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पीएम ने मुख्य न्यायाधीश के सरकारी आवास पर गणेश आरती, पूजा अर्चना की तो आलोचना व सियासी पारा चढ़ा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 50 को न्यायपालिका व कार्यपालिका प्रमुखों को आपसी निजी बातचीत या महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में मिलने जुलने के खिलाफ नहीं देखा जा सकता?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50 कानून के शासन को बनाने, सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने पर ज़ोर देता है- एड. के.एस. भावनानी

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र। वैश्विक स्तर पर करीब दुनियां के हर देश में राजनीतिक क्षेत्र में दो पार्ट होते हैं, पक्ष व विपक्ष जिसमें एक सशक्त विपक्ष की भुमिका पक्ष यानें सत्ताधारी दल पर अत्यंत पैनी नजर रखना है। उनके नेता से लेकर छोटे से कार्यकर्ता के हर कार्यक्षण पर तीखी पैनी नजर रखना है, व शासन प्रशासन की कार्य प्रणाली व कार्यों का भी मूल्यांकन करते रहना है, ताकि किसी भी पॉइंट या कमजोर कड़ी पर आम जनता की भलाई के लिए उसे घेरा जा सके, ठीक उसी तरह पक्ष का भी काम रहता है कि वह विपक्ष की कार्यप्रणाली, दिनचर्या, बयानों पर नजर रखें कहीं सिर्फ टांग खींचने का कार्य तो नहीं कर रहे हैं? जिसका हम सटीक उदाहरण पिछले दो दिनों से देख रहे हैं, जिसमें पहले विपक्ष के नेता द्वारा अमेरिका में भारत विरोधी संसद सदस्य से मिलने व कुछ बयानों पर, पक्ष कटाक्ष कर शाब्दिक बाण दाग रहा है, तो विपक्ष पलटवार कर रहा है। ठीक उसी तरह दूसरा बुधवार दिनांक 11 सितंबर 2024 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के आमंत्रण पर माननीय पीएम के गणेश पूजा व आरती करने उनके सरकारी आवास पर शामिल हुए व प्रसाद लेकर चले गए तथा एक्स ट्विटर पर पोस्ट पर, गणेश पूजा में जस्टिस चंद्रचूड़ के साथ अपनी तस्वीर पोस्ट कर लिखा के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ के घर गणेश पूजा में शामिल हुआ भगवान गणेश हम सबको सुख समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करें।

बस! एक्स पर पोस्ट आते ही पूरी सोशल मीडिया पर तहलका मच गया! सियासी आलोचनाएं व वार पलटवार तेजी से शुरू हो गए जो अब तक चल रहा है। विपक्षी पार्टी के बड़े-बड़े नेता व सुप्रीम कोर्ट के बड़े-बड़े वकील इस शाब्दिक सियासी जंग में उतरे हुए हैं। उधर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, अनेक मंत्री व सताधारी पार्टी के अधिकृत वक्ताओं के भी बयानों की झड़ी लग गई है।चूंकि भारतीय पीएम ने भारत के सीजेआई के घर गणेश आरती पूजा अर्चना की तो आलोचनाओं व सियासी पारा, पलटवार तेज हुआ है।भारतीय संविधानके अनुच्छेद 50, न्यायपालिका व कार्यपालिका द्वारा आपसी निजी बातचीत या महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में मिलने जुलने के खिलाफ नहीं देखा जा सकता। इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आलेख के माध्यम से चर्चा करेंगे, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50 कानून के शासन को बनाने, सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने पर जोर देता है।

साथियों बात अगर हम माननीय पीएम के सीजेआई के निमंत्रण पर सरकारी बंगले में गणेश आरती और पूजा अर्चना में शामिल होने से विवाद उठने पर पक्ष विपक्ष में शाब्दिक बाणों की करें तो, भारत के संविधान में कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका के अलग-अलग होने और उनकी स्वतंत्रता को लेकर भी कई लोग अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दवे ने कहा है कि चीफ जस्टिस का पीएम को निमंत्रण देना और पीएम का उसे स्वीकार दोनों ही गलत हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील आनंद पीएम के चीफ जस्टिस के घर जाने को अच्छी मिसाल मानते हुए कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि जो पहले नहीं हुआ, वह कभी नहीं हो सकता।

