श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। लालकुआँ से हल्द्वानी-भुवाली सड़क मार्ग से आगे बढ़ते ही मैदानी क्षेत्र की सुबह की कुछ शीतल मनोरम हवाएँ, क्रमशः कुछ गरम होने लगी। फिर बहुत जल्दी ही जून माह की प्रचंडता को याद दिलाने लगी। कहने पर चतुर ड्राइवर ने गाड़ी में ए.सी चला तो दिया, पर कहा, – ‘सर जी! पहाड़ों पर चढ़ते ही ठंड लगने लगेगी।’ यह ‘सर जी’ शब्द, उत्तराखण्ड-वासियों का आगंतुक के प्रति सम्बोधन शब्द है।
चतुर्दिक वन प्रदेश के प्रारंभ होते ही हमारी निगाहें, उसकी अतुलित हरीतिमा सुषमा सम्पदा में उलझने लगी। शहरी आँखें प्राकृतिक हरीतिमा दर्शन के लिए सदैव लालायित रहती हैं, हमारी भी यही दशा रही थी। फिर निरंतर ऊपर की ओर चढ़ती पहाड़ी सर्पदार घुमाव वाली सड़क पर कभी दाएँ, तो कभी बाएँ, जबरदस्त शारीरिक करवटें लेते हुए, हम आगे बढ़ते जा रहे थे। हमारी चाहत रही थी कि जल्दी ही हिमालय की सर्द फिज़ाओं से युक्त प्राकृतिक सुषमा की गोद में अवस्थित ‘भारत का स्वीटजरलैंड’ नाम से विख्यात कविवर सुमित्रानन्दन पंत जी का कौसानी गाँव पहुँच कर ही दम लिया जाए।
मेरे ही विद्यालय के हिन्दी साहित्य के सह-अध्यापक संतोष कुमार तिवारी तथा गणित के सेवानिवृत अध्यापक भृगुनाथ पाठक भी साथ हैं। दोनों, मेरी विगत कई यात्राओं में साथ देते आए हैं। इस बार प्रकृति के सुकुमार कवि ‘पंत’ जी के कौसानी गाँव दर्शन हेतु, उन दोनों को जबरन साथ खींच लाया हूँ। ‘पंत’ जी को बचपन से ही पढ़ते रहने और बाद में अपने विद्यार्थियों को निरंतर ‘पंत’ जी को पढ़ाते रहने के कारण, उनकी जन्म-स्थली कौसानी के प्रति, मेरी ललक ही कुछ अधिक रही है।
चढ़ाई, तो अब भी क्रमशः बढ़ती ही जा रही थी और उसी के अनुरूप ठंड भी क्रमशः बढ़ने लगी थी। ड्राइवर का कहना सत्य हुआ। गाड़ी का एसी बंद हो गया। ऊँचाई के साथ ही प्रकृति और हरीतिमा कुल में भी परिवर्तन दिखाई देने लगा। पहाड़ी कठोर कुरूप प्रस्तर-काया को काट कर बनाई गई, घुमावदार अजगर-सी सड़क की एक ओर ऊँचे गगनचुंबी अधनंगे पहाड़, तो दूसरी ओर गहरी श्यामल घाटियाँ और उनमें जहाँ-तहाँ रंगीन टिनों से छाए, छोटे-छोटे मकान, किसी चित्रकार के विस्तृत रंगीन चित्रपट के समान ही प्रतीत हुए।
मैदानी भागों के मध्यम ऊँचाई वाले साल, शीशम, सागवान, महुआ, आम, पीपल, बरगद आदि पेड़ तो बिल्कुल गायब ही हो गए और अब सैकड़ों फिट लम्बे, एकदम सीधे, वन-प्रहरी के समान देवदारू-चीड़ जैसे पेड़, पहाड़ी ढलान पर क्रमशः सघन होने लगे।
‘गिरिवर के उर से उठ-उठ कर, उच्चाकांक्षाओं से तरुवर,
हैं झाँक रहे नीरव नभ पर, अनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर। – ‘पर्वत प्रदेश में पावस’

पहाड़ी घुमावदार खतरनाक सड़क के कारण अपने ड्राइवर से बातचीत कर उसका ध्यान भंगकर, हम कोई अनहोनी विपत्ति को आमंत्रित न करना चाहते थे। लेकिन मार्ग में पड़ने वाले पर्यटक-स्थलों के बारे में ड्राइवर स्वतः ही बताते जा रहा था। घण्टों पहाड़ी सफर के बाद, अल्मोड़ा पर्वत शृंखला को पार कर, गाड़ी अब दूर तक फैली लगभग समतल प्राय सोमेश्वर घाटी में सरपट दौड़ने लगी। तापमान में पुनः बढ़ोतरी होने लगी। पर्वतीय राज्य उत्तरांखण्ड में आशा के विपरीत गर्मी। हमारी असह्य परिस्थिति को समझकर, ड्राइवर ने एसी को पुनः चला दिया। बहुत राहत मिली।
