डॉ. विक्रम चौरसिया, नई दिल्ली। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए घर से दूर भेजते हैं तो उनके साथ केवल एक बच्चा नहीं जाता, उनके दिल की धड़कन, सपने और उम्मीदें भी जाती हैं। कोई गहने बेचता है, कोई जमीन गिरवी रखता है, कोई कर्ज लेता है। मन में बस एक विश्वास होता है कि बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा और एक दिन परिवार और राष्ट्र का सहारा बनेगा।
लेकिन जब वही बच्चा किसी हादसे में हमेशा के लिए लौटकर नहीं आता, तब उस परिवार पर क्या गुजरती होगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। देश की राजधानी दिल्ली में छात्रों से जुड़ी घटनाओं ने बार-बार इस भरोसे को चोट पहुँचाई है। कभी आग, कभी जलभराव और अब दिल्ली विश्वविद्यालय के पास सत्य निकेतन में पाँच मंजिला इमारत का भरभराकर गिरना। हर घटना एक ही सवाल सामने लाती है कि आखिर हमारे विद्यार्थियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
ओल्ड राजेंद्र नगर की दर्दनाक घटना के बाद, जब तत्कालीन शिक्षा मंत्री एवं मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना के साथ मेरी बैठक हुई थी, उस बैठक में दिल्ली सरकार का पूरा मंत्रिमंडल, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और तत्कालीन मेयर भी उपस्थित थे। बाद में मुख्यमंत्री रहते हुए आतिशी जी से फिर मुलाकात हुई। इन बैठकों में छात्रों की सुरक्षा के लिए एक विशेष योजना लाने और उसमें छात्रों को भी सहभागी बनाने की बात हुई थी, ताकि उनकी वास्तविक समस्याएँ और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ सीधे नीति और व्यवस्था का हिस्सा बन सकें।
यह सोच निश्चित रूप से स्वागत योग्य थी। लेकिन आज फिर वही सवाल हमारे सामने है। यदि छात्रों की सुरक्षा के लिए योजनाएँ और व्यवस्थाएँ बनाने की बात होती रही है, तो ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों सामने आती हैं?
सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक नेतृत्व बदलता रहता है, लेकिन राष्ट्र का भविष्य नहीं बदलता। युवा छात्र किसी एक सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन और पूरे समाज की साझा नैतिक जवाबदेही हैं। घटना होती है, शोक व्यक्त होता है, जाँच के आदेश दिए जाते हैं, आरोप-प्रत्यारोप होते हैं और कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाता है।
लेकिन जिन घरों में किसी बेटे या बेटी की तस्वीर हमेशा के लिए ठहर जाती है, उनके लिए फिर कुछ भी सामान्य नहीं होता। मुझे आज भी मुखर्जी नगर की वह भयावह घटना याद है। भंडारी बिल्डिंग में आग लगी थी। मैं अपने कुछ साथियों के साथ पास में ही चाय पी रहा था। अचानक धुआँ दिखाई दिया और देखते ही देखते अफरा-तफरी मच गई।अपनी जान बचाने के लिए छात्रों को ऊँची इमारत से छलांग लगाते देखना किसी फिल्म का दृश्य नहीं था वह हमारी आँखों के सामने घट रही ऐसी त्रासदी थी, जिसे भूल पाना आसान नहीं।
इसके बाद ओल्ड राजेंद्र नगर की घटना ने फिर यह सोचने पर मजबूर किया कि हम अपने विद्यार्थियों के लिए कैसी व्यवस्था बना रहे हैं। अब सत्य निकेतन की घटना ने उसी चिंता को फिर सामने ला दिया है और यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं है देश के अलग-अलग हिस्सों से भी विद्यार्थियों की सुरक्षा से जुड़ी दुर्घटनाएँ सामने आती रही हैं। हर बार सुधार का भरोसा मिलता है, फिर अगली घटना उसी भरोसे पर सवाल खड़ा कर देती है। आखिर क्यों?
यह सवाल किसी एक सरकार, विभाग या व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था से है, जिसका दायित्व है कि विद्यार्थी सुरक्षित वातावरण में पढ़े, रहे और अपने सपनों को आकार दे।क्या किसी भवन की कीमत किसी परिवार के बच्चे की जिंदगी से बड़ी हो सकती है? एक विद्यार्थी केवल फीस भरने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह किसी माँ की आँखों का सपना, किसी पिता की वर्षों की मेहनत और पूरे परिवार की उम्मीद होता है। उसके चले जाने के बाद मुआवजा या औपचारिक संवेदना उस खालीपन को कभी नहीं भर सकती।
इसलिए जरूरत हादसे के बाद राहत देने की नहीं, हादसा होने से पहले खतरे को पहचानने की है। छात्रावासों, किराये के मकानों, पुस्तकालयों, कोचिंग परिसरों और अन्य छात्र-आवासों की नियमित सुरक्षा जाँच क्यों न हो? अग्निशमन व्यवस्था, भवन की मजबूती, आपातकालीन निकास और जल निकासी जैसे बुनियादी मानकों की निगरानी लगातार क्यों न की जाए? नियम हैं तो उनका पालन कौन सुनिश्चित करेगा और लापरवाही हुई तो जवाबदेही किसकी होगी?
मैं अपने साथियों के साथ लंबे समय से इस मुद्दे पर आवाज उठाता रहा हूँ। हमारा उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि उस संवेदनहीनता को चुनौती देना है जिसमें त्रासदी के बाद कुछ दिनों का शोर तो होता है, लेकिन उससे पहले जरूरी सावधानी नहीं बरती जाती। हमें समझना होगा कि करुणा केवल शोक व्यक्त करने में नहीं, किसी की जान बचाने की व्यवस्था करने में है। मानवता केवल संवेदना के शब्दों में नहीं, जिम्मेदारी निभाने में है।
देश अपने युवाओं से भविष्य की उम्मीद करता है। बदले में युवाओं को कम-से-कम इतना तो मिलना ही चाहिए कि वे पढ़ने के लिए घर से निकलें और सुरक्षित अपने घर लौट सकें। सरकार कोई भी हो, राजनीतिक नेतृत्व बदलता रहे, लेकिन छात्र की सुरक्षा का प्रश्न नहीं बदल सकता। राष्ट्र की रीढ़ युवा छात्र हैं और उनकी सुरक्षा किसी एक सरकार की नहीं, पूरे राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी है।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं कि इमारत क्यों गिरी। सवाल यह है कि हमारी संवेदनशीलता कब जागेगी? और सबसे बड़ा सवाल
क्या हमारे बच्चों की जिंदगी की कीमत किसी हादसे के बाद तय होगी या हम हादसा होने से पहले ही उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे?
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