“उगहूँ सुरुज देव अरग के बेर, हो अरग केर बेर, हो पूजन केर बेर”

श्री राम पुकार शर्मा, हावड़ा । विगत छः दिनों से लगभग घर-घर में दुर्गा माई विराजमान हैं, सर्वत्र ही नवरात्रि का सुमंगल वातावरण और सुमंगल गीत गुंजित है और गत कल से ही चतुर्दिक ‘केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय’, ….. ‘काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’, ….. ‘सेविले चरन तोहार हे छठी मइया महिमा तोहर अपार’, ….. ‘उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर’, ….. ‘निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे’, …… ‘चार कोना के पोखरवा’, …… ‘हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी’ आदि छठी मइया और सुरुजदेव सम्बन्धित सुमधुर गीतों से सम्पूर्ण परिवेश ही आध्यात्मयुक्त बन गया है।

पावन चित्र माह का प्रारम्भ विगत शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (2 अप्रैल से ही हो चुका है, चूकि यह माह श्रीविष्णु जी के अवतार स्वरूप श्रीराम जी से संबंधित है। एक ओर जहाँ धरती (श्रीलक्ष्मी) श्यामल-पीताभ आवरण धारण कर अपने स्वामी श्रीराम (श्री विष्णु) का स्वगत करती है, वहीं दूसरी ओर सनातनी जनमानस अपने कृषि-कार्य सहित उनके विविध रूपों की आराधना में इस पवित्र चैत्र माह का उपयोग करते हैं। आराधना की इस प्रक्रिया में अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना यथा, – नववर्ष स्वागत, नवरात्रि पालन, श्रीराम जन्मोत्सव, श्री हनुमान जन्मोत्सव आदि रूपों में होती ही रहती है और इसके बाद ही प्रारम्भ हो जाती है, मूलतः बिहार की संस्कृति और आस्था का द्योतक पावन ‘छठ पूजा’ की तैयारी।

छठ पूजा पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल प्रकृति से सम्बन्धित एक हिंदू सामूहिक त्यौहार है, जिसमें छठ व्रती और प्रकृति की आराधना के बीच कोई मूर्ति या पुरोहित शामिल नहीं होते हैं। छठ व्रती ही पुजारी और पुरोहित हुआ करते हैं। इस पूजा में प्रयुक्त सभी वस्तुएँ बिना काट-छाँट के अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही प्रयोग किये जाते हैं। यह पूजा सूर्य, उषा, प्रत्युषा, प्रकृति, जल और वायु को पूर्ण समर्पित है। इस पर्व के माध्यम से व्रती पृथ्वी पर जीवन की रक्षा सम्बन्धित देवताओं और अवयवों की उपासना कर उन्हें धन्यवाद ज्ञापन करते हैं। इस पर्व से व्रती को सुख, समृद्धि, सौभाग्य आदि की प्राप्ति होती है।

छठ पर्व वर्ष भर में दो बार मनाया जाता है, चैत्र माह में और कार्तिक माह में। इन दोनों अवसरों में ही शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाये जाने के कारण इसे ‘छठ’ पर्व की संज्ञा दी गई है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ‘ऊषा’ और ‘प्रत्यूषा’ हैं। उनकी उपासना ही चार दिवसीय महान छठ पर्व है, जिसका प्रारम्भ चतुर्दशी के ‘नहाय-खाय’ की श्रद्धा और शुद्धता की रीति से होता है। फिर यह पंचमी के ‘खरना’ या ‘लोहंडा’, उसके अगले दिन षष्ठी को संध्या में किसी पुण्यसलिला-जलाशयों में कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्यदेव की अंतिम किरण ‘प्रत्युषा’ को और फिर उसके अगले दिन सप्तमी को प्रातः बेला पुनः उसी पुण्यसलिला या जलाशय में कमर भर पानी में खड़े होकर प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरण ‘ऊषा’ को अरग (अर्ध्य) प्रदान कर इन दोनों शक्तियों को ही ‘छठी मइया’ के रूप में संयुक्त आराधना की जाती है।

