IMG 20250816 WA0062

यात्रा वृत्तांत : तुतला भवानी मंदिर और तुतराही जल-प्रपात

श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। दक्षिणी-पश्चिमी बिहार के कैमूर पहाड़ी अंचल अंतर्गत रोहतास जिले में स्थित ‘तुतला भवानी मंदिर’ और उसके साथ ही ‘तुतराही’ या ‘तुतला भवानी जल-प्रपात’ (झरना) प्रकृति और आध्यात्म का सम्मिलित एक अद्भुत दृष्टांत प्रस्तुत करता है। यह माध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियों और उससे सम्बद्ध हरीतिमायुक्त सघन जंगल के बीच बसा हुआ, सुरम्य आध्यात्म और अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों से युक्त एक प्रसिद्ध पर्यटन-स्थल है। बिहार राज्य के दक्षिणी-पश्चिमी सीमांत प्रदेश में सैकड़ों फीट ऊँचाई वाली कैमूर पर्वतमालाएँ हैं, जो बहुत पहले कभी विंध्य पर्वत श्रेणी के ही विशेष अंश हुआ करते थे। इसी के उत्तरी-पूर्वी छोर पर विराजमान है, ‘तुतला भवानी मंदिर’ और उसी के साथ ही संलग्न है, ‘तुतराही’ या ‘तुतला भवानी जल-प्रपात’, जहाँ पर आध्यात्मिक और प्राकृतिक स्वरूप दोनों एक-दूसरे के साथ मिलकर एकाकार हो गए हैं। शहर के शोर और प्रदूषण से पूर्णतः मुक्त, तुतला भवानी, प्रकृति की सुरम्य गोद में स्थित एक बहुत ही आकर्षक स्थान है, जो निरंतर भक्त-जनों और प्रकृति-प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहता है।

बिहार राज्य के रोहतास जिला के डेहरी ऑनसोन से जदुनाथपुर सड़क मार्ग संख्या 119 पर लगभग 20 कि.मी. की दक्षिणी दूरी पर है, तिलाउथु बाजार। वहीं से दाहिनी ओर अपेक्षाकृत कुछ कम चौड़ी ग्रामीण सड़क तुतला भवानी मंदिर के स्वागत द्वार (7 कि.मी.) तक पहुँचा देती है। इस सड़क का नाम भी तुतला भवानी सड़क ही है। यहाँ उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूरब की ओर धनुषाकार स्वरूप में दो ऊँची पहाड़ियाँ हैं, उन्हीं दोनों के ठीक बीच लगभग कई मिलों तक फैली हरीतिमा युक्त घाटी है। इसी घाटी से होती हुई पत्थरों से निर्मित पहाड़ी कुछ ऊबड़-खाबड़ सड़क तुतला भवानी मंदिर की ओर जाती है। मुख्यतः यहीं से कैमूर वन-प्रदेश प्रारंभ होता है। इस वन-प्रदेश में जंगली-जंतुओं की बहुलता है। दिन में ज्यादातर बंदर ही दिखाई देते हैं। परंतु रात्रि में कई अन्य हिंसक जन्तु भी अक्सर दिख जाते हैं। अतः संध्या उपरांत इस वन अंचल घाटी में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।

वन-प्रदेश के पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने के उद्देश्य से ही स्वागत द्वार से तुतला भवानी मंदिर के करीब तक लगभग 1 मील की दूरी के आवागमन के लिए वन-विभाग द्वारा बैटरी चालित ऑटो गाड़ियाँ चलाई जाती है। अधिकांश प्रकृति-प्रेमी पैदल ही आवागमन करते हैं। चुकी यह सड़क विभिन्न औषधीय और अन्य पेड़-पौधों की सघन हरियाली घाटी के मध्य से होकर गुजरती है। फलतः यात्रीगण कई प्रकार के औषधीय-वनस्पतियों की खुशबू को भी महसूस करते हैं। बगल में ही बड़े-बड़े कठोर शैल-खंडों से होकर प्रवाहित ‘कछुअर’ नदी की कल-कल करती प्रवाहमयी जल-धारा के मंद स्वर, इस सघन घाटी में सुरम्य संगीत को निरंतर प्रसारित करती ही रहती है।

