कोलकाता। विजय शहर का एक सफल व्यापारी था। बड़ा मकान, शानदार गाड़ी और समाज में ऊँचा नाम- सब कुछ था उसके पास। लेकिन एक कमी थी, जिसे वह कभी कमी मानता ही नहीं था। वह इंसानों की कीमत उनके दिल से नहीं, बल्कि उनकी हैसियत से लगाता था। जब भी किसी समारोह की योजना बनती, वह सबसे पहले उन लोगों की सूची बनाता जिनके पास पैसा, पद और प्रतिष्ठा थी। उसे लगता था कि बड़े लोग आएँगे तो समाज में उसकी इज्जत और बढ़ जाएगी।
एक दिन उसके इकलौते बेटे की शादी तय हुई। घर में उत्सव का माहौल था। निमंत्रण पत्र छप गए। विजय ने बड़े-बड़े उद्योगपतियों, नेताओं, अधिकारियों और धनवान रिश्तेदारों के नाम सबसे पहले लिखे। उसी समय उसकी पत्नी ने धीमे से कहा, “सुनिए, रामू काका, शंभू, हरि और गोपाल को भी बुला लीजिए। सुख-दुख में सबसे पहले वही लोग तो आते हैं।”
विजय मुस्कुराया और बोला, “अरे, वे लोग क्या देंगे? न बड़ा उपहार, न समाज में कोई रुतबा। शादी में ऐसे लोगों से क्या फायदा?”
पत्नी चुप हो गई। उसने देखा था कि यही लोग हर मुश्किल में उनके साथ खड़े रहते थे।
शादी बड़े ठाठ-बाट से हुई। महंगे तोहफे आए, फूलों की सजावट हुई, नामी लोग आए, तस्वीरें खिंचीं और अगले दिन अखबारों में भी खबर छपी। विजय बहुत खुश था। लेकिन जीवन कभी केवल उत्सव नहीं होता। शादी के लगभग दो महीने बाद विजय की बहू गर्भवती हुई। सब कुछ सामान्य चल रहा था। अचानक एक रात प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा। डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “तुरंत O नेगेटिव रक्त की आवश्यकता है। जितनी जल्दी मिलेगा, उतनी ही जान बचने की संभावना बढ़ेगी।”
विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने सबसे पहले उन्हीं लोगों को फोन किया जो शादी में सबसे आगे बैठे थे। किसी ने कहा, “मैं अभी दिल्ली में हूँ।” दूसरे ने कहा, “मुझे अस्पताल से डर लगता है।” तीसरे ने कहा, “मेरा ब्लड ग्रुप अलग है।” कुछ ने फोन ही नहीं उठाया।
रात गहराती जा रही थी और विजय की उम्मीदें टूटती जा रही थीं।
तभी उसकी पत्नी बोली, “एक बार रामू काका को फोन कर लीजिए।”
विजय झिझका। जिन लोगों को उसने शादी में बुलाना भी जरूरी नहीं समझा था, आज उन्हीं के सामने हाथ फैलाना उसे भारी लग रहा था। फिर भी उसने काँपते हाथों से फोन मिलाया।
उधर से आवाज आई, “क्या हुआ बेटा?”
विजय की आँखों से आँसू निकल पड़े। “काका… बहू की जान पर बन आई है… खून चाहिए…”
रामू काका ने एक पल भी नहीं पूछा कि उन्हें शादी में क्यों नहीं बुलाया गया था। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “चिंता मत कर, हम आ रहे हैं।”
बीस मिनट बाद अस्पताल के बाहर चार लोग खड़े थे – रामू काका, शंभू, हरि और गोपाल। जाँच हुई। संयोग से गोपाल का रक्त समूह वही निकला जिसकी आवश्यकता थी। वह बिना एक क्षण गँवाए रक्तदान के लिए लेट गया।
डॉक्टर बाहर आए और बोले, “अब खतरा टल गया है। समय पर रक्त मिल गया, इसलिए मरीज बच गई।”
विजय फूट-फूटकर रो पड़ा। वह गोपाल के पैरों पर गिर गया। गोपाल ने उसे उठाते हुए कहा, “भाई, खून का रिश्ता निमंत्रण पत्र से नहीं बनता। यह दिल से बनता है।”
उस दिन विजय पहली बार समझ पाया कि शादी में मिले लाखों रुपये के उपहार, चाँदी के बर्तन और महंगे लिफाफे उस एक बोतल रक्त के सामने बिल्कुल छोटे थे, जिसने उसके परिवार की साँसें लौटा दी थीं।
कुछ महीने बाद विजय ने अपने घर पर एक छोटा-सा पारिवारिक मिलन रखा। इस बार उसने किसी उद्योगपति, किसी नेता या किसी बड़े अधिकारी को पहले निमंत्रण नहीं भेजा। सबसे पहला कार्ड रामू काका के घर पहुँचा। दूसरा शंभू के पास। तीसरा हरि के पास। चौथा गोपाल के पास।
सभी आए। घर में कोई दिखावा नहीं था, लेकिन अपनापन भरपूर था। भोजन के बाद विजय ने सबके सामने हाथ जोड़कर कहा,
“मैंने जीवन भर धनवान लोगों को अपना समझने की भूल की। आज समझ आया कि अपना वह नहीं होता जो शादी में सबसे बड़ा लिफाफा दे जाए; अपना वह होता है जो अस्पताल में अपना खून दे दे, संकट में आपका हाथ थाम ले और अंतिम यात्रा में आपके अर्थी को कंधा देने बिना बुलाए पहुँच जाए।”
पूरा आँगन शांत था। रामू काका ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, रिश्ते बैंक बैलेंस से नहीं चलते, विश्वास से चलते हैं। पैसे वाले लोग आपकी खुशियों में शामिल हो सकते हैं, लेकिन मुसीबत में वही लोग साथ खड़े होते हैं जिनके दिल में आपके लिए जगह होती है।”
उस दिन विजय ने अपने जीवन की सबसे बड़ी सीख पाई। जीवन का सबसे बड़ा धन पैसा नहीं, अपने लोग हैं। शादी में उन लोगों को स्थान दीजिए जो आपकी मुस्कान के साथ-साथ आपके आँसू भी बाँट सकें। क्योंकि समय आने पर महंगे उपहार नहीं, किसी अपने की एक बोतल रक्त, एक मजबूत कंधा और सच्चा साथ ही जीवन बचाता है।
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