निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: दिल्ली की मंडियों तक पहुंचने वाली गेहूं की हर बोरी सिर्फ अनाज नहीं होती। उसमें एक पूरा मौसम छिपा होता है — ठंडी रातें, धुंध वाली सुबहें, जनवरी की ठिठुरन और फरवरी की हल्की धूप। लेकिन अब यही मौसम की लय टूट रही है।
Climate Trends की नई रिपोर्ट “Wheat Under Stress: Climate Change, Rising Heat, and Adaptation Pathways in India’s Major Wheat-Growing States” ने साफ चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन अब भारत की खाद्य सुरक्षा के भीतर घुस चुका है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और हर साल करीब 107 मिलियन टन गेहूं पैदा करता है।
लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में सर्दियों का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। सबसे बड़ा खतरा दिन की गर्मी नहीं, बल्कि रातों का गर्म होना है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- रात का तापमान दिन की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। गुजरात में रात का तापमान दिन से तीन गुना तेज बढ़ा है।
- फरवरी अब सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना बन गया है — 2010 से 2025 के बीच हर दशक में 0.69 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी।
- रात की गर्मी पौधों में respiration बढ़ाती है, जिससे दाने भरने की प्रक्रिया (grain filling) प्रभावित होती है। नतीजा: दाने सिकुड़ जाते हैं, वजन कम हो जाता है और गुणवत्ता गिर जाती है।
- पंजाब और हरियाणा में पिछले तीन दशकों में गेहूं की उत्पादन वृद्धि दर लगातार घटी है। हरियाणा में 1986-95 के बीच वृद्धि दर 30% थी, जो 2015-2025 में माइनस 2.6% तक पहुंच गई।
किसानों की ज़मीनी हकीकत
गुजरात के किसान राम सिंह बताते हैं:
“पहले गेहूं को सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता था, लेकिन अब कुछ महीनों में ही अनाज खराब होने लगता है। अक्टूबर की गर्मी में बीज ठीक से अंकुरित नहीं होते। फरवरी-मार्च की अचानक गर्मी दानों को जल्दी सुखा देती है। कटाई के समय बारिश हो जाए तो पूरी फसल बर्बाद।”
कीटों का हमला बढ़ा है, नमी बढ़ने से भंडारण मुश्किल हो गया है और कई परिवार खेती छोड़ने तक लगे हैं।
विशेषज्ञों की चिंता
डॉ. पलक बल्यान (Climate Trends Research Lead) कहती हैं:
“रात का तापमान बढ़ना गेहूं उत्पादन के लिए सबसे चिंताजनक खतरा है।”
आरती खोसला (Climate Trends Founder & Director) का कहना है:
“अब छोटे-छोटे coping measures काफी नहीं होंगे। Climate-smart agriculture, early warning systems और parametric insurance को तेजी से बढ़ाना होगा।”
उमेंद्र दत्त (Kheti Virasat Mission) जोर देते हैं कि मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने की जरूरत है। Mulching, crop residue management, indigenous seeds और organic farming जैसे उपाय अब survival strategy बन गए हैं।
आगे का रास्ता
रिपोर्ट IMD के 2026 मानसून अनुमान (90% L.P.A.) और मजबूत El Niño की आशंका के बीच आई है। भारत में गेहूं सिर्फ एक फसल नहीं — यह करोड़ों लोगों की रोटी, गांव की अर्थव्यवस्था और रसोई की कहानी है।
निष्कर्ष: बदलता मौसम अब सिर्फ किसानों की समस्या नहीं रह गया। यह धीरे-धीरे हर भारतीय की थाली तक पहुंचने वाली कहानी बनता जा रहा है। समय रहते अनुकूलन और सस्टेनेबल खेती की दिशा में बड़े कदम उठाए बिना खाद्य सुरक्षा को खतरा गहराता जाएगा।
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