सड़क के दोनों किनारों पर और पेड़-पौधों पर अनगिनत बंदर अपने परिजन के साथ यात्रियों का इंतजार करते दिखाई देते हैं। सहृदय यात्रियों से उन्हें भी कुछ खाद्य-पदार्थ प्राप्य हो ही जाते हैं। नुकसान तो न पहुंचाते हैं, पर प्रसाद या फिर खाद्य-पदार्थ आदि अवश्य ही झपट लेते हैं। अन्यथा सड़क के किनारे बिल्कुल शांत और अपने परिजन सहित क्रीडा में मग्न सड़क की समाप्ति के बाद बड़े-बड़े शैल-खंडों युक्त कछुअर नदी घाटी को पार करने के लिए लगभग 100 मीटर लंबी ‘झूला-पुल’ से होकर जाया जाता है। इस झूला-पुल का लचीलापन और कंपन्न यात्रियों को एक अजीब-सा सुखद अनुभूति का एहसास दिलाता है।

यह भी पढ़ें:  #IRES: इंडिपेंडेंट रिसर्च एथिक्स सोसाइटी का 256वां आयुष समृद्धि इंटरनेशनल वेबिनार संपन्न

इसी तुतराही जल-प्रपात के बहुत ही पास में दाहिनी ओर, उसी दृढ़ प्राचीर सदृश कठोर पहाड़ में कुछ ऊँचाई पर एक चबूतरा है। यहाँ तक जाने के लिए झूला पुल से ही सम्बद्ध पक्की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इसी चबूतरे पर माँ जगद्धात्री महिषमर्दिनी दुर्गा की भव्य प्रतिमा है और इसके पार्श्व में एक प्राकृतिक खोह में एक अष्टभूजी मूर्ति स्थापित है, जिन्हें भक्तगण माता तुतला भवानी के नाम से पूजा-अर्चना करते हैं। इसे ही ‘तुतला-धाम’ या ‘तुतलेश्वरी भवानी मंदिर’ भी कहा जाता है। इसके दर्शन मात्र से ही भक्त जनों को आत्मीय और मानसिक शांति की अनुभूति होती है। माता तुतला भवानी के मंदिर की दीवारें गढ़वाल कालीन कला से संबंधित निर्मित दिखती हैं। उसके बहुत पास में ही चट्टान पर ऊपर-नीचे तीन भागों में बँटा एक शिलालेख दिखाई देता है, जो खरवार राजा प्रताप धवल देव से संबंधित है। इस पर मुद्रित लिपि के अनुसार यह सन् 1158, शनिवार, (वि० सं० 1214) को लिखवाया गया सिद्ध होता है।

माता तुतला भवानी, देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं, जो असुरों का वध करने वाली और भक्तों का कल्याण करने वाली हैं। स्थानीय निवासी इस देवी को शक्ति और न्याय की देवी के रूप में भी पूजते हैं। तुतला भवानी मंदिर का इतिहास 12 वीं शताब्दी से जुड़ा है। मंदिर के पास में ही दो शिलालेख भी मौजूद हैं, जिनमें से एक 8वीं शताब्दी का है और दूसरा 12वीं शताब्दी का बताया जाता है। दोनों शिलालेख संस्कृत की शारदा लिपि में लिखित है। उन्हीं में से एक शिलालेख के अनुसार खरवार राजा वीर प्रताप धवल देव ने यहाँ अष्टभूजी देवी की मूर्ति स्थापित की थी, जिनका शासन 12वीं शताब्दी में वाराणसी की सीमा से लेकर गया तक के विशाल कृषि मैदान में फैला हुआ था। एक शिलालेख में उन्होंने लिखवाया है कि इस स्थान पर पहले से स्थापित प्राचीन प्रतिमा टूट चुकी है, अत: मैं नई प्रतिमा स्थापित करा रहा हूँ। माँ महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति है। उक्त शिलालेख में इन्हें माँ जगद्धात्री दुर्गा कहा गया है।

