केशव कुमार भट्टड़, कोलकाता। सभी स्वागत करते हैं, तो नए साल को सबके यहाँ आना चाहिए, पर यह चकमा दे जाता है, बहुतों के यहाँ नहीं आता। देश में सदियाँ बदल जाती है, पर साल वही का वही रह जाता है। हमारे देश में वह अधिकाँश के यहाँ आता ही नहीं। पता नहीं किसके यहाँ अटका पड़ा रहता है।
सोचने पर लगता है कि नया साल तो आता है, पर वह आकर सिर्फ कैलेण्डरों से चिपक जाता है, डायरियों के पन्नों में जाकर छिप जाता है, जीवन में नहीं आता है। याद है बेकेट का नाटक ‘वेटिंग फ़ॉर गोडो’, उसके दोनों दुःखी, बेरोजगार आवारे पात्र गोडो की प्रतीक्षा करते हैं कि वह आकर उन्हें दुःखों से मुक्त कर देगा, पर वह वायदा करके भी नहीं आता, हर शाम संदेश भेज देता है कि वह आज नहीं कल आएगा।
लगता है, नया साल भी उसी तरह बार-बार आश्वासन देकर नहीं आता। वही सबकुछ- युद्ध, हत्याएं, बलात्कार, आत्महत्या, ठगी, तनाव भरी राजनीतिक बयानबाजी, घोटाले, चरित्रहनन, चीखते-मुर्गा लड़ाते न्यूज़ एंकर, दुर्घटनाएं, हल्की और उकसाती राजनीति। गिरता भाषाई स्तर। तनाव है। ओह नो!

बकौल शायर अमीर कजलबख़्स – यकुम जनवरी है, नया साल है/दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है।
पर क्या किसी प्रतीक्षा में, किसी इंतज़ार में, किसी आशा में जीते जाना ही जीवन है ? इसी में जीते जाने का आनंद है? यदि मुक्ति की प्रतीक्षा के साथ मुक्ति का संकल्प भी जुड़ जाये, तो क्या जीवन बदलेगा नहीं? मुक्ति के लिए संघर्ष करनेवाला जीवन क्या सार्थक नहीं हो जाएगा?
परेशानियों को जानते हुए भी, परेशानियों में रहते हुए भी एक दिन हंस-गा लेना, क्या यह बड़ी बात नहीं है? मौत का एक दिन मुअय्यन है, तो क्या रात भर करवटें बदलते रहें, सोये नहीं?
जिंदगी में एक क्षण की हंसी-खुशी का भी महत्व है। साल का पहला दिन संकल्पों का भी होता है-जिंदगी के बारे में जिंदादिली से सोचो- ‘नहीं आने वाले नया-साल’ को लाने का संकल्प- संकल्प करो- ‘इसे’ लाना ही है। संकल्प अपने लिए, अपने सुखी भविष्य के लिए करो।
संकल्प देश के लिए, अपने देश की खुशहाली के लिए करो और किसी के समझाने से नहीं, अपनी खुशहाली को गहराई से खुद समझो। राजनीति की भेड़ नहीं, राजनीति का गड़रिया बनने का संकल्प करो। इतिहास का जीवन नहीं, आज का जीवन रचने का संकल्प करो।
अपनी सामूहिकता की ताकत को पहचानो। देख लो – अरावली पर्वतमाला फिलहाल सुरक्षित है।सेंगर फिलहाल जेल में ही बंद है।गिग वर्कर्स अपने संघर्ष को सफलता की तरफ लेकर आगे बढ़ रहे हैं।
इन सब को भी देख लो – नया लेबर बिल शोषण का नया औजार है। बिजली कंपनियां पिछले दरवाजे से नया मीटर लगाने पर आमादा हैं। जंगल काटे जा रहें हैं। देश में आर्थिक असमानता और बेरोजगारी चरम पर हैं। मनरेगा को ध्वंश कर उससे गांधी बाहर निकाल दिए गए हैं।
