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विनय सिंह बैस की कलम से – जामुन के लिए पीठ का रंग जामुनी कराने वाला ‘बाल गुनहगार’

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। कुछ वर्ष पूर्व तक हमारे गांव ‘बरी’ का दक्षिणी और पश्चिमी भाग ज्यादातर ऊसर ही हुआ करता था। इन दो दिशाओं में दूर-दूर तक फैले ऊसर में कुछ भी न उगता था। बाहर से लोग आते तो लगता कि किसी ने इन दो दिशाओं के एक बड़े क्षेत्र में आग लगा दी हो, सब कुछ जल कर नष्ट हो गया हो। ऐसा वीरान दिखता था हमारा गांव जैसे धरती माँ यहां श्रृंगार करना ही भूल गई हों। कुछ रिश्तेदार चिढ़ाते कि जिस गांव में सब कुछ बरा हुआ, जला हुआ दिखे, समझ जाओ वही गांव बरी है, किसी से पता पूछने की जरूरत नहीं है।

लेकिन हमारे गांव के बूढ़े-बुजुर्ग बताते हैं कि हमारा गांव सदैव से उसरहा नहीं रहा है। एक समय बरी गांव में खूब पेड़-पौधे हुआ करते थे। हमसे एक पीढ़ी पहले तक घर के बिल्कुल पास वाला जानवरों का चारागाह जो अब लगभग ऊसर में बदल चुका है, यहां कभी बाग हुआ करती थी। विडंबना यह कि इसका नाम अभी भी ‘बाग’ है लेकिन इसमें 2-3 बबूल के पेड़ को छोड़कर और कोई बड़ा वृक्ष नहीं है।

कहते हैं कि बाग बगीचों वाले इस गांव को ऊसर में बदलने के लिए पास की नहर जिम्मेदार है। शारदा नहर की शाखा हमारे गांव में आने के बाद धान, गेहूं और अन्य कई फसलों की पैदावार खूब बढ़ी। गांव का भूजल स्तर भी बढ़ गया, हमारे गांव में अब भी 30-40 फुट में आराम से पानी मिल जाता है। लेकिन फसलों के लिए वरदान साबित हुई यह नहर पेड़-पौधों के लिए अभिशाप साबित हुई। पानी रुकने, लगातार सीलन रहने से बाग नष्ट होने लगे।

बबूल, नीम, कंजी जैसे वृक्षों का तो अधिक नुकसान न हुआ लेकिन फलदार वृक्षों के मामले में हमारा गांव कंगाल होता गया। आम के बस गिने-चुने पेड़ बचे रह गए। एक हमारा खुद का बड़ा वाला आम का पेड़, एक कृपाल दादा का चुचुनिहा, एक जोधे बाबा का पेड़, 2-3 भारत बाबा के और एक देसी तथा एक मीठे, बड़े आम वाला जुगनू पा-सी का कलमी आम का नया पेड़। बस इतने ही आम के पेड़ पूरे गांव में बच पाए थे।

इसी तरह जामुन के पेड़ भी गिने-चुने ही थे। एक राठौर फूफा का घर के बिल्कुल पास बगिया वाला जामुन का पेड़, तीन पेड़ ‘मौसिया’ के घर के पिछवारे थे। हालांकि वह हमारे पापा के मौसिया थे, पर जैसा कि गांवों में अक्सर होता है, हम लोग भी उनको मौसिया ही कहते थे। मौसिया के जामुन वाले पेड़ एक तरह से समाजवादी थे, उन पर सबका हक़ था। कोई भी, कभी भी उन पर चढ़कर या नीचे से बिन के जामुन खा सकता था। राठौर फूफा वाली जामुन पर कुछ प्रतिबंध था।

मौसिया और राठौर फूफा के पेड़ में गल्लेहवा (नीम के गल्ले/निम्बौरी जैसी छोटी और गोल) जामुन लगती थी। इसलिए उनकी खास डिमांड न थी। पूरे गांव की सबसे बढ़िया और स्वादिष्ट जामुन सरदार कमार के पेड़ में लगती थी। उसमें फरेंद (लंबी, बड़ी , खूब गूदेदार, शहद जैसी मीठी) जामुन लगती थी। फरेंद जामुन सबसे पहले पक जाती थी। हरी से लाल होते ही उसमें मिठास आ जाती थी। पूरी पकने यानि काली होने पर उसका स्वाद बिल्कुल शहद जैसा हो जाता था।