परंतु उस लंबी-चौड़ी घाटी को पार करते ही, फिर से पहाड़ी घुमावदार सड़क। साथ में चढ़ाई भी बढ़ने लगी। उसी के साथ ही पहले, तो मौसम सुहावन और फिर सर्द हो गई। एसी बंद हो चुका था। मात्र तीन-चार किलोमीटर की दूरी में ही लगभग 2500 फिट से भी अधिक की पहाड़ी चढ़ाई। कहीं-कहीं, तो 30 डिग्री ऊँचाई का कोण बनती हुई, गाड़ी चढ़ाई कर रही थी। तापमान में अचानक भयंकर परिवर्तन। ड्राइवर ने बताया कि यही तो उत्तराखंड की पर्वतीय मौसम की विशेषता है। खैर, बड़ी थकान और व्यग्रता भरी यात्रा के उपरांत, हम प्रकृति की रमणीय हरीतिमा के बीच कविवर ‘पंत’ जी की जन्म-स्थली और ‘भारत का स्वीटजरलैंड’ कौसानी पहुँच ही गए।
कौसानी, उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊँ पर्वतीय मण्डल के अंतर्गत बागेश्वर जिले की गरुड़ तहसील में कोसी और गोमती पहाड़ी नदियों की कल-कल करती धाराओं के मध्य समुद्रतल से लगभग 1900 मीटर (6232 फिट) की ऊँचाई वाले पिंगनाथ चोटी पर अवस्थित एक पर्वतीय गाँव है, जो अल्मोड़ा जिले से 53 किलोमीटर उत्तर में है। इसके चतुर्दिक सैकड़ों फिट सीधे ऊँचे और लम्बे चिड़-देवदारू-बलातू वृक्षों से परिपूर्ण कई पर्वत हैं। कौसानी, अपनी प्राकृतिक हरीतिमायुक्त सुषमा से सुरलोक की अनुभूति को प्रदान करने वाला एक प्रमुख पर्यटक स्थल भी रहा है। रहे भी क्यों, न? यहाँ से सुदूर उत्तर दिशा में स्थित हिमालय की बर्फीली नंदा देवी, त्रिशूल, पनचुली, हाथी माथा आदि उन्नत शिखर-चोटियाँ तथा बद्रीनाथ धाम आदि का स्वच्छ मौसम में बड़ा ही मनोभावन नजारा मिल जाया करता है।
कौसानी के पूर्वी पर्वतों के पीछे से सुबह में उदित सूर्य, अपनी सुनहली भगवा किरण-पताका को अपने कर-गहे, प्रतिदिन सबको जगाने आ जाते हैं। दूर की बर्फीली पर्वतीय चोटियाँ, अतुलित स्वर्ण-आभा से मंडित, सुनहरे दिन का स्वागत करती हैं। उसके साथ ही यहाँ की चतुर्दिक प्राकृतिक उपादान भी स्वर्णाभ युक्त सुनहली वस्त्रों को धारण कर करबद्ध निवेदन हेतु खड़े प्रस्तुत दिखाई देते हैं। जबकि उनमें छिपे बैठे विभिन्न जीव-जन्तु और पक्षी-समूह अपनी-अपनी मधुर ध्वनि को परस्पर सम्मिलित कर चारणों की भाँति कर्णप्रिय गीत और संगीत से उस दिव्य स्वर्ण-पुरुष का स्वागत करते हैं। फिर सारा दिन पर्वतीय चोटियाँ, रजतवर्णी आभूषणों को धारण कर सूर्य सहित आगंतुकों के मन को मोहने का कुटिल प्रयत्न करती रहती हैं।
पुनः संध्या-बेला में, एक बार फिर से, पीताभ-रक्तिम परिधानों में सजकर पर्वतीय चोटियाँ उस क्षीण रक्तिम दिवस को विदा करती हैं। इस कार्य में यहाँ की सम्पूर्ण प्रकृति अपनी सिंदूरी आभा के साथ उनका साथ देती है। विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु और पक्षी पुनः अपनी मधुर साम संगीत के साथ उस अस्तगामी रक्तिम गोलक को अगली सुबह पुनः आने की प्रार्थना करते हैं। ऐसी पावन अपनी मातृ-भूमि के रूप में ‘भारत भूमि का यशोगान’ करते कविवर ‘पंत’ जी न थकते हैं –
‘जननी जन्मभूमि प्रिय अपनी, जो स्वर्गादपि चिर गरीयसी!
