मल्टीपल स्केलेरोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया (MSSI) के सहयोग से रोशे (Roche) द्वारा शुरू की गई एक सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता पहल
कोलकाता, 22 अगस्त 2025: पूरी दुनिया में कई मिलियन लोग और भारत में लगभग 2 लाख लोग एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे हैं जिसे मल्टिपल स्केलेरोसिस (एमएस) कहा जाता है। यह बीमारी उनके केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करती है जिसके कारण उनके लिए चलना, खाना बनाना, नहाना या बच्चे को गोद में उठाना जैसे साधारण काम भी कठिन हो जाते हैं। इसके कारण उन्हें हर रोज जो कष्ट झेलना पड़ता है वह अक्सर दिखाई नहीं देता और हर सामान्य काम भी उन्हें किसी अदृश्य पहाड़ पर चढ़ने जैसा कठिन लगता है।
एमएस के मरीज़ों का दर्द और परेशानी आसानी से दिखाई या समझ में नहीं आती। एमएस की समस्या के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए, रोशे फार्मा इंडिया ने मल्टीपल स्केलेरोसिस सोसाइटी ऑफ इंडिया (एमएसएसआई) के साथ मिलकर “वॉक इन माई शूज” अभियान की शुरुआत की है। यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता पहल है जिसका उद्देश्य इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे लोगों की उन परेशानियों को सामने लाना है जो अक्सर दूसरों को दिखाई नहीं देतीं।
एमएस के साथ जीने का एहसास करने के लिए #WalkInMyShoes सिमुलेशन जोन में आइए। दिल्ली में यह जोन 22 से 24 अगस्त तक सेलेक्ट सिटी वॉक मॉल (H&M विंग, ग्राउंड फ्लोर), साकेत में लगाया गया है। बेंगलुरु में 20 से 22 अगस्त तक ब्रुकफील्ड इकोस्पेस पार्क, बेलंदूर (1C के पास) में और मुंबई में 22 से 24 अगस्त तक फीनिक्स मार्केटसिटी, कुर्ला (एट्रियम 5, LG फ्लोर) पर भी यह जोन लगाया गया है।
ये सिमुलेशन जोन लोगों को ‘अनुभव से सीखने’ का मौका देते हैं, जहाँ एमएस के चार मुख्य लक्षणों – संतुलन की कमी, शरीर की हरकतों पर काबू न रहना (मोटर इम्पेयरमेंट), धुंधला दिखना और संवेदना का कम होना – का एहसास कराया जाता है। इससे लोग समझ सकते हैं कि एमएस के मरीज हर रोज कैसी-कैसी परेशानियों का सामना करते हैं जिनका आम लोगों का अंदाजा नहीं होता।
आप भी #WalkInMyShoes का इस्तेमाल करके एमएस से जूझ रहे लोगों की छुपी हुई परेशानियों के लिए अपनी आवाज उठा सकते हैं। आपकी हर पोस्ट, ट्वीट या रील इस बीमारी को लेकर फैली खामोशी तोड़ने में मदद करती है और यह पक्का करती है कि एमएस के साथ जी रहा कोई भी इंसान खुद को अकेला या उपेक्षित महसूस न करे।
सेंसरी सिमुलेशन कियोस्क्स के साथ-साथ अब www.walkinmyshoes.in वेबसाइट भी शुरू की गई है – यह एमएस के बारे में सच्ची, भरोसेमंद और डॉक्टरों द्वारा जांची-परखी जानकारी का केंद्र है। यह वेबसाइट एक विश्वसनीय डिजिटल प्लेटफॉर्म बनने की कोशिश कर रही है, जो एमएस के बारे में लोगों की समझ बढ़ाएगी और उन्हें प्रमाण आधारित सही स्वास्थ्य जानकारी के आधार पर फैसले लेने में मदद करेगी।
“रोशे में हमारा उद्देश्य सिर्फ दवाइयां बनाना ही नहीं है। हम पूरी लगन के साथ इस काम में जुटे हैं कि मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी लंबी चलने वाली और जिंदगी को मुश्किल कर देने वाली बीमारियों को कैसे समझा जाए, उनकी पहचान और इलाज बेहतर कैसे बनाया जाए,”राज्जी मेहदवान, प्रबंध निदेशक एवं सीईओ – भारत एवं पड़ोसी देश, रोशे फार्मा ने कहा।”
#WalkInMyShoes के माध्यम से हमारा लक्ष्य केवल जागरूकता फैलाना ही नहीं है, बल्कि लोगों के दिलों में सहानुभूति जगाना, मरीजों की परेशानियों को ज्यादा जोर देते हुए सामने रखना और स्वास्थ्य व्यवस्था में सार्थक बदलाव लाना है। एमएसएसआई के साथ मिलकर हम वैज्ञानिक सोच और मरीजों के प्रति दयाभाव के सम्मिलित दृष्टिकोण से काम कर रहे हैं।