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पीएम का सीजेआई के आवास पर जाना एक अच्छी मिसाल है। इस पर भारी विवाद खड़ा हो गया है। कुछ लोग इसे न्यायपालिका की पवित्रता पर दाग की तरह देख रहे हैं तो एक वर्ग विरोधियों की बौखलाहट देख खुशी का इजहार कर रहा है। एक ओर सीजेआई न्यायपालिका का सर्वोच्च पद है। दूसरी तरफ पीएम कार्यपालिका के शीर्ष पदों में से एक पर विराजमान हैं। ऐसे में जब सीजेआई का न्योता पीएम को जाएगा तो उन्हें ठुकराने की कम ही गुंजाइश रहती है। संभवतः इसी वजह से पीएम ने सीजेआई के यहां जाना वाजिब समझा और गए भी। पीएम ने सोशल मीडिया के जरिए खुद इसकी जानकारी भी दी। सीजेआई इसी साल 10 नवंबर 2024 को रिटायर हो रहे हैं। इस बीच उन्होंने कई अहम मामलों की सुनवाई भी की है।

पीएम के सीजेआई के घर जाने पर कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी एंड रिफॉर्म्स यानी (सीजेएआर) ने भी बयान जारी किया है। वकीलों के इस समूह ने कहा है, न्यायपालिका पर संविधान की रक्षा करने और बिना किसी भय या पक्षपात के न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। इसे कार्यपालिका से पूरी तरह से स्वतंत्र माना जाना चाहिए। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन और बीजेपी के राज्यसभा सांसद ने भी इस विवाद पर बयान दिया है। उनका कहना है, जो लोग ऐसा बयान दे रहे हैं वो ख़ुद जान रहे हैं कि इससे किसी फ़ैसले पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। ये एक धार्मिक कार्यक्रम था, वहां हमारे पीएम ने पूजा की अगर किसी दूसरे तरह की मीटिंग होती तो वो गुप्त मीटिंग होती।

इस बीच बीजेपी नेता संबित पात्रा ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को निशाने पर लिया। उन्होंने सवाल खड़े किए कि देश के पीएम अगर सीजेआई से मिलते हैं तो आपको आपत्ति होती है, क्या लोकतंत्र के दो स्तंभ को आपस में दुश्मनी रखनी चाहिए, हाथ नहीं मिलाना चाहिए? उन्होने भी दावा किया कि मनमोहन सिंह के इफ़्तार में सीजेआई शामिल होते थे। उन्होंने इसी मौके पर विपक्षी नेता के विदेश यात्रा पर भी सवाल खड़े किए और विपक्ष से कई तरह के सवाल पूछे।जाने माने वकील भूषण ने पीएम के गणेश पूजा में शामिल होने के लिए सीजेआई के घर जाने को जजों के कोड ऑफ कंडक्ट से भी जोड़ा है।उनके मुताबिक यह पीएम के लिए पूरी तरह अनुचित है कि वो एक निजी कार्यक्रम के लिए सीजेआई के आवास पर जाएं। एक धार्मिक कार्यक्रम का सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शन करना भी पीएम और सीजेआई के लिए अनुचित है।

सीजेआई के घर पर गणपति पूजा में पीएम के शामिल होने के बाद शुरू हुए विवाद पर कांग्रेस नेता और वकील सिब्बल ने भी रिएक्शन दिया है। उन्होंने कहा है कि सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों को किसी निजी आयोजन का प्रचार नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी को खुद को ऐसी परिस्थिति में नहीं डालना चाहिए, जिसकी वजह से लोग किसी संस्था पर सवाल उठाएं। अब इस वाकये ने विवाद का रूप ले लिया। विपक्ष भारत के संविधान के आर्टिकल 50 की याद दिलाने लगे हैं, जिसमें सेपरेशंस ऑफ पॉवर यानि शक्तियों के विभाजन की बात करनी शुरू कर दी। ये कहा गया ऐसी चीजें ठीक नहीं, शक पैदा करती हैं।

