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जब अल्फाज तराजू पर तौले जाने लगते हैं – डॉ. विक्रम चौरसिया

नई दिल्ली। आज के समय में, जहाँ हर चीज की कीमत तय है, वहाँ इंसानी भावनाएँ और अल्फाज भी तौले जाने लगे हैं। स्वार्थ और लाभ-हानि के तराजू पर, एक दफा एक युवक अपनी डायरी लेकर निकला। उसमें उसने अपने जज्बात और विचार लिखे थे। वह चाहता था कि कोई उसके शब्दों की कीमत समझे। रास्ते में उसे एक कबाड़ी मिला। युवक ने अपनी डायरी उसे दिखा दी।

कबाड़ी ने पन्ने पलटे और कहा कबाड़ में डालेंगे तो कुछ पैसे मिल जाएंगे। यह सुनकर युवक चुप हो गया। जो उसके लिए अनमोल था, वह किसी के लिए सिर्फ कागज था। यही आज के समाज की सच्चाई है जहाँ शब्दों की गहराई नहीं, बल्कि उनका फायदा देखा जाता है। लेकिन सच यह है कि अल्फाज कभी रद्दी नहीं होते। वे इंसान के मन और आत्मा की आवाज होते हैं। उनकी कीमत इस पर निर्भर करती है कि उन्हें समझने वाला कौन है।

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इसीलिए, खुद को कभी कम मत समझिए। ₹500 का नोट चाहे कितना भी पुराना, गंदा या मुड़ा हुआ क्यों न हो, उसकी कीमत कम नहीं होती। वैसे ही, जीवन में लोग आपको कितना भी नीचा दिखाएँ या परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन हों आपकी असली कीमत कभी कम नहीं होती। एक और उदाहरण देखिए – एक पत्थर को कबाड़ी कुछ सिक्कों में तौलता है, लेकिन वही पत्थर जब जौहरी के पास जाता है, तो वह उसे हीरा बताता है।

फर्क पत्थर में नहीं, देखने वाले की समझ में होता है। इसलिए जरूरी है कि हम शब्दों और भावनाओं की कद्र करें और खुद को भी सही नजरिए से देखें। अंत में बस इतना समझ लीजिए कि अल्फाज की कीमत कम नहीं होती, बस उन्हें समझने वाले कम हो जाते हैं।

चिंतक/ मेंटर/ एक्टिविस्ट/ दिल्ली विश्वविद्यालय

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