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हमने अपने बड़ों से ‘अमृत’ के बारे में सुना था कि उसे पीकर लोग अमर हो जाते हैं, वह केवल स्वर्ग में पाया जाता है, उसका स्वाद दैवीय होता है आदि आदि। हमें उस समय पूरा विश्वास था कि स्वर्ग वाला अमृत चखने पर कैसा भी लगता हो लेकिन धरती का अमृत तो सरदार कमार के पेड़ की काली, बिल्कुल पकी फूली हुई फरेंद जामुन ही है। ऐसी जामुन जो जीभ में रखते ही मानो अपने आप घुल जाती थी और पीछे छोड़ जाती थी ऐसा अद्भुत स्वाद जिसकी मिठास आज दशकों बाद भी मेरे ज़ेहन में है। मुझे तो अब यह भी विश्वास हो चला है कि शायद इसी पेड़ की जामुन का दिव्य स्वाद लेने के बाद ही हमारे पूर्वजों ने भारतवर्ष को ‘जम्बूद्वीप’ कहा होगा।

गर्मी की छुट्टियों में हम बच्चों के गैंग का मुख्य लक्ष्य सरदार कमार की जामुन के पेड़ से जामुन खाने का रहता था। यह हमारा प्लान ए था। प्लान बी में राठौर फूफा और मौसिया वाली जामुन रहती थी। पापा और सभी घरवाले हमारे लक्षण जानते थे इसलिए हमारे ऊपर कड़ी निगरानी रखते कि भयंकर लू वाली दोपहरी में यह लोग कहीं बाहर न जाने पाए। लेकिन हम शैतान बच्चे पापा के खर्राटे भरते ही (पापा की सबसे अच्छी बात थी कि वह सोते ही खर्राटे लेने लगते थे), इससे हमें ग्रीन सिग्नल मिल जाता था। उनके सोते ही हम चार बच्चों का कुख्यात गैंग सरदार कमार के जामुन की तरफ भाग पड़ता था।

गैंग के हर सदस्य का रोल पहले से ही तय होता था। एक सदस्य सरदार कमार के घर की तरफ का माहौल देखने के लिए जाता। दूसरा सदस्य जामुन के पेड़ के नीचे खड़ा रहता और दो सबसे होशियार और तेज़ सदस्य पेड़ के ऊपर चढ़ जाते। दस मिनट से भी कम समय में हमें मिशन को अंजाम देना होता था। क्योंकि सरदार कमार या उनके परिवार के किसी सदस्य के आने के डर के साथ ही हमें पापा के जाग जाने का भी डर रहता था। तय समय और तमाम बाह्य दबावों में कठिन और चुनौती पूर्ण कार्य को सफलता पूर्वक अंजाम देने का हुनर हमने वहीं से सीखा।

हमारे दो-तीन अभियान सफल रहे तो हमारा हौंसला बढ़ गया था। हमने अपने अभियानों की बारंबारता बढ़ा दी। ज्यादा जामुन टूटने लगी तो सरदार कमार का परिवार भी कुछ अधिक सतर्क हो गया। ऐसे ही किसी एक अभियान में हमारे शुरुआती चरण तो सफल रहे लेकिन अंतिम चरण में हम पहचान लिए गए। पूरा हाथी निकल गया था, बस पूछ फंस गई थी। हुआ यूं कि सरदार कमार ने हमें जामुन के पेड़ से कूद कर भागते हुए देख लिया था। उन्होंने उसी शाम बाबा से शिकायत कर दी कि – “भाई, तुम्हरे घर के लरिका भरी दुपहरिया मां जामुन टूरे आवति हैं। हमका देखिन तो बंदार की नई कूदि के भागे लागि। जामुने खाय का रहा तो हमसे मांग लेति, हम देइ देति। रोज सबेरे किलवन बेकारे मां गिरी पड़ी रहति है। यहि तरह कूद-फांद करिहें तो अपनिन हाथ-पांय खरिका कर ल्याहैं।”

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(भाई, तुम्हारे घर के बच्चे भरी दुपहरी में जामुन तोड़ने आते हैं। जैसे ही हमको देखा तो बंदरों की तरह कूद कर भागने लगे। जामुन ही खानी थी तो हमसे मांग लेते। रोज सबेरे कई किलो जामुन यूँ ही जमीन पर गिरी पड़ी रहती है। इस तरह कूद-फांद करेंगे तो किसी दिन अपने ही हाथ-पैर तुड़वा बैठेंगे।”)

बाबा (भाई बाबा) ने हमसे पूछा तो हम लोग साफ मुकर गए। उस समय तक हमारी जीभ से भी जामुन खाने के निशान मिट चुके थे। फिर भी बाबा को हमारी सफाई पर विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि हम लोगों की कई कारस्तानी उन्हें पहले से पता थी। इसलिए उन्होंने हमें बड़े प्यार से समझाया कि- “लरिको, हमारि बात ध्यान से सुनो अउवर यहिका गाँठि बाँधि लियो। जामुनि केरि डार बहुतै नाजुक होति है। तिनको चूक्यो तो समझो जमीन मां आ गयो। हड्डी-पसुरी सब टूटि जइहैं। अगर अबकी बार पकरे गैव तो हमसे बुरा कोउ न होई।

