वाराणसी। इस साल 2026 में कामिका एकादशी का व्रत 09 अगस्त रविवार को पालन किया जाएगा। एक वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशी होती हैं, जबकि अधिकमास (मलमास) होने पर इनकी संख्या 26 हो जाती है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी कहा जाता है।
कामिका एकादशी का व्रत करने से भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत से व्यक्ति को दीर्घायु, पुण्य तथा अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है और पापों का क्षय होता है। यह व्रत स्त्री एवं पुरुष दोनों कर सकते हैं। कामिका एकादशी की महिमा का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से किया था। इससे पूर्व महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को भी इस व्रत का महत्व बताया था।
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 08 अगस्त (शनिवार) दोपहर 2:00 बजे से प्रारंभ होकर 09 अगस्त (रविवार) प्रातः 11:06 बजे तक रहेगी। चूंकि 09 अगस्त (रविवार) को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए व्रत का पालन इसी दिन किया जाएगा तथा व्रत का पारण 10 अगस्त सोमवार को द्वादशी तिथि में प्रातः 5:50 बजे से 8:02 बजे तक किया जा सकता है।
पारण के उपरांत किसी जरूरतमंद व्यक्ति अथवा ब्राह्मण को भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा अवश्य दें। इस दिन श्रद्धापूर्वक किया गया दान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस अवसर पर ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को मिष्ठान्न, वस्त्र, दक्षिणा तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का यथाशक्ति दान करना चाहिए।
एकादशी के दिन “ॐ नमो वासुदेवाय” मंत्र का अधिकाधिक जप करना शुभ एवं फलदायी माना गया है। हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से भी विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना को समर्पित है। व्रत व्यक्ति को संयम, आत्मानुशासन एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
📍एकादशी व्रत की पूजन विधि :
व्रत के दौरान शारीरिक शुद्धता के साथ-साथ मन की पवित्रता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। यह व्रत विवाहित एवं अविवाहित, दोनों ही कर सकते हैं।
एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाता है। दशमी के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करें तथा एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्नान के पश्चात सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का संकल्प लें। पति-पत्नी संयुक्त रूप से भगवान लक्ष्मीनारायण की उपासना करें।
पूजा स्थल को गंगाजल अथवा गोमूत्र से शुद्ध करें। एक स्वच्छ चौकी पर श्रीगणेश एवं भगवान लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात चांदी, तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरकर उसके ऊपर नारियल स्थापित करते हुए कलश स्थापना करें।
इसके उपरांत कलश में विराजमान देवी-देवताओं, नवग्रहों, तीर्थों, योगिनियों तथा नगर देवता का पूजन करें। संकल्प लेकर वैदिक मंत्रों एवं विष्णु सहस्रनाम के पाठ के साथ भगवान लक्ष्मीनारायण सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें।
पूजा में आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प, सुगंधित द्रव्य, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पान, तिल, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा एवं मंत्र पुष्पांजलि अर्पित करें। अंत में व्रत कथा का श्रवण अथवा पाठ करें तथा प्रसाद वितरण के साथ पूजा संपन्न करें।
📍एकादशी व्रत के दौरान विशेष सावधानियां :
किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन न करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। शराब एवं अन्य सभी प्रकार के नशे से दूर रहें। व्रत के दिन दाढ़ी, मूंछ, बाल एवं नाखून न काटें।
पूजा के समय बेल्ट, जूते-चप्पल अथवा चमड़े से बनी वस्तुओं का प्रयोग न करें। काले रंग के वस्त्र पहनने से बचें। किसी का दिल दुखाने, असत्य बोलने एवं गलत कार्य करने से बचें। सदाचार एवं संयम का पालन करें।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
ताज़ा समाचार और रोचक जानकारियों के लिए आप हमारे कोलकाता हिन्दी न्यूज चैनल पेज को सब्स्क्राइब कर सकते हैं। एक्स (ट्विटर) पर @hindi_kolkata नाम से सर्च कर, फॉलो करें।

