“ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”
अर्थात – “जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधती हूँ; तू अपने संकल्प से कभी भी चलायमान न होना, चलायमान न होना।” – यह एक बहन की अपने भाई के प्रति विनम्र प्रार्थना है।
श्रीराम पुकार शर्मा हावड़ा। ‘रक्षाबंधन’ भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को निरंतर सुदृढ़ करने वाला एक प्रसिद्ध वार्षिक त्योहार है। ‘रक्षा’ का अर्थ है ‘सुरक्षा’ और ‘बंधन’ का अर्थ है ‘बाध्य करना’ – अर्थात भाई को बहन की रक्षा के लिए बाध्य करने का प्रतीक, यह पवित्र उपक्रम ही ‘रक्षाबंधन’ है। यह न केवल अपनी रक्षा के लिए, बल्कि भाई सहित पूरे परिवार की निरंतर स्वस्थता, दीर्घायु और जीविका-संबंधी कार्यों में प्रगति की कामना से युक्त बहनों का पवित्र दिन है।
श्रावणी पूर्णिमा की स्वर्णिम बेला में जब धवल-धूसर चंचल मेघ-खंडों की श्यामल छाँव में हमारी निर्मल वसुंधरा शीतल सिहरन से प्रकंपित हरित वसना धारण किए हर्षित स्वर्ण-किरणों का स्वागत करने लगती है, ऐसी ही पावन मधुर बेला में स्वर्णिम थाल में ज्योति, कुमकुम, रोली, अक्षत, फल-फूल, मिष्ठान्न और कच्चे धागों से निर्मित ‘राखी’ सजाए, बहनें अपने प्रिय भाइयों की आरती उतारकर उनके ललाट पर रक्तिम टीका लगाती हैं और उनकी कलाई पर पावन रक्षासूत्र (राखी) बाँधती हैं। भाई-बहनों के इस मधुर, पवित्र प्रेम-बंधन के त्योहार को ही ‘रक्षाबंधन’ कहा जाता है, जिसे ‘श्रावणी’ या ‘सावनी’ पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
भाई-बहनों के परस्पर स्नेह से जुड़ा यह सनातन पर्व देवकाल से ही चला आ रहा है। सतयुग में जब भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और परम दानी दानवेन्द्र राजा बलि ने सौ यज्ञ पूर्ण कर असीम शक्ति प्राप्त कर ली और अहंकार में चूर होकर देवताओं से स्वर्ग छीनने का प्रयत्न करने लगा, तब भगवान विष्णु ने वामन-रूप धारण कर अपने ही अनन्य भक्त राजा बलि से तीन पगों में सारा आकाश, पाताल और धरती नापकर उसे रसातल में भेज दिया।
चूँकि बलि को अपने गुरु शुक्राचार्य से पूर्व ही यह विदित हो गया था कि श्रीहरि उसकी परीक्षा ले रहे हैं, अतः उसने भी अपने भक्ति-भाव से श्रीहरि को प्रसन्न कर उनसे सदैव अपने सम्मुख रहने का वचन ले लिया। फलतः श्रीहरि वैकुंठ छोड़कर उसके पास ही पातालवास करने लगे। उधर देवी लक्ष्मी श्रीहरि के वियोग में व्याकुल हो उठीं। तब नारदजी के परामर्श पर उन्होंने एक निर्धन महिला का वेश धारण कर राजा बलि के सामने पहुँचकर उसकी दाहिनी कलाई पर रेशम-तंतुओं से निर्मित ‘राखी’ बाँध दी।
बलि ने कहा – “बहन! मेरे पास तो तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है, सब कुछ अब प्रभु का है।” तब देवी लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर बोलीं – “भैया ! आपके पास तो साक्षात श्रीहरि हैं, मुझे दक्षिणा स्वरूप उन्हें ही प्रदान कर दीजिए।” इस पर दानवीर बलि ने देवी लक्ष्मी के साथ श्रीहरि को सम्मानपूर्वक पाताललोक से वैकुंठ के लिए विदा कर दिया। उस दिन श्रावणी पूर्णिमा की ही तिथि थी।
जब देव-दानवों के बीच भीषण युद्ध चल रहा था और दानवों की प्रबलता के सम्मुख देव-पक्ष के कदम डगमगाने लगे, तब इंद्रदेव व्यथित होकर अपने समादृत गुरु बृहस्पति के पास पहुँचे और अपनी व्यथा-कथा सुनाई, जिसे उनकी पत्नी इंद्राणी ने भी सुन लिया। तब इंद्राणी ने रेशम-तंतुओं को अपने तपोबल से ऊर्जामंडित कर तथा द्विजों से स्वस्तिवाचन करवाकर, अपने पति इंद्रदेव की रक्षा और युद्ध-विजय की कामना से, एक विशेष ‘रक्षासूत्र’ उनकी दाहिनी कलाई पर बाँधकर उन्हें युद्धभूमि में भेजा। उस रक्षासूत्र के प्रचंड ताप को दैत्य-दल सहन न कर सके और युद्धभूमि से पलायन कर गए। इंद्रदेव को विजय प्राप्त हुई। चूँकि वह दिन श्रावण पूर्णिमा का ही था, अतः उसी दिन से यह रक्षासूत्र बाँधने की प्रथा हमारे सनातन समाज में चली आ रही है।