(बच्चा लोग, मेरी बात ध्यान से सुनो और इसे गांठ बांध लो। जामुन के पेड़ की डाल बहुत नाजुक होती है। जरा सी असावधानी होने से गिरकर चोट लगने की बहुत अधिक संभावना है। फिर चेतावनी भी दी कि अगर पकड़े गए तो अंजाम बुरा होगा।)”

इस शिकायत के बाद अब हमारे ऊपर और कड़ी निगरानी नजर रखी जाने लगी। हमारे ऊपर पहरा बढ़ा दिया गया, जेल की अदृश्य दीवारें चाक चौबंद कर दी गईं। खुफिया विभाग सक्रिय कर दिया गया। हमारी हर गतिविधि पर नजर रखी जानी लगी। दोपहर के समय तो हम सुसु करने भी जाते तो कोई हमारे पीछे-पीछे जाता।

इस कड़ी निगरानी का परिणाम यह हुआ कि पूरे एक सप्ताह तक हम घर से कहीं नहीं निकल पाए। लेकिन अब गर्मी की छुट्टियां खत्म होने को थी और अगले सोमवार से हमारे विद्यालय खुलने वाले थे। हमें गांव से वापस लालगंज कस्बे आना था। इसलिए हमसे न रहा गया। हमने एक आखिरी प्रयास करने का निर्णय लिया। राहत यह रही कि एक सप्ताह की कड़ी निगरानी के बाद खुफिया विभाग भी कुछ शिथिल हो गया था इसलिए हमारा गैंग सबसे बचते-बचाते मिशन को अंजाम देने के लिए चल पड़ा। इस बार हमने फूल प्रूफ प्लानिंग कर रखी थी- सबके रोल तय थे, केवल इशारों में बात होगी, कोई भी हँसेगा नहीं, हल्ला नहीं मचाएगा। लालच बिल्कुल नहीं करेगा। जितने जामुन आसानी से मिल जाएं, बस उतने तोड़ कर भाग लेना है।

उस दोपहर हमने अपनी बनाई हुई एसओपी के अनुसार पूरी होशियारी से कुछ जामुन तोड़कर खाये और कुछ जामुन तोड़कर सफलता पूर्वक अपने साथ बांधकर ले लाए। मिशन इम्पॉसिबल, पॉसिबल हो गया। हमारा मिशन सौ प्रतिशत सफल रहा था। घर से लेकर बाहर तक किसी को कानो कान खबर नहीं लगने दी हमने। बांधकर साथ लाए जामुनों को हमने एक छोटी सी पानी की बाल्टी में रखकर घर के सबसे पीछे वाले कमरे में छुपा दिया ताकि अगले दिन अमृत का स्वाद फिर से लिया जा सके।

लेकिन शायद हमारी इस सफल कहानी का क्लाइमेक्स होना अभी बाकी था। शायद उस दिन हम लोगों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी। सफलता पूर्वक घर से निकल गए थे, जामुन खाने और लाने के कार्य में भी हम बिल्कुल डिस्टिंक्शन से पास हुए। लेकिन जामुन छुपाकर घर में घुसते समय अम्मा ने हम लोगों को पकड़ लिया और कड़क आवाज में पूछा कि यह ‘चांडाल चौकड़ी’ कहां से आ रही है। हम लोग पूरी मासूमियत से बोल दिए कि घर के पीछे छुपम-छुपाई खेल रहे थे। अम्मा बोली जिस तरह तुम लोग पसीने-पसीने हो रहे हो, ऐसा नहीं लगता कि तुम लोग कहीं छाया में खेल रहे थे। जरूर तुम लोग इस भयंकर गर्मी वाली दुपहरी में सरदार कमार के पेड़ से जामुन तोड़ने गए होगे??

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हम लोग हमेशा की तरह साफ मुकर गए। लेकिन अम्मा को हम पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ। वह बोली-” ठीक है। सब लोग अपनी जीभ दिखाओ।”
फिर वही हुआ, जो होना था। कुछ देर के बाद हमारी जीभ के साथ-साथ पीठ का रंग भी जामुनी हो गया।

(विनय सिंह बैस)
जामुन के लिए पीठ का रंग जामुनी कराने वाला ‘बाल गुनहगार’

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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1 thoughts on “विनय सिंह बैस की कलम से – जामुन के लिए पीठ का रंग जामुनी कराने वाला ‘बाल गुनहगार’

  1. श्रीराम पुकार शर्मा
    श्रीराम पुकार शर्मा says:

    बहुत ही सुंदर बाल संस्मरण। सबके बचपन की घटनाओं में फल को चोरी कर खाना और मुकर जाना, बहुत समय हुआ करती है। ऐसी ही घटनाएं व्यक्ति को आजीवन अमृत रस प्रदान किया करती हैं।

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