Climate कहानी, कोलकाता | 6 नवंबर 2025 — संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट Adaptation Gap Report 2025: “Running on Empty” ने दुनिया को चेताया है कि जलवायु अनुकूलन फाइनेंस की रफ्तार तेज़ होते जलवायु संकट से बहुत पीछे है।
विकासशील देशों को 2035 तक हर साल कम से कम 310 अरब डॉलर की ज़रूरत होगी, लेकिन 2023 में यह मदद सिर्फ 26 अरब डॉलर रही — यानी 12 से 14 गुना का फंडिंग गैप।
🔥 एडेप्टेशन: खर्च नहीं, जीवनरेखा
- UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा:
“यह खर्च नहीं, जीवनरेखा है। अगर अभी निवेश नहीं किया गया, तो हर साल कीमत और भारी पड़ेगी।”
- UNEP प्रमुख इंगर एंडर्सन ने कहा:
“हीटवेव, बाढ़, सूखा और बढ़ती लागतें अब हर कोने में ज़िंदगी को प्रभावित कर रही हैं।”
रिपोर्ट की तस्वीर: प्लानिंग बढ़ी, पैसा घटा रिपोर्ट बताती है कि अब 172 देशों के पास कम से कम एक एडेप्टेशन पॉलिसी या स्ट्रैटेजी है, लेकिन उनमें से 36 देश ऐसे हैं जहाँ यह नीति दस साल पुरानी हो चुकी है।

सिर्फ़ चार देश ऐसे हैं जिनके पास अभी कोई राष्ट्रीय योजना नहीं है।देशों ने अपने Biennial Transparency Reports (BTRs) में 1600 से ज़्यादा एडेप्टेशन एक्शन की रिपोर्ट दी है, मुख्यतः जैवविविधता, कृषि, जल और इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में।
लेकिन ज़्यादातर देशों ने अभी तक यह नहीं बताया कि इन कदमों का असर ज़मीन पर कितना हुआ है, जैसे पानी की उपलब्धता, खेती की उपज या इकोसिस्टम की बहाली में क्या सुधार आया।
📊 रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| आवश्यक फंडिंग | 2035 तक हर साल 310–365 अरब डॉलर |
| मौजूदा फंडिंग | 2023 में सिर्फ 26 अरब डॉलर |
| नीति स्थिति | 172 देशों के पास एडेप्टेशन नीति, लेकिन 36 की नीतियाँ 10 साल पुरानी |
| असर मूल्यांकन | 1600+ एक्शन रिपोर्ट हुए, लेकिन ज़मीनी असर का डेटा कम |
| निजी क्षेत्र योगदान | सिर्फ 5 अरब डॉलर/वर्ष, जबकि क्षमता 50 अरब डॉलर तक |
रिपोर्ट कहती है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट का लक्ष्य, यानि 2019 के स्तर से एडेप्टेशन फाइनेंस को दोगुना कर 2025 तक 40 अरब डॉलर तक पहुँचाने का वादा, पूरा नहीं हो पाएगा।
यह भी सामने आया कि COP29 के “New Collective Quantified Goal (NCQG)” के तहत विकसित देशों ने 2035 तक हर साल कम से कम 300 अरब डॉलर का क्लाइमेट फंड देने का संकल्प लिया, पर इसमें mitigation और adaptation दोनों शामिल हैं।
यानि असल एडेप्टेशन हिस्सा इससे बहुत कम रहेगा।अगर 3% वार्षिक महंगाई दर जोड़ी जाए, तो 2035 तक एडेप्टेशन ज़रूरत 440 से 520 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगी, जिसका मतलब है कि यह फंडिंग भी काफी नहीं होगी।
❗ अधूरे वादे और नाकाफी लक्ष्य
- ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट का लक्ष्य था 2025 तक एडेप्टेशन फंडिंग को 40 अरब डॉलर तक दोगुना करना — मौजूदा रुझानों से यह अधूरा रहेगा
- COP29 के NCQG के तहत 2035 तक 300 अरब डॉलर सालाना का वादा है, लेकिन इसमें mitigation और adaptation दोनों शामिल हैं
- 3% महंगाई दर जोड़ने पर 2035 तक एडेप्टेशन ज़रूरत 440–520 अरब डॉलर तक पहुँच सकती है
रिपोर्ट ने Baku to Belém Roadmap का ज़िक्र किया है, जो 2035 तक 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने की योजना पर आधारित है। इसका मकसद है क्लाइमेट रेज़िलिएंट और लो-कार्बन डेवलपमेंट को बढ़ाना।
लेकिन UNEP ने आगाह किया है कि अगर यह पैसा कर्ज़ के रूप में आया, तो यह कमज़ोर देशों पर नया बोझ बन जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि इसमें ग्रांट, कन्सेशनल फाइनेंस और नॉन-डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स को प्राथमिकता दी जाए।
🛣️ ‘Baku to Belém’ रोडमैप: उम्मीद और चेतावनी
- 1.3 ट्रिलियन डॉलर जुटाने की योजना
- UNEP ने चेताया:
“अगर यह पैसा कर्ज़ के रूप में आया, तो यह कमज़ोर देशों पर नया बोझ बन जाएगा”
- ज़रूरत है ग्रांट, कन्सेशनल फाइनेंस और नॉन-डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स की
अभी तक निजी क्षेत्र का योगदान सिर्फ़ 5 अरब डॉलर प्रति वर्ष है, जबकि रिपोर्ट के अनुसार यह क्षमता 50 अरब डॉलर तक पहुँच सकती है, यानि कुल ज़रूरत का लगभग 15-20% हिस्सा।
लेकिन इसके लिए सरकारों को नीतिगत प्रोत्साहन और “ब्लेंडेड फाइनेंस” मॉडल अपनाने होंगे, जहाँ सार्वजनिक पैसा जोखिम कम करे और निजी निवेश को बढ़ावा मिले।
💼 निजी क्षेत्र की भूमिका
- अभी योगदान सिर्फ 5 अरब डॉलर/वर्ष, जबकि 50 अरब डॉलर तक की क्षमता
- ज़रूरत है ब्लेंडेड फाइनेंस मॉडल की, जहाँ सरकारी निवेश जोखिम कम करे और निजी निवेश को आकर्षित करे
🧭 निष्कर्ष: अब वक्त है पुल बनाने का, वादों से आगे बढ़ने का
रिपोर्ट का शीर्षक “Running on Empty” इस संकट की गंभीरता को दर्शाता है। नीतियाँ और लक्ष्य तो हैं, लेकिन फंडिंग नहीं है। विकासशील देशों के लिए यह सिर्फ़ जलवायु अनुकूलन का नहीं, बल्कि सर्वाइवल का सवाल बन चुका है।
अगर यह फाइनेंस गैप नहीं भरा गया, तो तापमान से पहले अर्थव्यवस्थाएँ और ज़िंदगियाँ टूटेंगी।
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