निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: भारत में उर्वरक सब्सिडी लंबे समय से किसानों के लिए राहत का बड़ा साधन रही है। लेकिन अब यही व्यवस्था सरकार के बजट, मिट्टी की सेहत और ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ा रही है।
Institute for Energy Economics and Financial Analysis (IEEFA) की नई फैक्टशीट “India’s massive fertiliser subsidy needs an immediate overhaul” में गहरे संरचनात्मक जोखिम उभरकर सामने आए हैं।
लगातार बढ़ता सब्सिडी बिल
फैक्टशीट के मुताबिक पिछले छह वर्षों से यूरिया सब्सिडी का खर्च ₹1 लाख करोड़ से अधिक बना हुआ है। चालू वित्त वर्ष में यह ₹1.17 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। कुल उर्वरक सब्सिडी पिछले पाँच वर्षों से हर साल ₹1.5 लाख करोड़ से ऊपर बनी हुई है।
अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 तक यह करीब ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है।
आत्मनिर्भरता या छिपी निर्भरता
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में यूरिया उत्पादन बढ़ाने के लिए कई नए संयंत्र शुरू किए हैं। 2023–24 में घरेलू उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। लेकिन यूरिया बनाने के लिए बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है।
भारत में सस्ती घरेलू गैस सीमित है, इसलिए उर्वरक उद्योग अब तेजी से आयातित एलएनजी पर निर्भर होता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार घरेलू यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली गैस का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा अब एलएनजी से आता है।
मिट्टी की सेहत पर असर
सब्सिडी व्यवस्था का एक और असर खेतों में दिखाई देता है। भारत में उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का अनुपात महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन सस्ती यूरिया के कारण किसान अक्सर नाइट्रोजन आधारित उर्वरक ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार:
- 2010 में N:P:K अनुपात – 4:3.2:1
- 2020 में – 7:2.8:1
- 2024 तक – 10.9:4.1:1.68
यह असंतुलन मिट्टी की गुणवत्ता और फसल उत्पादकता दोनों को प्रभावित कर सकता है।
सब्सिडी सुधार की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा प्रणाली में सुधार के बिना समस्या बढ़ती जाएगी। आर्थिक सर्वेक्षण ने सुझाव दिया है कि यूरिया की खुदरा कीमत में थोड़ा सुधार किया जाए और उसी के बराबर राशि सीधे किसानों को प्रति एकड़ के आधार पर दी जाए।
इससे किसानों की क्रय क्षमता बनी रहेगी और उर्वरकों के बीच संतुलन भी सुधर सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा सवाल
उर्वरक सब्सिडी का सवाल अब सिर्फ कृषि नीति का मुद्दा नहीं रहा। यह ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ चुका है। जब यूरिया उत्पादन आयातित गैस पर निर्भर होता है, तब वैश्विक गैस कीमतों में हर उछाल का असर सीधे भारत के बजट और व्यापार घाटे पर पड़ सकता है।
इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि उर्वरक नीति, ऊर्जा नीति और कृषि सुधार को साथ लेकर चलने की जरूरत है।
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