम पुरुषों को आपत्ति तब होती है, जब ‘महिला दिवस’ के नाम पर कुछ ‘अति आधुनिक महिलाएं’, कुछ जेएनयू छाप पुरुष, कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, स्त्रियों को पुरुषों के विरुद्ध यह कहकर भड़काएँगे कि –
“पुरुष जाति अत्याचारी है, हिंसक है।
पुरुषों का जन्म ही शोषण करने के लिए हुआ है।
इसलिए जागो नारियों जागो!!! पुरुषों पर आश्रित मत रहो। उनसे लड़ो और अपने अधिकार छीनो। जरूरत पड़े तो उन पर केस करो, जेल भेजो उन्हें। हमारा गैंग आपके साथ है।”
मैं ये नहीं कहता कि सारे पुरुष भगवान राम हैं, एकदम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। लेकिन आप सब धान बाइस पसेरी क्यों तौलते हैं, पूरी पुरूष जाति को दोषी कैसे ठहरा सकते हैं? आपके पिता, भाई और पुत्र भी तो पुरूष ही हैं, क्या वे भी अत्याचारी और शोषक हैं??
मुझे अपने वायु सेना के दिनों की एक घटना याद आती है। देश के पूर्वी हिस्से के किसी वायुसेना स्टेशन में एक अफवा (Air Force Wives Welfare Association) मीटिंग के दौरान, एक लेडी एकाउंट अफसर वायुसैनिकों की पत्नियों को उनके पति की पे-स्लिप के बारे में समझा रही थी-
“संगिनियों! आप बताएं, कितनी महिलाओं को उनके पति पैसे का पूरा हिसाब देते है? हाथ उठाओ??”
“केवल दो”
“कितना जुल्म हो रहा आप पर! आपको अंधेरे में रखा जा रहा है!! आंखे खोलो, जागो आप लोग।”
देखो और समझो। आपके पति की पे-स्लिप कुछ इस तरह की होती है। इस पे स्लिप के बाएं तरफ लिखा है कि आपके पति को कुल कितनी तनख्वाह मिलती है। दाएं तरफ के कॉलम में ये लिखा है कि कितने पैसे कहाँ कटते हैं…..
संगिनियों आपका अधिकार है कि आप जानें कि आपके पति कितना कमाते हैं, कहाँ खर्च करते हैं, कैसे खर्च करते हैं, किस पर खर्च करते हैं…..
कोई समस्या हो, अफवा मैडम को तुरंत फ़ोन करें। डरे नहीं, अपना हक जानें। आपके पति की तनख्वाह पर आपका पूरा हक है। इसे लेकर रहें। मांगकर नहीं, छीनकर लें…..। ”
स्त्रियों को उनके हक पता होने ही चाहिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्हें प्रत्येक उचित माध्यम से इसके लिए जागरूक करना ही चाहिए। पर यह सिक्के का एक पहलू है। मेरा प्रश्न यह कि उन्हें अपनी जिम्मेदारी भी तो पता होना चाहिए। पति सिर्फ एटीएम मशीन नहीं है। वह भी हाड़-मांस का बना हुआ इंसान है। उसकी भी अन्य जीवों की तरह शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक जरूरतें होती हैं। ‘दूध दुहना’ जानो तो ‘चारा-पानी करना’ भी तो जानो।
उस लेडी एकाउंट अफसर को, पतियों की पे-स्लिप की जानकारी देने, उनका हक बताने के साथ ही वहां उपस्थित तमाम संगिनियों से यह भी पूछना चाहिए था कि जब आपके हसबैंड सुबह 4-5 बजे उठकर नीम-अंधेरे, गर्मी-सर्दी-बरसात, लेह-राजस्थान-तवांग में ड्यूटी जाते हैं तो कितनी संगिनियाँ जो विशुद्ध गृहिणी हैं, उन्हें चाय पिलाकर ही भेजती हैं तथा ब्रेकफास्ट भी बनाकर देती हैं?
कितनी संगिनियाँ केवल उठकर क्वार्टर का दरवाजा बंद कर लेती हैं??
और
कितनी सशक्त देवियां यह कहकर अपने पत्नी धर्म की इतिश्री कर लेती हैं कि – “सुनो जी, दरवाजा बाहर से सटा देना। जब मैं 8-9 बजे सोकर उठूंगी, तब अंदर से बंद कर लूंगी???
कितनी स्त्रियां अपने पति के वेतन में ही अपना हक नहीं जताती बल्कि उनके मां-बाप को भी अपने माता-पिता जितना ही सम्मान देती हैं? वह स्त्रियां भी जरूर हाथ उठाएं जो अपने पति की पेमेंट और पेंशन को ही नहीं बल्कि उनकी परेशानी और टेंशन को भी अपनी ही जिम्मेदारी समझती हैं????”
हाथ हक के लिए उठें तो जिम्मेदारी के लिए भी जरूर उठें। मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू नहीं चलेगा। पेमेंट साझा है तो परेशानी भी साझा होनी चाहिए। मैं यह भी जानता और मानता हूं कि अधिकांश भारतीय स्त्रियां ऐसी ही हैं जो अपने पिता, पति और पुत्र को अत्याचारी और शोषक नहीं बल्कि उन्हें श्रद्धेय, सहयोगी, सहारा मानती हैं। एक्टिविज्म का रोग अभी उन तक नहीं पहुंचा है।
मैं स्वयं कई स्त्रियों की इतनी इज्जत करता हूँ, जितनी मैं अपनी मां की करता हूं। मैं उन स्त्रियों में मां सीता, देवी पार्वती की छवि देखता हूँ। उनके लिए मेरे मन में केवल श्रद्धा है, प्रेम है, स्नेह है। लेकिन मैं ‘कुछ महिलाओं’ की धेले भर भी इज्जत नहीं करता। उनकी छाया से भी बचना चाहता हूं। ऐसी महिलाओं के मुंह खोलते ही मेरे अंदर का ‘बर्बर पुरुष’ जाग उठता है। मैं उनमें सिर्फ सूर्पनखा देखता हूँ, मंथरा देखता हूँ।
मैं किसी भी स्त्री की सिर्फ ‘स्त्री’ होने के कारण इज्जत नहीं करता। न किसी पुरुष को ‘मर्द’ होने के कारण अत्याचारी समझता हूं। बल्कि उस स्त्री या पुरुष के गुण-दोष के आधार अपना व्यवहार तय करता हूं।
(विनय सिंह बैस)
नर हो या नारी, गुण होने पर ही सम्मान करने वाले

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