दस्तावेज : दुर्लभ और ऐतिहासिक समाचार पत्रों की प्रदर्शनी का हुआ भव्य शुभारम्भ
इन समाचार पत्रों से दुर्लभ व ऐतिहासिक घटनाओं की सामूहिक स्मृति को आकार मिलता है – सहगल
लखनऊ। यदि आप इतिहास के दुर्लभ और ऐतिहासिक घटनाओं में रूचि रखते हैं और उनको और करीब से विस्तृत जानकारी के साथ जानना चाहते हैं तो प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित कोकोरो आर्ट गैलरी में शीर्षक “दस्तावेज-दुर्लभ और ऐतिहासिक समाचार पत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई है। शुक्रवार को इस प्रदर्शनी का उद्घाटन नवनीत सहगल, चेयरमैन प्रसार भारती, भारत सरकार द्वारा किया गया। इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित सभी देश व विदेशों के ऐतिहासिक घटनाओं से संबंधित दुर्लभ समाचार पत्रों के संग्रहकर्ता लखनऊ के सुबूर उस्मानी (आईआरएस) हैं। जिन्होंने एक लंबे समय से इन विशेष समाचार पत्रों का संग्रह किया है। इस प्रदर्शनी की क्यूरेटर वंदना सहगल हैं।
प्रदर्शनी की क्यूरेटर वंदना सहगल ने कहा कि अखबारी कागज के आविष्कार के बाद से ही समाचार पत्र मानवजाति का अभिन्न अंग रहे हैं। इस धरती पर जो भी घटनाएँ घटती हैं, हमारे पर्यावरण पर जो भी विपत्तियाँ आती हैं, मानव जाति द्वारा जो भी अभिलेख रचे जाते हैं समाचार पत्र उन सबका लेखा-जोखा रखते हैं। ये दैनिक समाचार प्रदान करते हैं, जिनमें राजनीतिक, व्यावसायिक, अपराध, खेल, मनोरंजन आदि जैसे विविध विषय शामिल होते हैं, जो स्थानीय घटनाओं से लेकर वैश्विक मामलों तक शामिल हो सकते हैं। समाचार पत्रों को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि शीर्षक बोल्ड फ़ॉन्ट में उभरकर आते हैं, जिसके नीचे उस घटना के विस्तृत समाचार के कीवर्ड होते हैं।
ये शीर्षक जनधारणा और विमर्श को प्रभावित करके ऐतिहासिक आख्यानों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये विशिष्ट घटनाओं को उजागर करते हैं, व्याख्याएँ गढ़ते हैं और यहाँ तक कि जनमत को भी प्रभावित करते हैं, जिससे इतिहास को याद रखने और समझने के तरीके पर भी असर पड़ता है और इस प्रकार ऐतिहासिक घटनाओं की सामूहिक स्मृति को आकार मिलता है। शीर्षक अक्सर कई लोगों के लिए सूचना के संपर्क का पहला बिंदु होते हैं, जो उनकी प्रारंभिक समझ और विचारों को प्रभावित करते हैं।
नकारात्मक या सनसनीखेज शीर्षक भय, चिंता या अविश्वास पैदा कर सकते हैं, जो संभावित रूप से सार्वजनिक व्यवहार और यहाँ तक कि आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसके विपरीत, सकारात्मक या सशक्त शीर्षक आशा, एकजुटता और सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा दे सकते हैं। इतिहासकार अक्सर अतीत की घटनाओं को समझने के लिए समकालीन समाचार रिपोर्टों, जिनमें शीर्षक भी शामिल हैं, पर भरोसा करते हैं। इसलिए, शीर्षक, उस कथा को आकार देकर, जिसे शुरू में प्रस्तुत किया जाता है और बाद में विस्तार से अध्ययन किया जाता है, अप्रत्यक्ष रूप से ऐतिहासिक अभिलेखों को प्रभावित करते हैं।
संग्राहकों की दुनिया में ऐतिहासिक शीर्षकों वाले समाचार पत्रों का संग्रह काफ़ी लोकप्रिय रहा है। गैलरी कोकोरो, ऐसे ही एक संग्राहक के खजाने के कुछ अंश यहाँ प्रदर्शित की हुई है। सुबूर उस्मानी (आईआरएस) बचपन से ही समाचार पत्र संग्रह करते रहे हैं और आदान-प्रदान व संपर्कों के माध्यम से… उनके पास कला, संस्कृति से जुडी काफ़ी दुर्लभ और ऐतिहासिक समृद्ध संग्रह है।
समाचार पत्रों के इन दुर्लभ संग्रहों को देखने के बाद, जहाँ जीवन बदल देने वाली घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्यचकित हो सकता है कि इन घटनाओं ने मानव जाति के इतिहास, राष्ट्रों के भाग्य को कैसे आकार दिया, और यह भी कि इनके घटित होने से पहले जीवन कैसा था…।
संग्रहकर्ता सुबूर उस्मानी ने कहा कि बचपन की मेरी सबसे यादगार यादों में से एक थी अपने पिता की किताबों के साथ बिताया गया समय और उनके अखबारों के संग्रह की खुशबू में डूबे रहना, जिसने मेरे लिए आश्चर्य और अन्वेषण की एक नई दुनिया खोल दी। उसके बाद से मैंने अखबार इकट्ठा करना शुरू कर दिया। एक बेकार पड़ा ट्रंक मेरी अनमोल संपत्ति बन गया, क्योंकि उसमें वो सब कुछ रहता था जो मुझे उस उम्र में प्रासंगिक और दिलचस्प लगता था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की खबर वाला अखबार मेरे पास रखा पहला अखबार था, वह साल 1989 था। यही वो साल था जब मेरा पहला पत्र “संपादक के नाम पत्र” कॉलम में प्रकाशित हुआ था। तब मैं 10 साल का था।