छठ पर्व और ‘ठेकुआ’ एक-दूसरे के पूरक ही हैं, जो गेहूँ के आटे से व्रती द्वारा स्वनिर्मित होता है। इसके अतिरिक्त चावल के ‘कचवनिया’ या ‘कसार’, खेतों में उपजे सभी नए साबूत फल-कन्द-मूल, गन्ना, हल्दी, नारियल, नींबू (बड़ा), पके केले आदि से बांस की बनी हुई ‘दउरा’ और ‘सूप’ को सजाकर घर का पुरुष उसे अपने माथे पर धारण कर और उसके पीछे व्रती छठी मैया और सुरूजदेव के विनती-गीत गाते हुए घाट पर जाते हैं। इस पर्व को विशेषकर महिलाएँ करती हैं, पर अब बड़ी संख्या में पुरुष भी इस पर्व को करने लगे हैं, क्योंकि छठ पर्व लिंग, जाति, सम्प्रदाय, अमीर-गरीब आदि के बन्धनों से परे है। यही कारण है कि अब तो अनेक इस्लाम अनुयायी भी छठ पर्व को मानते हुए घाटों पर देखे जाते हैं। इस पूजन प्रक्रिया में छठी मइया और सुरुजदेव को प्रसन्न करने सम्बन्धित गीत अनवरत गाये जाते हैं।

वैदिक काल से चला आ रहा छठ पर्व बिहार की संस्कृति का अभिन्न अंग है, बल्कि इसका अटूट सम्बन्ध बिहारियों के हृदय से जुड़ा हुआ है। सम्पूर्ण बिहार मे इस पर्व को बहुत ही धुम धाम से मनाया जाता है। अब तो इस पर्व का प्रचलन बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तर-पूर्वी मध्य प्रदेश, सम्पूर्ण झारखंड सहित केवल पूरे भारत में ही नहीं, वरन भारत के बाहर प्रवासी बिहारियों के साथ विश्वभर में प्रचलित हो गया है।

छठ पूजा की धार्मिकता के साथ ही सामाजिक महत्व भी है। इस पर्व को लोग धार्मिक भेदभाव, ऊंच-नीच, जात-पात को भूलकर सभी एक साथ सामूहिक रूप में इसे मनाते हैं। सब एक समान एक ही विधि से पूजा करते हैं। सब एक साथ पुण्यसलिला या जलाशय के तट पर अपने हाथों में पूजन-सामग्री से सजे सूप लिये एक जैसे ही दिखते हैं। सब एक समान ही सूर्यदेव को अर्घ्य देते है। प्रसाद भी एक जैसा ही होता है, जैसे कि गंगा (जलाशय) और भगवान भास्कर भी सबके लिए एक जैसे ही हैं। छठ बड़ा ही कठिन पर्व होता है, पर महिलाएँ अपने परिजन की सुख-सम्पन्नता और स्वस्थता के लिए इसे हँसते-गाते सहन कर लेती हैं I चार दिनों के लगातार उपवास सहित व्रती जीवनगत समस्त सुखों को त्यागती है, फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं, सिलाई विहीन कपड़ों का ही उपयोग करती है। इसमें सर्वत्र ही पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। यह सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।

छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न, पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है, तो केवल पास-पड़ोस के सहयोग की।

हिन्दू धर्म के विभिन्न देवी-देवताओं में सूर्य ही एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिन्हें साक्षात् दर्शन किया जा सकता है, जो जगत की सृष्टि और पालन हेतु आधुनिक समस्त उर्जाओं के एकमात्र श्रोत हैं। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पायी जाती है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसन्धान के क्रम में इस सत्य को पहचाना, जिसे आज वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर सिद्ध किया है कि विटामिन ‘डी’ का एकमात्र श्रोत सूर्य का प्रकाश ही है। इस अद्भुत पारलौकिक शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सम्भवतः सभ्यता के विकास के साथ-साथ ही प्रारम्भ हो गयी।

भारत में सूर्योपासना का इतिहास ऋगवेद काल से रहा है। फिर विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि से होता हुआ मध्य काल में आते-आते छठ सूर्योपासना के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो आज तक अनवरत चला आ रहा है। कहा जाता है कि लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसी तरह महाभारत काल में सूर्य के परम भक्त सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे। पांडवों की पत्नी महारानी द्रौपदी ने भी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्यदेव की उपासना किया करती थीं।

भारत में अनेक सूर्य मन्दिर हैं, पर छठ पूजा के लिए बिहार प्रान्त के कुछ प्रसिद्ध सूर्य मंदिर – बड़ार्क (बड़गांव, नालंदा), देवार्क (देव, औरंगाबाद), उलार्क (उलार, पालीगंज, पटना), पुण्यार्क (पंडारक, बाढ़), ओंगार्क (अंगोरी), बेलार्क (बेलाउर, भोजपुर), सूर्य मंदिर (गया) झारखंड प्रान्त में बुंडू, (राँची) आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। वैसे भी छठ पूजा के लिए मन्दिर की अपेक्षा किसी सलिला या जलाशय की ही आवश्यकता होती है।

श्रीराम पुकार शर्मा, लेखक

श्रीराम पुकार शर्मा
ई-मेल सम्पर्क – [email protected]

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