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विचार से कर्म तक विद्यासागर का दर्शन : विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विमर्श

तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। उन्नीसवीं सदी के महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर के विचारों और उनके कर्म के बीच संबंध को समझने की कोशिश मंगलवार से विद्यासागर विश्वविद्यालय के परिसर में शुरू हुई। विश्वविद्यालय के दर्शन एवं जीवन-जगत विभाग की पहल पर “ईश्वरचंद्र विद्यासागर का दर्शन एवं जीवन-जगत-विचार से कर्म में रूपांतरण” विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ।

ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों में आयोजित इस सेमिनार का उद्घाटन विभाग के कक्ष संख्या 210 में विद्यासागर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर तथा पौधों में जल अर्पित कर किया गया।

उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक कुमार कर, स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य संकाय के प्रभारी अधिष्ठाता अरिंदम गुप्ता तथा रजिस्ट्रार जयंत किशोर नंदी उपस्थित रहे। वहीं University of Peradeniya के दर्शन विभाग की प्रमुख नमाली कुमारी हंडेगामा ऑनलाइन माध्यम से इस सत्र से जुड़ीं।

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ प्रोफेसर तपन कुमार दे ने किया। स्वागत भाषण में विभागाध्यक्ष झाड़ेश्वर घोष ने कहा कि विद्यासागर केवल विद्वान या समाज सुधारक भर नहीं थे, बल्कि विचार और कर्म के अद्भुत समन्वय के प्रतीक थे। उनका चिंतन समाज के वास्तविक जीवन से जुड़ा हुआ था और मानव कल्याण उसकी केंद्रीय धारा थी।

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कुलपति दीपक कुमार कर ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि विद्यासागर की चिंतनधारा एक ओर संस्कृत न्याय दर्शन की तर्कप्रधान परंपरा से प्रेरित है, तो दूसरी ओर पाश्चात्य ज्ञानोदय के युक्तिवादी दृष्टिकोण से भी प्रभावित है।

इन दोनों धाराओं का सृजनात्मक समन्वय उनके दर्शन को विशेष आयाम देता है। उन्होंने कहा कि विद्यासागर के दर्शन का अंतिम लक्ष्य समाज में न्याय, समानता और मानव पीड़ा का निवारण था।

विशेष अतिथि के रूप में अरिंदम गुप्ता तथा सम्मानित अतिथि के रूप में जयंत किशोर नंदी ने भी अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर पापिया गुप्ता ने किया।

उद्घाटन सत्र के बाद मुख्य व्याख्यान श्रुतिनाथ चक्रवर्ती ने दिया। उन्होंने पहले और दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता भी की। चर्चा में शिवाजी प्रतिम बसु तथा उत्कल विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर नंदिनी मिश्रा ने भाग लिया।

आयोजकों के अनुसार सेमिनार के दूसरे दिन के सत्र की अध्यक्षता भी श्रुतिनाथ चक्रवर्ती करेंगे। वक्ताओं में कलकत्ता विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर प्रियंबदा सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय वक्ता के रूप में नमाली कुमारी हंडेगामा शामिल होंगी।

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सेमिनार का उद्देश्य उन्नीसवीं सदी में सामाजिक चेतना के अग्रदूत रहे विद्यासागर के दर्शन, मानवतावाद और सामाजिक कर्म के अंतर्संबंधों को नई दृष्टि से समझना है। विशेष रूप से महिला शिक्षा, विधवा विवाह, भाषा सुधार और सामाजिक न्याय की स्थापना में उनके योगदान का वर्तमान संदर्भ में पुनर्मूल्यांकन इस चर्चा का केंद्र है।

देश-विदेश के शोधकर्ता, शिक्षक और छात्र इस सेमिनार में भाग ले रहे हैं। शोध पत्र प्रस्तुतियों और तकनीकी सत्रों के माध्यम से विद्यासागर के विचारों की ऐतिहासिक तथा दार्शनिक प्रासंगिकता पर व्यापक विमर्श जारी है।

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