इतिहासकार फ्रांसिस बुकानन ने भी अपने यात्रावृंत में लिखा है कि 19 अप्रैल 1158 में जपला नरेश राजा प्रताप धवलदेव ने माता तुतला भवानी की खंडित प्रतिमा को वहाँ से हटाकर नई (वर्तमान) प्रतिमा को प्रतिष्ठित की थी। तुतला भवानी मंदिर आध्यात्मिक शांति और आत्म-निरीक्षण के लिए एक आदर्श स्थान के रूप में भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि तुतला भवानी माता के दर्शन और उनकी पूजा-अर्चना से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। संभवतः इसीलिए साल भर इस मंदिर में भक्तजनों का आवागमन होते ही रहता है। लेकिन चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि त्योहार तथा श्रावण माह में भक्तजनों की बहुत भीड़ होती है। उस समय माता तुतला भवानी मंदिर के स्वागत द्वार (लगभग 1 मील की दूरी) के पास ही खुले मैदान में वृहद मेले का आयोजन हुआ करता है। रात-जागरण और भजन-कीर्तन भी हुआ करता है। प्रशासन और स्थानीय निवासी भक्तजनों की सेवा और सुरक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

यह भी पढ़ें:  ‘पराक्रम दिवस’ पर राष्ट्रीय कवि संगम द्वारा स्मरण किये गए नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

‘तुतला भवानी मंदिर’ के पार्श्व में ही दिखता है, दो विराट पहाड़ों के खंडित कठोर प्रस्तर की मजबूत, बहुत ऊँची प्राचीर और दोनों विराट पहाड़ों के मिलन-बन्दु, जिसकी ऊँचाई लगभग 180 से 200 फीट की होगी, वहीं से निरंतर नीचे की ओर गिरता हुआ, अतुलित धवल जल-राशि दिख पड़ता है। यही है, ‘तुतराही जल-प्रपात’। चुकी यह जल-प्रपात, तुतला भवानी मंदिर के ठीक द्वार पर है। अतः इसे ‘तुतला जल-प्रपात’ के नाम से भी जाना जाता है। यह कुछ मील दूर से ही अपने रजतवर्णी स्वरूप के कारण दिखने लगता है और यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित किए रहता है।

बरसात के मौसम में तुतराही जल-प्रपात अपनी पूरी भव्यता के साथ अत्यधिक शोर करते हुए गिरता है। यह जल-प्रपात प्रभात में सिंदूरी, दोपहर में रजतवर्णी और संध्या में पुनः मटमैली लालिमा रंगों में स्वयं को रंगे, अपने अद्भुत सौन्दर्य से सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। भले ही रात्रि में, यह ऊपर से नीचे की ओर लहराते हुए श्वेत चादर को ओढ़े, बड़ा ही भयावह प्रतीत होता होगा, परंतु चाँदनी रातों में, तो चंद्रोदय के साथ ही इसका भी सौन्दर्य उमड़कर कई गुना बढ़ जाता है।

फिर तो इसकी प्रतिबिंबित रजतवर्णी आभा दूर से ही लोगों के मन को आकर्षण की शक्ति में जकड़ लेता होगा, आगे बढ़ने ही नहीं देता होगा। खगोलीय नक्षत्र-पिंड भी इसके सौन्दर्य से अवश्य ही ईर्ष्या करने लगते होंगे ही। उस स्वर्गीय सम्मोहनकारी दृश्य की केवल कल्पना ही किया जा सकता है। पर यहाँ का शांत निर्जन वातावरण, गंभीर हरे-नीले पहाड़ी अंचल और उसमें कलकल के संगीतमय गीत सुनती बहती कछुअर नदी अवश्य ही आत्मीय और मानसिक सुकून प्रदान करती है।

