वाराणसी। पितृपक्ष सनातन परंपरा में पितरों के स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष काल माना गया है। इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, अन्नदान तथा ब्राह्मण भोजन आदि करता है।
लेकिन एक प्रश्न अक्सर मन में आता है कि – पितरों से संबंधित श्राद्ध एवं भोजन आदि कार्य दोपहर के समय ही क्यों किए जाते हैं? आइए, शास्त्रीय परंपराओं में बताए गए कारणों को समझें।
1. दोपहर का समय पितृ कार्य के लिए विशेष :-
परंपरागत मान्यता के अनुसार दिन के अलग-अलग समयों का अलग-अलग धार्मिक कार्यों से संबंध माना गया है।
प्रातःकाल – देव कार्य एवं उपासना के लिए विशेष माना जाता है।
मध्याह्न – पितृ कार्य के लिए उपयुक्त माना गया है।
सायंकाल – संध्या एवं अन्य धार्मिक साधनाओं का समय माना जाता है।
इसी कारण श्राद्ध कर्म में मध्याह्न काल को विशेष महत्व दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि दोपहर में भगवान की पूजा नहीं की जा सकती। सामान्य पूजा किसी भी उचित समय पर की जा सकती है; श्राद्ध के लिए मध्याह्न का विशेष विधान अलग विषय है।
2. सूर्य और पितृ कर्म का सम्बन्ध :-
शास्त्रीय परंपरा में सूर्य को देवताओं तथा पितरों तक अर्पित वस्तुओं के पहुँचने का माध्यम माना गया है। मध्याह्न में सूर्य आकाश के मध्य भाग में होता है।
इसी कारण परंपरागत श्राद्ध-विधान में इस समय को पितरों के निमित्त अर्पण करने के लिए विशेष माना गया। श्रद्धा से दिया गया अन्न, जल, तिल एवं अन्य अर्पण पितरों के निमित्त समर्पित किए जाते हैं।
3. दक्षिण दिशा का महत्व :-
सनातन परंपरा में दक्षिण दिशा को पितृ एवं यम से संबंधित दिशा माना गया है। इसलिए तर्पण और श्राद्ध कर्म में दक्षिण दिशा की ओर मुख करने तथा पितरों का स्मरण करने की परंपरा मिलती है। पुराण एवं रामायण की परंपरागत कथाओं में भी दक्षिण दिशा का संबंध मृत्यु एवं पितृलोक से जोड़ा गया है।
4. पिंडदान का वास्तविक अर्थ :-
सनातन धर्म में पिंड का अर्थ गोलाकार अर्पण से जुड़ा है। श्राद्ध में चावल, तिल, घी, दूध, शहद आदि से पिंड तैयार करने की परंपरा अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है।
कहीं-कहीं जौ के आटे आदि से भी पिंड बनाए जाते हैं। पिंडदान केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि दिवंगत पूर्वजों के प्रति – श्रद्धा, कृतज्ञता, स्मरण पारिवारिक उत्तरदायित्व का प्रतीक माना जाता है।
5. पिंड और चंद्रमा का संबंध :-
ज्योतिषीय एवं धार्मिक परंपराओं में चंद्रमा का संबंध मन, जल, स्मृति तथा पितृ संबंधी अवधारणाओं से जोड़ा गया है। इसी कारण श्राद्ध एवं पितृ कर्म में चंद्रमा, तिल, जल और अन्न का विशेष महत्व बताया गया है। विभिन्न परंपराओं में पिंड के माध्यम से पितरों को तृप्ति प्रदान करने की धार्मिक भावना व्यक्त की जाती है।
6. पितृ कर्म में सफेद रंग क्यों?
सफेद रंग को सामान्यतः सात्त्विकता, शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए पितृ कर्म में सफेद वस्त्र, चावल तथा अन्य सात्त्विक सामग्री का प्रयोग कई परंपराओं में किया जाता है। धार्मिक मान्यता में सफेद रंग का संबंध चंद्रमा से भी माना जाता है।
7. श्राद्ध किस तिथि को करना चाहिए?
पारंपरिक श्राद्ध-विधान के अनुसार जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो, उसी हिंदू तिथि में वार्षिक श्राद्ध करने की परंपरा है।
यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो अलग-अलग परंपराओं में सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। इसलिए श्राद्ध की तिथि निर्धारित करते समय स्थानीय पंचांग और योग्य आचार्य की सलाह लेना उचित रहता है।
8. श्राद्ध में कौए को भोजन क्यों कराया जाता है?
पितृपक्ष में कौए को भोजन कराने की परंपरा बहुत प्राचीन है। लोक एवं पुराणिक मान्यताओं में कौए को – पितरों का प्रतीक, यम का संदेशवाहक, अतिथि आगमन का सूचक आदि माना गया है।
इसलिए श्राद्ध में तैयार भोजन का एक भाग कौए को अर्पित करने की परंपरा बनी। कौए द्वारा भोजन ग्रहण करना कई परिवारों में पितरों की तृप्ति का शुभ संकेत माना जाता है।
9. पीपल और पितृ परंपरा :-
सनातन परंपरा में पीपल वृक्ष को अत्यंत पवित्र माना गया है। पितृपक्ष में पीपल के समीप जल अर्पित करना, दीपक जलाना तथा श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण करना कई क्षेत्रों में प्रचलित धार्मिक परंपरा है।
इसका मूल भाव है- पितरों का स्मरण और प्रकृति के प्रति सम्मान।
10. कौए और जयंत की प्रसिद्ध कथा :-
रामायण की प्रसिद्ध कथा के अनुसार देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण किया था। उन्होंने माता सीता को कष्ट पहुँचाया। भगवान श्रीराम ने उन्हें दंड दिया। बाद में जयंत ने क्षमा मांगी।
परंपरागत कथा में आगे बताया जाता है कि पितरों को अर्पित भोजन में कौए को भी भाग प्राप्त होने का विधान इसी प्रसंग से जोड़ा जाता है। इसी कारण आज भी अनेक परिवारों में श्राद्ध भोजन का एक अंश कौए को अर्पित किया जाता है।
पितृ कर्म का सबसे बड़ा संदेश :-
पितृपक्ष केवल भय या किसी अनिष्ट की आशंका का समय नहीं है।
यह अपने पूर्वजों को याद करने का अवसर है – जिन्होंने हमें जन्म दिया, जिन्होंने परिवार की नींव रखी, जिनके संस्कारों से हमारा जीवन बना और जिनके प्रति हमारा कर्तव्य आज भी स्मरण में जीवित है। श्रद्धा से किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है।
पितरों के प्रति श्रद्धा रखें, माता-पिता एवं बुजुर्गों का सम्मान करें और परिवार की सनातन परंपराओं को आगे बढ़ाएँ।
॥ॐ पितृभ्यो नमः॥
॥ॐ नमः शिवाय॥
सूचना : धार्मिक विधि, तिथि एवं मुहूर्त में क्षेत्रीय पंचांग तथा परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। व्यक्तिगत श्राद्ध-विधान के लिए योग्य आचार्य से परामर्श करें।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