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साथियों बात अगर हम पूर्व प्रधानमंत्री व पूर्व सीजेआई की व्यक्तिगत मुलाकातों व कार्यक्रमों में मिलने की करें तो, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील दवे ने मीडिया से बातचीत में बताया कि न्यायमूर्ति वैंकटचलैया ने अपने कार्यकाल में ख़ुद जजों के पालन के लिए कोड ऑफ कंडक्ट बनाए थे।उनका कहना था कि सभी जज उनका पालन करते रहे हैं। एन. वेंकटचलैया साल 1993-94 के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। दवे का कहना है कि मनमोहन सिंह के आवास पर इफ़्तार का जो कार्यक्रम हुआ था वह एक सार्वजनिक कार्यक्रम था और उसमें सभी लोग आमंत्रित थे। पहले कभी भी पीएम या राजनीतिक व्यक्ति इस तरह से मुख्य न्यायाधीश के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए हैं। दवे के मुताबिक चंद्रचूड़ के पिता ख़ुद सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस थे और उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता के साथ ही न्याय होना और न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए। मौजूदा चीफ जस्टिस के पिता वाईवी चंद्रचूड़ साल 1978 से साल 1985 के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश थे।

इस विवाद वरिष्ठ वकील आनंद का दावा है कि जजों के लिए ऐसा कोई कोड ऑफ कंडक्ट नहीं है। उनके मुताबिक पीएम और सीजेआई अलग-अलग कार्यक्रमों में मिलते रहे हैं और इस मामले में भी पीएम गणेश पूजा में शामिल होने के लिए निजी घर नहीं बल्कि सरकारी आवास में गए थे और यह सार्वजनिक मुलाक़ात थी।उनका मानना है, इससे पहले कोई पीएम सुप्रीम कोर्ट नहीं आए थे, लेकिन पीएम आए थे और लोगों से मिले थे। ऐसा नहीं है कि जो पहले नहीं हुआ, वह कभी नहीं हो सकता। पीएम का सीजेआई के आवास पर जाना एक अच्छी मिसाल है। वरिष्ठ वकील दवे के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का जज रहते हुए जस्टिस पीएन भगवती ने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को एक चिट्ठी लिख दी थी, उसके बाद इस पर बहुत बड़ा बवाल हुआ था। उस वक़्त जस्टिस भगवती ने साल 1980 में इंदिरा गांधी की चुनावी जीत पर बधाई देते हुए एक चिट्ठी लिखी थी।

दवे का मानना है कि जस्टिस चंद्रचूड़ का पीएम को निमंत्रण देना और पीएम का उनके आवास पर जाना दोनों गलत है। इस तस्वीर को प्रसारित करना भी गलत है। वे कहते हैं कि सीजेआई को ऐसा करने से पहले एक हज़ार बार सोचना चाहिए था। दुसरी ओर खुद गजेंद्र गड़कर ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि नेहरू के बाद पीएम बने लालबहादुर शास्त्री, जिनकी नैतिकता और सार्वजनिक जीवन में शुचिता की भावना पर शायद ही कोई सवाल उठा सके, वो शास्त्री जी भी सीजेआई के पद पर आसीन गजेंद्र गड़कर को अपने घर पर बुलाते थे। गजेंद्र गड़कर अपनी आत्मकथा में बड़ी ही बेबाकी से लिखते हैं कि एक बार शास्त्री जी ने कहा कि वो उनके साथ घर में बैठकर भोजन करना चाहते हैं, अपनी पत्नी के साथ, बिना किसी औपचारिकता के, कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर बात करने के लिए, गजेंद्र गड़कर ने हां भरी और शास्त्री के साथ भोजन किया।क्या इससे माना जाए कि शास्त्री ने सेपरेशन ऑफ पावर के सिद्धांत का उल्लंघन किया।

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एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी : संकलनकर्ता, लेखक, कवि, स्तंभकार, चिंतक, कानून लेखक, कर विशेषज्ञ

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भारतीय पीएम ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के सरकारी आवास पर गणेश आरती, पूजा अर्चना की तो आलोचना व सियासी पारा चढ़ा, वार पलटवार तेज। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 50 को न्यायपालिका व कार्यपालिका प्रमुखों को आपसी निजी बातचीत या महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में मिलने जुलने के खिलाफ नहीं देखा जा सकता?भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50 कानून के शासन को बनाने, सत्ता के दुरुपयोग को रोकने के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने पर जोर देता है।

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

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