जिसका गौरव भाल हिमाचल, स्वर्ण धरा हँसती चिर श्यामल,
ज्योति ग्रथित गंगा यमुना जल, वह जन जन के हृदय में बसी!’
लेकिन, दिवा-काल की समाप्ति के साथ ही क्या कौसानी का अद्भुत सौन्दर्य भी क्षीण होकर गायब हो जाएगा? नहीं जी, कदापि नहीं। जरा सब्र तो रखें। ऐसा भ्रम, मन में न ही पालें! कौसानी का सौन्दर्य, निशा काल में तो और भी उमड़ कर दुगुना हो उठता है। धीरे-धीरे एक-एक कर दीप्तिमान असंख्य प्रकाश-बिंदुओं से अलंकृत श्यामल शामियाना अनंत गंभीर कजरारे आकाश में चतुर्दिक तन जाता है। फिर पूर्व दिशा के कठोर पर्वत-प्राचीरों पर चढ़कर धवल-मुख चंद्र-इंदु श्वेत घूँघट डाले, मंद-मुस्कान के साथ मुक्त गगन में भ्रमण हेतु निकल आती है, जिसे देखकर पर्वतीय चोटियाँ भी गंभीर श्यामल रात्रि में रजतवर्णी स्वरूप में दमक उठती हैं। मानो कि हिमालय के उन्नत शिखर पर विराजमान जटाधारी महादेव के भुजंग अपने-अपने दीप्तिमान मणियों को निकाल, उन चोटियों पर रखकर हिम-कानन में भ्रमण हेतु निश्चिंत चले गए हैं।
श्यामल चंचल रजनी अक्सर लज्जा जाती है, कारण उन पर्वतीय चोटियों और प्राकृतिक स्वरूपों के सौन्दर्य को वह चाह कर भी क्षीण न कर पायी। बल्कि उनका सौन्दर्य, तो और भी इठला उठता है। सम्पूर्ण प्रकृति ही श्वेत-अम्बर से आवृत प्रतीत होती है। रात्रि की निस्तब्ध शांति को ही ध्यान में रखकर लगभग सभी जीव-जन्तु भी एकदम चुप और मौन हैं। पर कुछेक हठी प्रवृति के जीव-जन्तु भी हैं, जो कहाँ मानने वाले हैं? वे ही गंभीर रात्रि के बीच अजीब आवाज कर उसकी निस्तब्धता को भंग करने का प्रयास करते रहते हैं। पर बुरा प्रतीत नहीं होता है।
इन अतुल प्रकृति सौन्दर्य संपदा को अपने ध्यान में रखकर ही हमारे प्रिय राष्ट्रपिता ‘बापू’ अर्थात, महात्मा गाँधी जी ने कौसानी को ‘भारत का स्वीटजरलैंड’ कहकर संबोधित किया है। पर, हमें तो कौसानी के सम्पूर्ण प्रकृति-सौन्दर्य, सचमुच कोई विशद प्राकृतिक महाकाव्य-ग्रंथ ही प्रतीत होता है। देखिए तो –
‘हँसमुख हरियाली हिम-आतप, सुख से अलसाए-से-सोए,
भीगी अधियाली में निशि की तर्क स्वप्नों में-से-खोए-
मरकत डिब्बे-सा खुला ग्राम – जिस पर नीलम नभ आच्छादन –
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत निज शोभा में हार्ट जन मन !’ – ‘ग्रामश्री’
नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण पिंगनाथ की चोटी पर स्थित यह पहाड़ी गाँव कौसानी, हिन्दी छायावाद के शीर्ष कवि सुमित्रानंदन पंत की जन्म-स्थली रही है। उनके पिता गंगादत्त पंत, यहीं के एक चाय बागान के मनेजर थे। उसी हैसियत से उन्हें यह मकान प्राप्त था। हालांकि उनका पैतृक मकान, यहाँ से लगभग तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर था। लेकिन वे बाद में यहीं कौसानी के ही स्थायी निवासी बनकर रह गए थे। उसी मकान में गोसाई दत्त सहित उनकी सात संतानों का जन्म हुआ था। यहाँ की चतुर्दिक मनोरम हरितिमा युक्त प्राकृतिक सुषमा में मातृ-विहीन, परंतु परिजन के दुलारे सबसे कनिष्ठ गोसाई दत्त का प्यारा छुटपन बीता और यहीं की ग्रामीण पाठशाला में उनकी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण हुई थी।