‘तुतराही’ या ‘तुतला भवानी जल-प्रपात’ के शोर और फुहारे से पूरी घाटी ही यात्रियों को अद्भुत अनुभूति प्रदान करती है। इस जल-प्रपात के नीचे बने प्राकृतिक गंभीर जल-कुंड में नर्तन कर, इसकी अतुलित जल-राशि आगे की ओर बड़े-बड़े कठोर चट्टानों से टकराती हुई और उनके ऊपर चढ़ती-उतरती हुई कलकल की मधुर ध्वनि के साथ ही ‘कछुअर पहाड़ी नदी’ को उद्भूत करती है। बड़े-बड़े शिलाखंडों से होकर बहने के कारण इस कछुअर नदी का जल अपने कर्ण-प्रिय संगीत द्वारा वीरान घाटी और निर्जन जंगल में मंगल का गान करती हुई आगे बहती जाती है। अन्य नदियों और जल-प्रपातों के समान ही बरसात के दिनों में, यह तुतराही जल-प्रपात अतिशय जलराशि-सम्पदा को प्राप्त कर अपने विराट स्वरूप को धारण कर लेता है।

तब झूला-पुल से देवी तुतला भवानी के दर्शन हेतु आते-जाते भक्तजनों का अपने शीतल जल-फुहारों से अभिषेक कर उन्हें परम शांति प्रदान करता है। उसी के नीचे अनेक आगंतुकों को इसके शीतल जल में स्नान कर अपनी शारीरिक थकान को मिटाते और मानसिक सुख को प्राप्त करते देख कर मन को रोमांचित हो उठना स्वाभाविक ही है। यही कछुअर नदी आगे चलकर कुछ सकरी गहरी घाटी का निर्माण कर दक्षिणमुखी बहती हुई, बकनौर के पास सोन नदी में जा मिलती है। यह कछुअर नदी भी अन्य पहाड़ी नदियों की भाँति बरसात के सिवाय अन्य महीनों में लगभग जल-शून्य ही रहती है। लेकिन, बरसात में यह भी अपने रौद्र स्वरूप से सबको भयभीत करने का प्रयास करती है।

यह भी पढ़ें:  बक्सा बाघ परियोजना के जंगलों में दिखा दुर्लभ प्रजाति का जंगली कुत्ता, वन विभाग में छाई खुशी

तुतला भवानी मंदिर और तुतराही जल-प्रपात, दोनों ही एक-दूसरे के इतने पास हैं कि दोनों को अलग-अलग नहीं, वरन एक ही नाम-रूप से संबोधित किया जाता है। यह स्थान डेहरी ऑनसोन से लगभग 30 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। जिला मुख्यालय भभुआ से यह 90 कि.मी. और सासाराम से 37 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। आवागमन के लिए निजी गाड़ी ही सुविधाजनक रहेगा। वैसे तो तुतला भवानी मंदिर और तुतराही जल-प्रपात सालों भर लोग आवागमन करते हैं, परंतु प्राकृतिक दृश्यों से अभिभूत होने वाले सैलानियों के लिए श्रावण माह अत्यंत ही आकर्षक होगा।

श्रीराम पुकार शर्मा,
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com

ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च करफॉलो करें।

Kolkata News Desk Avatar

Kolkata News Desk

News Editor MA

कोलकाता और पश्चिम बंगाल की ब्रेकिंग न्यूज, स्थानीय घटनाओं, खेल, राजनीति और सामाजिक मुद्दों की खबरों को कवर करता है। हमारी डेस्क टीम 24×7 सक्रिय रहकर पाठकों को ताज़ा और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराती है।

Areas of Expertise: Sports, Politics & West Bengal
Fact Checked & Editorial Guidelines

Our Fact Checking Process

We prioritize accuracy and integrity in our content. Here's how we maintain high standards:

  1. Expert Review: All articles are reviewed by subject matter experts.
  2. Source Validation: Information is backed by credible, up-to-date sources.
  3. Transparency: We clearly cite references and disclose potential conflicts.
Reviewed by: Subject Matter Experts

Our Review Board

Our content is carefully reviewed by experienced professionals to ensure accuracy and relevance.

  • Qualified Experts: Each article is assessed by specialists with field-specific knowledge.
  • Up-to-date Insights: We incorporate the latest research, trends, and standards.
  • Commitment to Quality: Reviewers ensure clarity, correctness, and completeness.

Look for the expert-reviewed label to read content you can trust.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

nine − 7 =