घुसपैठिया शब्द राजनीति का नया हथियार है। घुसपैठिये देश में जितने नहीं है उससे कई गुणा ज्यादा भाषणों में है। बिहार चुनाव में 10000 रुपये का मास्टरस्ट्रोक खेला गया। केंद्रीय चुनाव आयोग ने अपनी रीढ़ किसी म्यूजियम में रखवा दी है।
बंगाल सरकार के मंत्री और नेता भ्रस्टाचार में धरें जा रहें हैं। शिक्षक भर्ती के लिए रिश्वत लेनेवाले पीड़ितों को अब नए आश्वासन बांट रहे हैं। डॉक्टरी हो या वकालात, छात्राएं सब जगह असुरक्षित हैं। संविधान भी लगता है मार्गदर्शन मंडल का सदस्य बना दिया गया है।
विदेशी कहकर भारतीय भारतीयों को ही मार रहे हैं। बंगाल में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर संकट में है। क्या देश और क्या प्रदेश – समरथ को नहीं दोष गुसाईं- अब लोकतंत्र का नया मंत्र है। करन सके सोई कर ले, मन नहीं धड़काता, जय लक्ष्मी माता।
महिला विश्वकप क्रिकेट में भारत का परचम लहराया। पिछले साल चंद्र मिशन सफल हुआ था, अब हम मंगल की टोह ले रहे हैं, सूर्य को पढ़ रहे हैं, नीरज चोपड़ा ने पदक जीता था, देश की बेटियों ने हॉकी में भी परचम फहराया था। खेलों में, विज्ञान में जीवन का स्पंदन बचा हुआ है। राजनीति और सांप्रदायिकता का गठजोड़ जीवन के स्पंदन पर हमलावर है, इसे भी देख लो।
तो संकल्प करो नया साल लेकर आएंगे। वो सुबह हमीं से आएगी, वो सुबह हमीं तो लाएंगे। लानी ही है वो खुशगवार सुबह क्योंकि अब भी फूल खिल रहें हैं, बच्चे खेल रहे हैं, खिलखिला रहें हैं। यही शुकुन है। वाओ, यस! इनके सुखद भविष्य के लिए, जीवन के लिए नया साल मिलकर लाएंगे। लाना ही है।
तो बीत गयी सो बात गयी- कहकर आगे बढ़े। भोर हुई लो रात गयी, कहकर आगे बढ़ो। कुछ ना भूलते हुए, सबकुछ याद रखते हुए मिलकर आगे बढ़ो। इंकलाब को जिंदाबाद करो। अंगड़ाई लेकर उठ जाओ। उदासीनता तोड़कर आशा के गीत गाओ। जिंदा है तू जिंदगी की बात कर…
जिंदगी की बात करो। दुनिया अंधेरे के गर्त में नहीं डूबेगी,रोशनी अभी शेष है।
नए दिन की शुभकामनाएं। आपके ‘आज’ से संकल्पों के आगाज की शुभकामनाएं। ठक-ठक दस्तक देते ‘नया-साल’ की शुभकामनाएं।
कवि पंत के शब्दों में –
“नव-स्फूर्ति भर दे नव-चेतन /टूट पड़ें जड़ता के बंधन; शुद्ध, स्वतंत्र वायुमंडल में/ निर्मल तन, निर्भय मन हो! प्रेम-पुलकमय जन-जन हो, नूतन का अभिनंदन हो!
नूतन वर्ष पर आपके नूतन संकल्पों का अभिवादन-अभिनंदन। प्रेम-पुलकमय जन-जन का, आप सबका अभिवादन-अभिनंदन।
साकारात्मक सोचें, नया रचें-निर्माण करें, सार्थक का चयन करें। जिंदगी बहुत खूबसूरत है।
केशव कुमार भट्टड़
महासचिव,
कोलकाता राजस्थान सांस्कृतिक विकास परिषद

लेखक
(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)
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