‘अपने कर से खिला, धुला मुख, धूल पोंछ, सुसज्जित कर गात।
थमा खिलौने, नहीं सुनाती, हमें सुखद परियों की बात !’ – ‘मैं सबसे छोटी होऊँ’
कौसानी की अलौकिक प्राकृतिक सत्ता ने बालक गोसाई दत्त को अपने विभिन्न मौलिक उपादनों के साथ मिलकर, बिल्कुल अपने अनुकूल ही अति सुकोमल हृदय वाला निर्मित किया था, जिसमें सर्वत्र ही प्रकृति की कोमल आभा झलकती थी । उनके रंग-रूप, आकार-प्राकार, आचार-विचार, रहन-सहन, भाव-भंगिमा आदि सब कुछ में कौसानी की सुरम्य प्रकृति की सुकुमारता ने निज हाथों से सजाया और संवारा। बाद में नेपोलियन की तरह घने लम्बे बाल रखने के कारण वे अपने यौवनकाल में किसी सुघड़ सुंदरी आधुनिका का आभास दिया करते थे। फिर उनका संकोची स्वभाव, सभ्य, शिष्ट, मधुर भाषी सभी को मुग्ध कर लिया करता था। प्रथम बार उनसे मिलने वालों के मन में उनके बारे में नर या नारी होने का भ्रम उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक ही रहा था। ऐसी विकट स्थिति अल्मोड़ा के कई रिक्शेवालों, स्थानीय निवासियों, पुस्तकालय में आने वाले पाठकों और आगंतुकों को भी अक्सर हो जाया करती थी। यहाँ तक कि कवयित्री महादेवी वर्मा भी उनके प्रथम दर्शन के अवसर पर, कुछ क्षणों तक अपने मन में उनके नारी होने का ही भ्रम पालती रही थीं।
कौसानी की पहाड़ी चढ़ाई और ढलान वाली संकरी गलियाँ, नीचे की विस्तृत वनस्थली की हरीतिमा की टेंढ़ी-मेढ़ी और ऊपर-नीचे जाती पगडंडियाँ, पहाड़ी स्रोत से झर-झर झरते झरनें, पत्थरों-चट्टानों पर कलकल कर बहती सरिताएँ, उनके पार जाने के लिए बने उनपर लकड़ी के पुल, चाय बागान आदि सब कुछ परस्पर मिलकर ही गोसाई दत्त के कदमों को, उनकी बोली को, उनके शब्दों को सहारा देते हुए परिपुष्ट किए, या फिर, यों कहें कि कौसानी की प्राकृतिक सम्मिलित स्वरूपों से उत्पन्न साहित्यिक अमृत-रस को पान करा बालक गोसाई दत्त को एक दिन ‘प्रकृति का सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत बना दिए। उनका प्रकृति-चित्रण, समकालीन अन्य कवियों से बिल्कुल हटकर, अपने आप में अद्भुत, सरस और स्वाभाविक रहा, फलतः अधिकांश साहित्यकारों ने उन्हें हिन्दी का ‘विलियम वॉर्डसवर्थ’ ही माना है। उनके संबंध में प्रबुद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा है, – “पंत जी, अंग्रेज़ी के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर ही प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।”
सत्य भी है कि जिस प्रकार प्रकृति के विविध रंगों में हँसती हुई फूलों और तितलियों को देखकर, मानव-दृष्टि सहसा आनंद-चकित रह जाती है, ठीक उसी प्रकार कविवर ‘पंत’ के काव्य में प्रकृति के अतुल सौन्दर्य सम्पदा को देखकर साहित्य-प्रेमियों का हृदय आनंद-तरंगों से रोमांचित होने लगता है। प्राकृतिक सुषमा को देखकर कवि मन उल्लास से भर उठता है। फिर उनके अन्तः मन की काव्य-चेतना ‘भारत गीत’ के रूप में गाने लगती है –
‘अरुणोदय प्रभ, ज्योति छत्र नभ, ऊपर नील सुहाता।
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे!
