कोलकाता हिन्दी न्यूज | 03 सितम्बर 2026:वंदे मातरम के स्थायी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 29 और 30 अगस्त को कोलकाता में किया गया।
“भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में वंदे मातरम की पहचान” शीर्षक वाली इस संगोष्ठी में अंतर-अनुशासनात्मक संवाद हुआ।
यह आयोजन साहित्य अकादमी द्वारा भारतीय संग्रहालय, पूर्वी क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (EZCC), संस्कृत कॉलेज और विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन साहित्यपथ और अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सहयोग से किया गया।
उद्घाटन और प्रमुख उपस्थिति
माननीया कुलपति प्रोफेसर नंदिनी साहू (हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल) उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि थीं और दूसरे दिन वक्ता तथा सत्र अध्यक्ष के रूप में भाग लिया।
उद्घाटन समारोह में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. माधव कौशिक, सचिव डॉ. वरुण गुलाटी, डॉ. आशीष गिरी, डॉ. सायन भट्टाचार्य और डॉ. सुदीप बसु उपस्थित रहे। उन्होंने संगोष्ठी के राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया।
प्रो. नंदिनी साहू का भाषण
अपने उद्घाटन भाषण में प्रोफेसर साहू ने वंदे मातरम की अंतर-अनुशासनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने ग्रीन कल्चरल स्टडीज, ब्लू ह्यूमैनिटीज, हिंदू स्टडीज, भारतीय ज्ञान प्रणाली, लोक साहित्य और स्मृति संस्कृति को एक साथ लाया।
उनकी प्रस्तुति ‘वंदे मातरम: भूमि, जल, भाषा और करुणा के माध्यम से राष्ट्र की कल्पना’ ने गीत को व्यापक सांस्कृतिक कल्पना में स्थापित किया, जहां परिदृश्य पहचान, प्रकृति स्मृति, भाषा अपनेपन और करुणा सामूहिक जीवन का आधार बन जाती है।
संगोष्ठी का फोकस
संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों और विषयों के विद्वानों ने भाग लिया। चर्चा वंदे मातरम को केवल देशभक्ति रचना के रूप में समझने से आगे बढ़कर उसे राष्ट्र, प्रकृति, भाषा, स्मृति, पहचान और सभ्यतागत चेतना से जुड़े जटिल सांस्कृतिक पाठ के रूप में देखने की दिशा में रही।
निष्कर्ष:
यह संगोष्ठी वंदे मातरम की बहुआयामी पहचान पर गंभीर बौद्धिक संवाद का मंच बनी और राष्ट्रगीत को सांस्कृतिक तथा पारिस्थितिक दृष्टिकोण से समझने की नई दिशा देती है।
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