महाभारत काल में जब युधिष्ठिर इंद्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ कर रहे थे, उस समय सभा में श्रीकृष्ण का फुफेरा भाई शिशुपाल भी उपस्थित था। शिशुपाल भरी सभा में सर्वसमादृत श्रीकृष्ण का अपमान करने लगा। श्रीकृष्ण अपनी वचनबद्धता के कारण उसे बार-बार क्षमा करते रहे, पर शिशुपाल अपने अहंकार से न रुका। अंततः उसके अपमानों की संख्या सौ पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। किंतु चक्र के लौटते समय उसकी गति के कारण श्रीकृष्ण की दाहिनी तर्जनी थोड़ी-सी कट गई और उससे रक्त बहने लगा।
यह देखकर द्रौपदी दौड़ी आईं और अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण की आहत उँगली पर लपेट दीं। उसी क्षण श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि वे समय आने पर उसके एक-एक धागे का ऋण चुकाएँगे। कहा जाता है, जिस दिन द्रौपदी ने श्रीकृष्ण की कलाई पर साड़ी का पल्लू बाँधा था, वह श्रावण पूर्णिमा का ही दिन था, और माना जाता है कि भाई-बहनों के प्रेम के इस त्योहार ‘रक्षाबंधन’ का संबंध इसी घटना से है। आगे चलकर जब कौरवों ने हस्तिनापुर की भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब श्रीकृष्ण ने अनवरत ‘चीर’ बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाते हुए एक भाई का धर्म निभाया।
आगे चलकर महाभारत का युद्ध जितवाने में भी ‘रक्षासूत्र’ अर्थात राखी का बड़ा योगदान माना जाता है। युद्ध के दौरान युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा – “हे कान्हा! मैं आने वाले युद्ध के सभी संकटों से कैसे पार पा सकता हूँ? मुझे कोई उपाय बताइए।” तब श्रीकृष्ण ने कहा – “आप अपने सभी सैनिकों की कलाई पर रक्षासूत्र बँधवाइए, इससे आपकी विजय सुनिश्चित होगी।” युधिष्ठिर ने वैसा ही किया और युद्ध में विजयी हुए। यह घटना भी श्रावणी पूर्णिमा को ही घटित मानी जाती है, और तभी से देश की रक्षा करने वाले सैनिकों को राखी बाँधने की सबल परंपरा चल पड़ी है।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि विश्वविजय की महत्वाकांक्षा लिए निकले सिकंदर ने जब भारत पर आक्रमण किया, तब सनातनी रक्षासूत्र के महत्व को जानने वाली एक यूनानी स्त्री (संभवतः सिकंदर की पत्नी रुखसाना) ने भारतीय सम्राट पुरु को ‘राखी’ भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया और उनसे सिकंदर की रक्षा का वचन ले लिया। फलस्वरूप युद्ध में कई बार अवसर मिलने पर भी सम्राट पुरु ने सिकंदर का वध नहीं किया, क्योंकि वह राखी उन्हें एक भाई के रूप में अपनी बहन के सुहाग की रक्षा का स्मरण दिलाती रही।
आगे चलकर जब भारतीय समाज आक्रांताओं द्वारा पददलित होने लगा, तब देश और समाज के हित में युद्ध पर जाने से पूर्व स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा के लिए पति की कलाई पर, और बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधने लगीं।
कालांतर में ‘रक्षाबंधन’ को राजनीतिक गतिविधियों और देश-रक्षा के एक सहायक माध्यम के रूप में भी अपनाया जाने लगा। बंगाल-विभाजन के नियत दिन 16 अक्तूबर, 1905 को विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में लोगों ने हुगली नदी में स्नान कर, परस्पर भाईचारे और एकता के प्रदर्शन हेतु एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधकर ‘बंग-भंग’ के विरोध में जनजागरण के लिए इस त्योहार का राजनीतिक उपयोग किया।
इसी प्रकार पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने काशी नरेश को राखी बाँधकर ही विश्वप्रसिद्ध ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ की स्थापना हेतु लगभग 1,350 एकड़ भूमि – जिसमें ग्यारह गाँव, सत्तर हजार वृक्ष, सौ पक्के कुएँ, बीस कच्चे कुएँ, चालीस कच्चे मकान, आठ सौ साठ पक्के मकान, एक मंदिर और एक धर्मशाला सम्मिलित थे – दान-दक्षिणा स्वरूप प्राप्त की थी।
जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर भगवान अरनाथ के तीर्थकाल में हस्तिनापुर में बलि आदि मंत्रियों ने कपटपूर्वक राज्य हड़प कर अकंपनाचार्य सहित सात सौ जैन मुनियों पर घोर अत्याचार किया था। विष्णुकुमार मुनि ने उनकी रक्षा की, और वह दिन भी श्रावणी पूर्णिमा का ही था। मुनियों पर से संकट टलते ही प्रजा ने हर्षोल्लास मनाया, और तभी से जैन परंपरा में भी ‘रक्षाबंधन’ मनाने का प्रचलन रहा है। इस दिन जैन मंदिरों में श्रावक-श्राविकाएँ धर्म और संस्कृति की रक्षा का संकल्प लेकर रक्षाबंधन-पूजन कर रक्षासूत्र बाँधते हैं।
वर्तमान में धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक ही नहीं, भौगोलिक गतिविधियों में भी ‘रक्षाबंधन’ का महत्व काफी बढ़ गया है। अब समस्त चराचर सहित पृथ्वी की रक्षा की व्यापक परिकल्पना – देश की रक्षा, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं युक्त पर्यावरण की रक्षा, धर्म की रक्षा – को लेकर सबको राखी बाँधने की एक विराट परंपरा चल पड़ी है, जो उद्देश्य की दृष्टि से एक शुभ संकेत भी है।
देखा जाए तो राखी के कोमल कच्चे तंतुओं के इस पावन बंधन में वज्र-हृदय को भी द्रवित कर देने की असीम शक्ति निहित है। इसके कोमल तंतुओं में सामाजिक और पारिवारिक एकजुटता का सांस्कृतिक संकल्प ही निहित है। इतिहास साक्षी है कि इसने धर्म, जाति, भाषा और प्रांत की सीमाओं को लाँघकर शत्रु को भी भावनात्मक बंधन में बाँधकर अपना सहायक बनाया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि विवाह के बाद बहनें और बुआएँ पराए घर चली जाती हैं। वहाँ की जिम्मेदारियों का सघन बोझ उन्हें अपने जन्मदाता माता-पिता, मायके और भाई-बंधुओं तथा सखी-सहेलियों से क्रमशः दूर करने लगता है। ऐसे में इसी ‘रक्षाबंधन’ पर्व के बहाने वे अपनों से मिलने आ जाती हैं, सबके लिए अपने हृदय में प्रेम और शुभकामनाओं की सौगात लेकर आती हैं। इस प्रकार जो पारिवारिक कड़ी टूटती-सी प्रतीत होती है, यह त्योहार उसे पुनः मजबूती प्रदान करता है।
परंतु वर्तमान की भौतिक चकाचौंध ने भाई-बहनों के इस पवित्र ‘रक्षाबंधन’ त्योहार पर भी अपनी अर्थलोलुप कुदृष्टि दे डाली है। स्नेह और सादगी का यह पवित्र त्योहार अब दिखावे और लेन-देन के चक्रव्यूह में निरंतर फँसकर अपनी पवित्र आभा मलिन करता जा रहा है। कुछ ब्राह्मणों की दक्षिणा-लोलुपता और कुछ भाई-बहनों की अपनी संपन्नता के प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने इसकी पवित्रता को क्षीण कर दिया है।
इसी तरह आधुनिक तकनीक का भी इस त्योहार पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। दूरस्थ प्रदेशों में रहने वाली बहनें अब ‘ई-कॉमर्स’ के माध्यम से ही राखी भेजकर अपना भ्रात-प्रेम प्रदर्शित करने लगी हैं, तो भाई भी ‘मनी ट्रांसफर’ के माध्यम से कुछ रुपये या उपहार भेजकर अपने कर्तव्य, धर्म या प्रेम-भाव की इतिश्री कर देते हैं। पर इस प्रक्रिया में प्रत्यक्ष दर्शन, संवाद और आत्मीयता का अभाव बना ही रह जाता है।
फिर भी आज भी ‘रक्षाबंधन’ त्योहार में रिश्तों की मिठास बनी हुई है, क्योंकि इसमें समता, एकता, संरक्षण और स्नेह के समन्वय के साथ-साथ भाई-बहन का पवित्रतम सनातन संबंध जुड़ा हुआ है। फलतः भाई-बहनों को महीनों पहले से ही ‘रक्षाबंधन’ त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। अतः आवश्यकता है रिश्तों में परस्पर मिठास भरने वाले ऐसे त्योहारों को बार-बार मनाने की, ताकि रिश्तों की मधुरता और सुदृढ़ता सदैव बनी रहे।

श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक और स्वतंत्र लेखक
हावड़ा -1 (पश्चिम बंगाल)
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