हरे खेत लहरे निर्मल सरिता सर, जीवन शोभा से जन धरणी उर्वर।
कोटि हस्त नित विश्व कर्म हित तत्पर, बढ़ते अगणित चरण अडिग ध्रुव पथ पर!’
वर्तमान कौसानी बाजार के मुख्य चौराहे से मात्र कुछ ही मीटर की चढ़ाई दूरी पर सुमित्रानंदन पंत का वह पैतृक मकान स्थित है, जिसे वर्तमान में ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ नाम से एक राजकीय संग्रहालय बना दिया गया है, जो कविवर ‘पंत’ जी को ही पूर्ण समर्पित है। ‘वीथिका’ तक पहुँचने के लिए चौराहे के पास से ही पक्की सीढ़ीनुमा एक संकरी गली जाती है, जो आगे चढ़ाई की ओर बढ़ते हुए, एक अन्य मुख्य सड़क से जा मिलती है। इस छोटी और संकरी गली का नाम ‘सुमित्रानंदन पंत मार्ग’ रख दिया गया है। इस गली में भी कई दो-तीन मंजिला आवसीय मकानें हैं। इसी गली में कुछ मीटर की चढ़ाई कर ऊपर की ओर चढ़ने पर दायीं ओर कुछ सीढ़ियाँ चढ़ती हैं, जो ‘सुमित्रानंदन पंत की वीथिका’ मकान के साथ युक्त एक सुविस्तृत प्रांगण में पहुँचाती हैं।
अपेक्षाकृत कुछ बड़ा ही लंबा-चौड़ा समतल, बिल्कुल साफ और मुक्त प्रांगण है। प्रांगण के प्रवेश द्वार के पास ही एक चतुष्कोणीय वेदी पर कविवर ‘पंत’ जी का काले प्रस्तर से निर्मित आवक्ष मूर्ति है, जिसका अनावरण तत्कालीन वयोवृद्ध साहित्यकार और इतिहासवेत्ता पंडित नित्यानंद मिश्र द्वारा 20 मई, 1990 को किया गया था। उस वेदी पर ‘प्रकृति के सुकुमार कवि पंत’ के ही कुछ अनमोल शब्द अंकित हैं, जो उनकी साहित्यिक महानता को अभिव्यक्त करता है –
‘मानदंड भू के अखंड ही,
पुण्य धरा के स्वर्गारोहण।
प्रिय हिमाद्रि,
तुमक हिमकण से घेरे,
मेरे जीवन के क्षण – पंत।’
‘पंत’ जी की मूर्ति के सम्मुख ही उनके मकान का विस्तृत प्रांगण है। आगंतुकों को कुछ आराम करने हेतु प्रांगण के किनारे, लोहे की कुछ कुर्सियाँ लगी हुई हैं। इस विस्तृत प्रांगण से दूर-दूर तक श्यामल वनस्थली, हिमालय की बर्फीली चोटियाँ और अनंतकाल से गंभीर चीर निद्रा में चुप-चाप मौन लेटी हुई, कई पर्वत-शृंखलाएँ दिखाई देती हैं। इस प्रांगण में ही पहाड़ी गाँव के अनुकूल पत्थरों को परस्पर जोड़कर सुंदर कलात्मक ढंग से एक सुन्दर भवन निर्मित है। उसके अंदर के फर्निचर और रूप-सजा संग्रहालय के स्वरूप को ही प्रदर्शित करते हैं, परंतु फिलहाल, वह बिल्कुल खाली ही रहा है। स्थानीय भवन-सेवक ने बताया कि इसी नए भवन में ‘वीथिका’ को व्यवस्थित किए जाने का विचार व्यवस्थापकों का है। इस भवन के बाद ही आगे बायीं ओर कुछेक सीढ़ियाँ चढ़कर एक अन्य श्वेत विशाल कक्ष में जाया जाता है, यही विशाल कक्ष वर्तमान में ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ के रूप में राजकीय संग्रहालय है, जो अपने आप में एक प्रमुख साहित्यिक तीर्थ-स्थल है, जिसके दर्शन मात्र से ही हिन्दी साहित्य के आराधक धन्य हो उठते हैं।
‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ प्रवेश द्वार ‘पंत’जी का कक्ष, वर्तमान में ‘पंत वीथिका’, ‘पंत वीथिका’, से दिखती हिमाच्छादित चोटियाँ। ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर दोनों दीवारों तक जाते हुए एक-ढेड़ फिट ऊँचा पक्का मंच-सा बना हुआ है, जिस पर कविवर ‘पंत’ जी द्वारा व्यवहृत गद्देदार कुर्सी और मेज हैं। इसी कुर्सी पर बैठे, हिमालय की उन्नत बर्फीली चोटियों का, चीर निद्रा में सोई हुई अनगिनत पर्वत-शृंखलाओं का और घाटियों में फैली गहरी हरीतिमा का अवलोकन किया करते थे। उनकी अनुभूति शब्द-रूप को धारण कर कई रचनाओं के रूप में साकार हुई। उसी मेज के ऊपर कविवर ‘पंत’ जी का एक संक्षिप्त परिचय-पट रखा हुआ है।
पास के एक अन्य आवरण युक्त मेज पर पटना कॉलेज द्वारा प्रदत्त प्रमाण-पत्र और विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त ‘डॉक्टर ऑफ लेटर्स, मानद-पत्र अवलोकित होते हैं। ठीक उनके ऊपर ही कवि द्वारा व्यवहृत कुछ वस्त्र टंगे हुए हैं। पास में ही उनका शयन पाटा या चौकी है, उस पर सलीके से समेटकर रखा हुआ उनका बिछावन है। लगता है कि कवि अभी शयन से उठकर उन्हें समेट दिया हो। उसके पार्श्व में उनकी पुस्तकों से सजी एक आलमारी है और उस पर कविवर ‘पंत’ जी के नाम से भारत सरकार द्वारा जारी किया गया, डाक टिकट का बड़ा चित्र हैं। ठीक उसके ऊपर ही दीवार पर, सदैव कविवर के नाक के ऊपर रहकर उनकी आँखों को नियंत्रित करने वाला ‘चश्मा’ टंगा हुआ है। मानो कि उस चश्मे के पीछे से कविवर ‘पंत’ जी की आँखें, आज भी उनकी ‘वीथिका’ में आने वाले आगंतुकों को निरंतर निहार रही हैं और शायद अब भी कुछ बताना चाहती हैं। पर आज निःशब्द मौन ही है।
अब उस ‘वीथिका’ कक्ष के अन्य भागों में नजर दौड़ाने पर, चतुर्दिक उनके तथा उनसे संबंधित कुछ अन्य लेखकों द्वारा रचित पुस्तकों से सुसज्जित अनेक आलमारियाँ व्यवस्थित हैं। उन आलमारियों के ऊपर कविवर पंत जी के शिशु, बचपन, स्कूल व कॉलेज के विद्यार्थी जीवन तथा कवि स्वरूप के अनगिनत चित्र हैं, जो उनके जीवन-कथा-क्रम को व्यक्त करने में पूर्ण समर्थ हैं। उन्हीं चित्रों में एक चित्र उनके पूरे परिजन का है, जिसमें शिशु गोसाई, अपनी पालिका बुआ की गोद में बैठे हुए दिख रहे हैं। यह बड़ा ही प्यारा और बेशकीमती चित्र है। उसी क्रम में उनके पिता गंगादत्त पंत, उनके ज्येष्ठ भाई हरदत्त पंत, देविदत्त पंत, उनकी दतक पुत्री सुमित्रा देवी पंत, उनके मामा जी आदि के चित्र कविवर के प्रतिष्ठित परिजनों से परिचय करवाते हैं।
संकोची स्वभाव के होने पर भी कविवर पंत जी के अनगिनत चित्र तत्कालीन श्रेष्ठ और विख्यात कवियों तथा लेखकों के साथ हैं, जो किसी साहित्यकार के लिए स्वाभाविक सम्पदा ही है। उन चित्रों में कविवर ‘पंत’ जी, डॉ. हरिवंश राय ‘बच्चन’, तेजी बच्चन, महादेवी वर्मा, भगवती चरण वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. नगेन्द्र, सुनील गंगोपाध्याय, रघुनन्दन जोशी व मास्को में वहाँ के कुछ विख्यात साहित्यकारों के साथ दिख जाते हैं। एक चित्र में कविवर ‘पंत’ जी कालाकांकर (प्रतापगढ़) के राज कुँवर सुरेश सिंह के साथ भी हैं। जबकि एक अन्य चित्र में कविवर ‘पंत’ जी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से पुरस्कार ग्रहण करते हुए भी शोभायमान है।
