कोलकाता। महानगर की प्रसिद्ध सृजनशील एवं साहित्यिक संस्था बंगीय हिंदी परिषद में तुलसी एवं प्रेमचंद जयंती के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय ‘भारत की सांस्कृतिक एकता के संदर्भ में तुलसी और प्रेमचंद की प्रासंगिकता’ था। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने की।
विशिष्ट वक्ता के रूप में सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. आदित्य कुमार गिरि तथा परिषद के अध्यक्ष प्रियंकर पालीवाल उपस्थित थे। प्रधान वक्ता के रूप में कलकत्ता गलर्स कॉलेज की प्रिसिंपल डॉ. सत्या उपाध्याय उपस्थित थीं।
कार्यक्रम की शुरुआत परिषद् के मंत्री डॉ. राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी के स्वागत वक्तव्य से हुई। उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में अतिथियों एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए तुलसी एवं प्रेमचंद जैसे महान रचनाकार को भी श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ. आदित्य कुमार गिरि ने अपने वक्तव्य में एक ओर जहाँ तुलसी के काव्य में अपनापन और सामंजस्य जैसी प्रवृत्ति को रेखांकित किया वहीं दूसरी ओर प्रेमचंद की रचनाओं को, खासकर उनके निबंधों एवं पत्रों को बारीकियों से पढ़ने की हिदायत दी।
डॉ. सत्या उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में तुलसीदास के उन पहलूओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया जो अनछुए थे साथ ही उन्होंने तुलसी के पदों एवं दोहों को सुरों में पिरोया। प्रियंकर पालीवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमें तुलसी को ठीक से पढ़ने की जरूरत है हमने सुना बहुत है पढ़ा कम है।
प्रेमचंद का साहित्य हमें भारत की वास्तविक तस्वीर दिखाता है। अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने सभी वक्ताओं की प्रशंसा की तथा कहा कि तुलसी और प्रेमचंद आने वाली पीढ़ी के पथप्रदर्शक हैं।
संगोष्ठी में प्रमुख अतिथि के रूप में लक्ष्मण केडिया और रेशमी पांड्या मुखर्जी उपस्थित थीं। श्रोताओं में- मनोज मिश्र, शिप्रा मिश्रा, सपना खरवार, ज़ोया अहमद, शशिकला चौबे, राम पुकार सिंह, जीवन सिंह, कमल पुरोहित, प्रगति दुबे, गजेंद्र नाहटा, अमरनाथ आदि उपस्थित थे।
कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो. दिव्या प्रसाद ने किया और धन्यवाद ज्ञापन परिषद के निदेशक प्रो. रंजीत कुमार संकल्प ने किया।
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