ताकि एमएस के बारे में लोगों के बीच जानकारी का अभाव दूर किया जा सके, मरीजों को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था बनाई जा सके जिसमें समय पर इलाज मिल सके और जो सभी मरीजों के लिए सहायक हो। यह केवल एक अभियान नहीं है – यह कुछ करने का एक मजबूत आह्वान है।”
एमएस अक्सर 20 से 40 साल की उम्र के बीच होती है – जिंदगी का वह अहम दौर जब लोग अपना करियर बना रहे होते हैं, अपने शौक पूरे कर रहे होते हैं और अपना घर बसा रहे होते हैं। यह नौजवानों में बिना किसी दुर्घटना के होने वाली विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है और अगर इसका इलाज न कराया जाए तो यह गंभीर रूप ले सकती है और जिंदगी को बहुत मुश्किल बना देती है।
महिलाओं को यह बीमारी पुरुषों से दो से तीन गुना ज्यादा होती है। उनके सामने यह खास चिंताएं भी होती हैं कि यह बीमारी उनके माँ बनने, गर्भावस्था के दौरान और बच्चे की देखभाल करने की क्षमता को कैसे प्रभावित करेगी।
एमएसएसआई – दिल्ली की चेयरपर्सन, बिपाशा गुप्ता, ने कहा, “मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) नौजवानों को होने वाली एक जटिल न्यूरोलॉजिकल बीमारी है। यह धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जिसमें समय के साथ लक्षण बिगड़ते जाते हैं और व्यक्ति को विकलांग बना सकते हैं। समय रहते शुरुआत में ही इलाज बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे बीमारी बढ़ने की रफ़्तार धीमी की जा सकती है और स्थायी विकलांगता का खतरा कम किया जा सकता है।
भारत में एमएस से जूझ रहे लोगों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है जैसे कि – लोगों में जागरूकता की कमी, उचित और पूरी बीमा सुविधाओं का न होना, और अस्पष्ट नियमों के कारण विकलांगता लाभ पाने में दिक़्क़तें। केवल कुछ ही बीमा योजनाएँ एमएस जैसी दीर्घकालिक बीमारियों को कवर करती हैं, जिसके कारण रोगियों को अपनी जेब से भारी खर्च उठाना पड़ता है और एक ऐसी व्यवस्था से जूझना पड़ता है जो उनकी ज़रूरतों को पूरा नहीं करती।
#WalkInMyShoes जैसी जन-जागरूकता पहलें बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे मरीजों की परेशानियों के बारे में आवाज उठाती हैं, जागरूकता फैलाती हैं, और समाज में समझ बढ़ाकर बदलाव की दिशा में काम करती हैं ताकि सबको बराबर और न्यायपूर्ण इलाज मिल सके।”
सर गंगाराम अस्पताल में न्यूरोलॉजी विभाग के वाइस चेयरपर्सन डॉ. अंशु रोहतगी ने कहा, “भारत में एमएस देखभाल का ढाँचा अभी भी बिखरा हुआ है। लोग मल्टीपल स्क्लेरोसिस को अभी तक भी सही तरह से नहीं समझते। इसके लक्षण अलग-अलग होते हैं और अक्सर साफ़ नहीं दिखते जिसके कारण बीमारी की सही पहचान में देर हो जाती है या गलत निदान हो जाता है।
बीमारी की समय रहते जल्दी और सही पहचान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर समय पर सही इलाज शुरू हो जाए तो लंबे समय तक परेशान करने वाली विकलांगता को टाला जा सकता है या रोका जा सकता है। #WalkInMyShoes जैसी पहलें इस विषय पर चर्चा बढ़ाने और ध्यान खींचने में मदद करती हैं। एमएस के इलाज का मुख्य उद्देश्य बीमारी को काबू में रखना है ताकि विकलांगता धीरे-धीरे बढ़े।
चिकित्सक होने के नाते हमारी अहम ज़िम्मेदारी है कि हम बीमारी की समय पर और सही पहचान करें और अपने मरीज़ों को सबसे अच्छा इलाज दें। हाई-एफिकेसी थैरेपीज (HETs) खासकर उन रोगियों के लिए ज़रूरी हैं जिनमें बीमारी ज़्यादा सक्रिय हो या तेजी से बढ़ रही हो। ये इलाज बीमारी की रफ़्तार को काफी हद तक धीमा कर सकते हैं और स्थायी न्यूरोलॉजिकल नुकसान से बचा सकते हैं। इससे मरीज़ स्वतंत्र और गरिमामय जीवन जी सकते हैं।”
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