एक अन्य चित्र में कविवर ‘पंत’ जी, उमाशंकर दीक्षित, पं. गोविंद वल्लभ पंत, तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी आदि के साथ किसी सभा-कक्ष में बैठे दिखते हैं। डायमंड जुबली हॉस्टल, प्रयागराज के ‘लिटरैरी सोसाइटी’ के एक ग्रुप चित्र में कविवर ‘पंत’ जी अपनी श्रेष्ठता के अनुकूल सबसे आगे की पंक्ति में, मध्य में बैठे हुए दिख रहे हैं। कविवर के ज्यादातर चित्र अल्मोड़ा, नैनीताल, प्रयागराज (इलाहाबाद), दिल्ली आदि स्थानों से संबंधित हैं। ‘वीथिका’ के सभी चित्रों को कोई एल्बम में क्रमबद्ध सजाकर देखने मात्र से ही, ये सभी चित्र कविवर सुमित्रानंदन पंत के शिशु स्वरूप से लेकर उनके जीवन के सांध्यकाल तक की जीवन-गाथा को मौन-मुक शब्दों में व्यवस्थित करने में पूर्ण सक्षम हैं।
लेकिन, जैसा कि हिन्दी के कई दिवंगत साहित्यकारों की जन्म-स्थली के साथ होता आया है, वैसा ही ‘पंत’ जी की ‘वीथिका’ के साथ भी दृष्टिगोचर होता है। अर्थात, सघन जन-संकुलता के मध्य में स्थित होने पर भी ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ कुछ अदृश-सी ही जान पड़ती है, जब तक कि इसके द्वार पर न पहुँच जाएँ, और उसके ऊपर लिखित बोर्ड को न देख लेवें। पद्म भूषण, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार आदि से सम्मानित कवि व्यक्तित्व की जन्म-स्थली ‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ के संबंध में कौसानी चौराहा या सड़क के आस-पास, कहीं कोई सरकारी सूचना-पट्ट का न होना, साहित्य-प्रेमियों को अधिक दु:खी देता है।
‘पंत’ जी के जीवन काल में उनका यह पैतृक मकान अवश्य ही पर्वतीय वनस्थली हरीतिमा, पर्वतीय शीतल वायु, विभिन्न पक्षियों के मधुर कलरव और पर्वतीय जीव-जंतुओं की संगीतमय ध्वनियों के मध्य रहा होगा। तभी तो बालक गोसाई दत्त को यहाँ के पर्वतीय झरने, बर्फ, फूल-पते, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-निशा किरणें, शीतल हवाएँ, पहाड़ी ढलानों पर चाय की पत्तियों को तोड़ते मजदूर, सीढ़ीनुमा खेतों को सींचते-जोतते-बोते और फसल काटते किसान, थोड़ी-थोड़ी देर में ही बादलों और धुंध से ढक जाने वाली पहाड़ी राहें-मैदान और उसमें रंभाते पशु-समूह, सिंदूरिया संध्या के उपरांत ही गंभीर श्यामल रात्रि में अनंत श्यामल आकाश में टिमटिमाते तारों की चुनरी आदि सभी परस्पर मिलकर साहित्यिक-सुधा पान कराते रहे। फलतः आगे चलकर गोसाई दत्त हिन्दी साहित्य का एक मूर्धन्य कवि-साहित्यकार ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत के रूप में प्रतिष्ठित हुए। राष्ट्रीय जागरण का काव्यात्मक अभिव्यक्ति और छायावाद के घोषणापत्र के रूप में समादृत ‘पल्लव’ में कविवर ‘पंत’ जी ने लिखा है –
“वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान,
निकल कर नयनों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान !”
