वाराणसी। शास्त्रों और धर्मसिंधु/निर्णयसिंधु के नियमों के अनुसार हरितालिका तीज व्रत कभी भी द्वितीया (दोज) से युक्त तिथि में नहीं करना चाहिए। हिंदू धर्मशास्त्रों में तीज व्रत के लिए चतुर्थी से युक्त तृतीया तिथि (चतुर्थी विद्धा) को ही सर्वश्रेष्ठ और फलदायी माना गया है।
तीज का व्रत दोज (द्वितीया) से मिली हुई तिथि में क्यों नहीं करना चाहिए, इसका सही निर्णय और शास्त्रीय कारण नीचे दिए गए हैं।
दोज से लगी तीज (पूर्वविद्धा) निषेध क्यों है? धर्मशास्त्रों में इसके संदर्भ में स्पष्ट वर्जना है। स्कंद पुराण और व्रतराज का यह श्लोक इसका मुख्य आधार है।
द्वितीया शेष संयुक्तां यः करोति विमोहितः।
दुःख शोक भयैर्युक्तः स याति नरकं ध्रुवम्॥
अत एव हि संत्याज्या तृतीया पूर्व संयुता।
चतुर्थी संयुता कार्या सर्वपाप प्रणाशिनी॥
अर्थ : जो मनुष्य या व्रती मोहवश द्वितीया (दोज) के बचे हुए अंश से युक्त तृतीया तिथि में व्रत करता है, उसके घर में दुःख, शोक और भय का वास होता है। इसलिए पूर्वविद्धा (दोज से लगी हुई) तृतीया का पूरी तरह परित्याग कर देना चाहिए। इसके विपरीत, चतुर्थी से युक्त तृतीया का व्रत सभी पापों का नाश करने वाला और सौभाग्य देने वाला होता है।
देवताओं के स्वामित्व का नियम ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, प्रत्येक तिथि का एक स्वामी देवता होता है।
द्वितीया तिथि के स्वामी ब्रह्मा जी हैं। तृतीया तिथि के स्वामी माता गौरी (पार्वती जी) हैं। चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेश जी हैं।
हरितालिका तीज में माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। शिव-पार्वती के साथ उनके पुत्र गणेश जी का होना अत्यंत शुभ माना जाता है, इसलिए गणेश जी की तिथि (चतुर्थी) का संसर्ग (मेल) तीज व्रत को पूर्ण और मंगलकारी बनाता है। इसके विपरीत, ब्रह्मा जी की तिथि (दोज) से युक्त होने पर वह फल प्राप्त नहीं होता।
सूर्योदय व्यापिनी (उदयातिथि) का महत्वसनातन परंपरा में व्रत हमेशा सूर्योदय के समय मौजूद तिथि (उदयातिथि) के आधार पर ही श्रेष्ठ माना जाता है।
यदि तृतीया तिथि सूर्योदय के समय द्वितीया से युक्त हो (यानी सूर्योदय के समय दोज बची हो और बाद में तीज लगे), तो उसे अशुद्ध माना जाता है। यदि तृतीया तिथि सूर्योदय के समय शुरू हो रही हो और अगले दिन चतुर्थी को स्पर्श कर रही हो, तो वह व्रत के लिए सर्वोत्तम है।
शास्त्र सम्मत सही निर्णयतीज व्रत के निर्णय में कभी भी भ्रम में न पड़ें। यदि किसी वर्ष तृतीया तिथि दो दिन पड़ रही हो, पहला दिन – यदि वह दोज (द्वितीया) से युक्त है, तो उस दिन व्रत न रखें।
दूसरा दिन – यदि वह चतुर्थी से युक्त है (चाहे वह दिन में कुछ ही समय के लिए क्यों न हो), उसी दिन व्रत रखना पूर्णतः शास्त्रसम्मत, शुद्ध और कल्याणकारी माना जाता है।
हरतालिका तीज पर इस समय करें पूजा, मिलेगा व्रत का पूरा फल! क्या आप भी इस बार …7:06. तक रहेगी और सनातन परंपरा में व्रत के लिए जो है सूर्य उदय यानी कि उदय तिथि के समय पर ही व्रत माने जाते हैं इसलिए हर तालिका तीज का व्रत जो है 14 सितंबर को है
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री जी ने बताया है कि हरितालिका (हरितालिका तीज) व्रत के निर्णय के संदर्भ में धर्मशास्त्र और ज्योतिषीय … द्वितीया से युक्त तृतीया में व्रत कभी भी नहीं करना चाहिए।
स्कन्द पुराण एवं व्रतराज का प्रमाण “द्वितीयाशेषसंयुक्तां यः करोति विमोहितः। दुःखशोकभयैर्युक्तः स यात… जागरण कब है हरितालिका तीज का व्रत? पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री जी ने शंका का समाधान दूर किया तिथि को लेकर। 14 सितंबर 2026 में व्रत रखा जाएगा।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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