SIR: Election Commission officials begin review meeting in Alipurduar

बंगाल में SIR प्रक्रिया के बीच मतदाताओं का संघर्ष: ऑक्सीजन मास्क लगाकर पहुंचे 80 साल के बुजुर्ग, फर्श पर रेंगकर आए दिव्यांग

  • ब्लॉक कार्यालयों में लंबी कतारें, 80 साल के बुजुर्ग से लेकर दिहाड़ी मजदूर तक परेशान

कोलकाता | 5 जनवरी 2026: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का दूसरा चरण शुरू होते ही ब्लॉक कार्यालयों और सुनवाई केंद्रों पर तनावपूर्ण हालात देखने को मिल रहे हैं।

राज्य के ग्रामीण और शहरी इलाकों में बुजुर्ग, बीमार, दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर मतदाता यह साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि वे “वैध” मतदाता हैं।

ऑक्सीजन मास्क लगाए 80 वर्षीय बुजुर्गों को रिश्तेदार गोद में उठाकर ला रहे हैं, जन्म से दिव्यांग मतदाता फर्श पर रेंगते हुए कार्यालय पहुंच रहे हैं और दिहाड़ी मजदूर रोज़ी-रोटी छोड़कर सुनवाई में शामिल होने को मजबूर हैं। ये दृश्य प्रशासनिक आश्वासनों और जमीनी हकीकत के बीच गहराते अंतर को उजागर कर रहे हैं।

Bengal sir hearing

58 लाख नाम हटे, 1.67 करोड़ मतदाता जांच के दायरे में

निर्वाचन आयोग ने 16 दिसंबर को पहले चरण के बाद मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की थी, जिसमें 58 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.08 करोड़ रह गई।

दूसरा चरण 27 दिसंबर से शुरू हुआ है, जिसमें 1.67 करोड़ मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो रही है। इनमें

  • 1.36 करोड़ मतदाता “तार्किक विसंगतियों” के कारण चिह्नित किए गए हैं,

  • जबकि 31 लाख रिकॉर्ड्स में गंभीर समस्याएं बताई जा रही हैं।

“मैं क्यों साबित करूं कि मैं मतदाता हूं?”

पश्चिम मेदिनीपुर के देबरा ब्लॉक की 87 वर्षीय स्नेहलता भक्त 32 किलोमीटर का सफर तय कर एसआईआर कार्यालय पहुंचीं। उनकी हालत देखकर ब्लॉक विकास अधिकारी बाहर आए, दस्तावेज देखे और उन्हें वाहन में लौटने की अनुमति दी।

स्नेहलता ने सवाल उठाया, “मैं इतना पैसा क्यों खर्च करूं और इतना कष्ट सहूं, सिर्फ यह साबित करने के लिए कि मैं एक मतदाता हूं?”

SIR in bengal

बीमार, दिव्यांग और मजबूर मतदाता

  • 65 वर्षीय झरना दास, जो गंभीर रूप से बीमार और चलने में असमर्थ हैं, उन्हें भाई कंधे पर उठाकर सुनवाई केंद्र तक लाए।

  • जन्म से दृष्टिहीन दीपांकर दास, जिनका नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज था, बोले—

    “मैं देख नहीं सकता, फिर भी मुझे यहां आना पड़ा।”

  • पुरुलिया के बालारामपुर में 80% दिव्यांग श्याम सिंह सरदार को ब्लॉक कार्यालय के फर्श पर रेंगते हुए पहुंचना पड़ा, क्योंकि वहां व्हीलचेयर उपलब्ध नहीं थी।

    “कम से कम हमारे लिए घर पर सुनवाई होनी चाहिए थी। यह असहनीय उत्पीड़न है।”

रोज़गार पर भी असर

दिहाड़ी मजदूरों के लिए यह प्रक्रिया दोहरी मार साबित हो रही है। नारायणगढ़ के मिस्त्री श्यामल कोटल ने कहा, “परिवार का गुजारा मेरी मजदूरी से चलता है, लेकिन अगर नाम कट जाता तो उससे भी बड़ा नुकसान होता।”

निर्देश हैं, लेकिन अमल में कमी

निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों में घर पर सुनवाई और विशेष छूट का प्रावधान है, फिर भी कई मामलों में संवेदनशील मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के नोटिस भेजे गए।

परिवारों को मौखिक आश्वासन मिलते हैं, लेकिन लिखित नोटिस में कार्यालय आने को कहा जाता है—यही विरोधाभास सबसे बड़ी परेशानी बन रहा है।

SIR in bengal1

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने आरोप लगाया है कि एसआईआर की प्रक्रिया के कारण 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले वास्तविक मतदाता वोट से वंचित हो सकते हैं

वहीं, भाजपा का कहना है कि यह पुनरीक्षण मतदाता सूची की शुचिता और पारदर्शिता के लिए ज़रूरी है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

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