‘सुमित्रानंदन पंत वीथिका’ के बहुत ही पास लगभग 500 मीटर की ऊपरी दूरी पर ही महात्मा गाँधी जी का ‘अनासक्त आश्रम’ स्थापित है। सन् 1929 में महात्मा गाँधी कौसानी दो दिवसीय विश्राम के लिए पधारे थे, परंतु यहाँ की प्राकृतिक रमणीयता और यहाँ से दिखने वाली हिममंडित हिमालय की पर्वतमालाओं पर पड़ती सूर्य की स्वर्णिम किरणों से उत्पन्न नैसर्गिक सौंदर्य को देखकर ही उन्होंने कौसानी को ‘भारत का स्विट्जरलैंड’ कहा था और वे चाय बागान के विशेष अतिथिशाला में पूर्व निश्चित सिर्फ दो दिन ठहरने के विचार को त्याग कर, चौदह दिनों तक प्रवास किए थे। यहीं पर उन्होंने “गीता” पर आधारित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अनासक्ति योग’ की रचना की थी। बाद में उस विशेष अतिथिशाला को आतिथ्य के ‘अनासक्त योग’ के अनुरूप ही ‘अनासक्त आश्रम’ नाम प्रदान किया गया। अब तो वह महात्मा गाँधी जी से संबंधित एक विशेष संग्रहालय है।
उस समय युवा कवि सुमित्रानंदन पंत जी, प्रवासित गाँधी जी से मिलने और वार्तालाप करने, कई बार उस विशेष अतिथिशाला में आए थे। गाँधी जी की बातों और उनके के सिद्धांतों से ‘पंत’ जी अतिशय प्रभावित हुए थे। उन्होंने गाँधी जी के विचारों को न केवल समझा, बल्कि उन्हें अपनी रचनाओं में भी यथोचित स्थान प्रदान किया है। उनके ‘लोकायतन’ महाकाव्य में गाँधीवादी भारतीय मूल्यों और संस्कृति का संरक्षण तथा सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा स्पष्ट झलकती है।
‘कहता चरखा प्रजा तंत्र से : ‘मैं कामद हूँ, सभी मंत्र से’;
कहता हँस आधुनिक यंत्र से : ‘नम, नम, नम!’
‘सेवक पालक शोषित जन का, रक्षक मैं स्वदेश के धन का,
कातो हे, काटो तन मन का, भ्रम, भ्रम, भ्रम !’ – ‘चरखा गीत’
छायावाद और प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत के समान ही नैसर्गिक सौन्दर्य युक्त कौसानी भी हिन्दी साहित्यि जगत में अमरत्व को प्राप्त कर लिया है। आज यह कौसानी, हिन्दी साहित्य-प्रेमियों के लिए एक विशेष साहित्यिक तीर्थ-स्थल है, जहाँ आकार और नमनकर हिन्दी साहित्य-प्रेमी स्वयं को धन्य महसूस करते हैं। ‘पंत’ जी और उनकी जन्म-स्थली कौसानी के सम्मुख अपने शीश को सादर झुका कर आज हम स्वयं को कृतार्थ महसूस कर रहे हैं।
‘हे स्वर्गिक वनस्थली व महीधर के शांत सुकुमार हिम-किरीट!
पल्लव, ग्राम्या, ग्रन्थि, गुंजन, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, युगांत,
सत्यकाम, कला और बूढ़ा चाँद, चिदंबरा, लोकायतन के अमर प्रस्तोता।
हे सरस्वती वरद महापुत्र ! मैं करता तुझे नमन शत बार।

श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
हावड़ा – 711101 (पश्चिम बंगाल)
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

