“जहां सास बहू को बेटी माने और बहू सास को मां, वहां घर सिर्फ दीवारों का नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान का बनता है”
अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। बरामदे में बैठी अनुराधा सिलाई कर रही थी और रसोई से आती मसालों की खुशबू उसके दिल तक उतर रही थी। “बहू, चाय पियोगी?” यह वही मीठी आवाज थी, जिसे वह पिछले पांच साल से रोज सुनती आ रही है। यह आवाज थी उसकी सास, सुनीता की जिनकी उम्र पचास की है, पर ऊर्जा किसी चालीस साल की युवती-सी और दिल किसी मासूम बच्ची का।
जब अनुराधा ने इस घर में कदम रखा था, तो मन में थोड़ी घबराहट थी, जैसा हर नई बहू को होता है। सोचा था, पता नहीं सास कैसी होंगी, कहीं टीवी सीरियल वाली तो नहीं? लेकिन जिस दिन पहली बार सुनीता ने उसे देखा, अपनी बाहों में भर लिया, और बोली “अब से तू मेरी बेटी है”
उसी दिन उसके सारे डर जैसे किसी ने झटके से बाहर फेंक दिए।

उनका रिश्ता निभाने का नहीं, जीने का रिश्ता था। सुबह-सुबह जब अनुराधा उठकर रसोई में जाती, तो सुनीता पहले से काम में लगी मिलतीं। “अरे, तू क्यों आई? अभी तेरी नींद पूरी नहीं हुई होगी” और फिर सिर पर हाथ फेर देतीं।
उनके इस स्पर्श में इतनी ममता होती कि अनुराधा भूल जाती कि यह उसकी सास हैं लगता जैसे मां के पास खड़ी है।
सुनीता की ऊर्जा अद्भुत है। घर का हर काम, हर सदस्य का ख्याल, त्योहारों की तैयारी, रिश्तेदारों का सत्कार सब में आगे। कभी थक भी जातीं, लेकिन जैसे ही अनुराधा उनके पास बैठकर उनका हाथ थामती, वो मुस्कुरा देतीं। “तू पास बैठ जाए तो मेरी थकान खुद भाग जाती है।” फिर उठकर ऐसे काम में लग जातीं, मानो थकान शब्द उनके शब्दकोश में है ही नहीं।
अनुराधा की मां ने सिखाया था “ससुराल में सिर्फ निभाना मत, वहां के लोगों को दिल से अपनाना।” शायद इसी शिक्षा के कारण उसने भी शुरुआत से कोशिश की कि यह घर सिर्फ दीवारों का न हो, बल्कि रिश्तों की खुशबू से महके और सुनीता ने भी उसे हमेशा उस खुशबू में जगह दी।
कभी दोनों साथ में पूजा करतीं, कभी रसोई में एक-दूसरे को खिलाते हुए हंसतीं, कभी शाम को छत पर बैठकर चाय के साथ बातें करतीं। वो बातें जो समय को रोक देतीं। बरसात की बूंदों में, त्योहारों के रंगों में और घर की रसोई की महक में उनका रिश्ता और भी गहरा होता गया।
अनुराधा को आज तक याद है, शादी के दूसरे साल उसकी तबीयत बहुत खराब हो गई थी। बुखार इतना था कि वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। पति दफ्तर गए हुए थे और पूरे दिन सुनीता उसके पास बैठी रहीं। कभी माथा सहलातीं, कभी नींबू पानी लाकर देतीं और रात में जब अनुराधा सो रही थी, तो उसे एहसास हुआ कि सुनीता ने उसका हाथ कसकर पकड़ा हुआ है, मानो कह रही हों, “मैं हूं न, तू अकेली नहीं है।” उस दिन अनुराधा को सच में लगा कि मां के बाद भगवान ने उसे एक और मां दे दी है।
पांच साल हो गए और अब तक कोई शिकायत, कोई तकरार नहीं। कभी गलती भी हो जाए, तो सुनीता बस हंसकर कह देतीं “बेटी से नाराज हुआ जाता है भला?” उनकी निगाहों में अनुराधा के लिए एक अटूट अपनापन है। कभी-कभी वह देखती है, सुनीता उसे बस निहार रही होती हैं और उनके चेहरे पर वह संतोष होता है जो शायद किसी मां के मन में अपनी बेटी के लिए होता है।
दोनों का रिश्ता केवल सास-बहू का नहीं, बल्कि दो सहेलियों, दो साथियों जैसा है। त्योहारों में दोनों साथ सजती-संवरतीं, शॉपिंग पर जातीं तो सुनीता पहले अनुराधा की पसंद देखतीं, फिर खुद के लिए कुछ लेतीं। अगर अनुराधा उदास होती, तो सुनीता बिना पूछे ही समझ जाती “चल, बाहर चलते हैं, तेरे चेहरे पर फिर मुस्कान लाते हैं।”
आज की दुनिया में, जहां अक्सर सास-बहू के रिश्ते में खटास की कहानियां सुनने को मिलती हैं, अनुराधा और सुनीता का रिश्ता एक मिसाल है। उन्होंने सीखा कि रिश्ता निभाने के लिए नियम नहीं, प्यार और सम्मान चाहिए। अगर सास बहू को बेटी माने और बहू सास को मां
तो घर शब्द नहीं, बल्कि सच में “परिवार” बन जाता है।
बरामदे में बैठी अनुराधा सिलाई पूरी करती है। रसोई से सुनीता की आवाज आती है “बहू, चाय तैयार है, जल्दी आ जाओ।”
वह मुस्कुराती है और सोचती है भगवान ने उसे सबसे बड़ा तोहफा दिया है एक सास, जो सच में उसकी मां है, और एक रिश्ता, जो दो जिस्मों में बसने के बावजूद एक ही जान की तरह धड़कता है।

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