बचपन में जो रुचि शुरू हुई, वो बाद में जुनून बन गई क्योंकि मैंने उन अख़बारों और पत्रिकाओं को इकट्ठा करना और उनकी सूची बनाना शुरू कर दिया जिनमें उन महत्त्वपूर्ण घटनाओं को शामिल किया गया था जिनके बारे में मुझे लगता था कि एक दिन इतिहास की किताबों में उनका ज़िक्र जरूर होगा, साथ ही साथ विभिन्न स्रोतों से बीते ज़माने के पुराने अख़बार भी इकट्ठा करता रहा। कुछ मुझे मेरे पिता ने दिए थे, कुछ मुझे कबाड़ी बाजारों में मिले थे, कुछ मुझे तोहफ़े में मिले थे और कुछ मैंने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म से हासिल किए थे।
यहाँ प्रदर्शित समाचार पत्र मानव इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ावों को समेटे हुए हैं। युद्धों और क्रांतियों से लेकर उपनिवेशवाद के उन्मूलन और विज्ञान, अन्वेषण, खेल और संस्कृति में अभूतपूर्व उपलब्धियों तक, प्रत्येक समाचार पत्र एक कहानी उसी रूप में प्रस्तुत करता है जिस रूप में वह पहली बार दुनिया के सामने आई थी। आज पुराने समाचार पत्रों को पढ़ना इतिहास को उसी रूप में पढ़ना है जैसा वह घटित हुआ था, उस पर बाद के परिप्रेक्ष्य या व्याख्या का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है; अतीत की वास्तविकता का अनुभव करने और उस मानवीय पहलू को देखने का इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं है जिसका इतिहास ग्रंथों में अक्सर अभाव रहता है।
उदाहरण के लिए, टाइटैनिक के डूबने या हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने पर दुनिया भर में छाए भय और शोक के बारे में पढ़ना या चंद्रमा पर मानव जाति के पहले कदम या हमारे देश की स्वतंत्रता पर छाए उल्लास के बारे में पढ़ना, वस्तुतः वहाँ मौजूद होने जैसा है, उस घटित हो रहे नाटक का ठीक उसी रूप में अनुभव करना जैसा वह घटित हुआ था। स्क्रीन के वर्चस्व वाले युग में पल रही युवा पीढ़ी के लिए, यह प्रदर्शनी अतीत से एक ठोस जुड़ाव और मूल मुद्रित समाचारों के माध्यम से इतिहास को जानने, महत्वपूर्ण शीर्षकों को देखने और खुली ताज़ी हवा में घुलती सूखी कागज़ की खुशबू में साँस लेने का निमंत्रण है।
आगंतुक हमारे सुप्रसिद्ध नायकों के प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत और उन्होंने अपने समकालीनों की उच्च राय पाने के लिए क्या किया, यह जान सकते हैं। मुझे आशा है कि प्रदर्शनी देखने वाले सभी आगंतुक उपयुक्त रूप से समृद्ध होंगे और अपने साथ कुछ नया दृष्टिकोण लेकर जाएँगे!
प्रदर्शनी के कोऑर्डिनेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि प्रदर्शनी के बारे में जाने माने लेखक जावेद अख्तर ने अपने भेजे गए संदेश में लिखा कि “तारीखी अखबारात की नुमाइश की मुबारकबाद, इस प्रदर्शनी में लोग देखेंगे के सहाफत कितना लंबा सफर करके यहां तक आई है और उनको इसका इल्म हो जरुरी है।“
इस प्रदर्शनी में कुल 56 दुर्लभ व ऐतिहासिक घटनाओं को कवर करने वाले देश भर के महत्वपूर्ण समाचार पत्रों, चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। महत्त्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में लखनऊ में इस प्रकार कि पहली प्रदर्शनी है। इस प्रदर्शनी में सभी समाचार पत्रों को बहुत ही सुन्दर तरीकों से प्रदर्शित करने का विचार व कल्पना कलाकार धीरज यादव का है।
काकोरी ट्रेन ऐक्शन के शताब्दी वर्ष को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शनी में शहीद हुए चार महत्वपूर्ण व्यक्ति रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह, अशफाकुल्ला खां को याद करते हुए उनके भी दुर्लभ चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। यह प्रदर्शनी 12 अगस्त 2025 तक प्रातः 11 बजे से सायं 8 बजे तक अवलोकनार्थ लगी रहेंगी। इसी कड़ी में 9 अगस्त 2025 को द लॉस्ट लाइब्रेरी की विशेष प्रस्तुति ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन (1925-2025) के शताब्दी वर्ष पर आयोजित दास्तानगोई “दास्तान-ए-सरफ़रोशी” जो हिमांशु बाजपेयी द्वारा प्रस्तुत की जाएगी।
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