अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। पश्चिम बंगाल की धरती ऐतिहासिक रूप से विद्या, कला, साहित्य और विज्ञान की जननी रही है। यही वह भूमि है जहाँ से ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने शिक्षा सुधार की मशाल जलायी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने विश्व को गीतांजलि दी और सुभाषचंद्र बोस ने युवाओं में राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित की। इस राज्य की पहचान सदियों तक ज्ञान, विद्या और संस्कार से रही है। लेकिन आज के दौर में जब दुनिया आगे बढ़ रही है, बंगाल का युवा वर्ग एक अजीब सी दुविधा में उलझा हुआ दिखाई देता है।
राजनीति के कुछ खिलाड़ी युवाओं को क्षणिक लाभ और खोखले वादों के सहारे अपने प्रभाव क्षेत्र में खींच रहे हैं। यही वजह है कि मेहनत और शिक्षा की राह छोड़कर कई नौजवान ऐसे संगठनों और समूहों के जाल में फँस जाते हैं, जिनका मक़सद युवाओं का उत्थान नहीं बल्कि अपनी तिजोरियाँ भरना है। हाल के वर्षों में ‘बांग्ला पक्खो’ नामक संगठन इस तरह की राजनीति का प्रतीक बन कर उभरा है। यह संगठन युवाओं को भावनात्मक नारों से भड़काकर अपने हित साधने में व्यस्त है, जबकि युवाओं का वास्तविक जीवन इससे जरा भी नहीं बदल रहा। छद्म राष्ट्रवाद और फंडिंग का खेल चल रहा है ये युवाओं को जानने की जरूरत है।
आज यह जगजाहिर हो चुका है कि ऐसे संगठनों के पास करोड़ों रुपये की फंडिंग पहुँच रही है। ये नेता और उनके सहयोगी आलीशान गाड़ियों में घूमते हैं, बड़े-बड़े होटलों और रेस्ट हाउसों में बैठकें करते हैं और हर मंच से युवाओं को आक्रोश और टकराव की राह दिखाते हैं। वे अपने भाषणों में यह जताते हैं कि बंगाल के युवा केवल ‘सांस्कृतिक अस्मिता’ की लड़ाई लड़ें, जबकि उनके अपने बच्चे विदेशों में पढ़ाई कर रहे होते हैं या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में करियर बना रहे होते हैं।
यह दोहरा खेल युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ है। युवाओं को बेरोज़गारी और गरीबी की आग में झोंक कर ये तथाकथित नेता अपनी ऐशगाह सजाते हैं। जिन युवाओं से उन्हें वोट, भीड़ और प्रचार चाहिए, उन्हीं को ये शिक्षा, रोजगार और तरक्की के रास्ते से भटका देते हैं।
बंगाल का युवा केवल भावनात्मक नारों से नहीं जी सकता। पेट की भूख, परिवार की ज़िम्मेदारी और भविष्य की सुरक्षा केवल परिश्रम और शिक्षा से पूरी हो सकती है। आज के दौर में जब प्रतियोगिता हर क्षेत्र में बढ़ चुकी है, तब केवल नारे और रैलियों में भाग लेकर कोई भी युवा अपने सपनों का भविष्य नहीं गढ़ सकता।
जरूरी है कि युवाओं को यह समझना होगा कि उनका वास्तविक शस्त्र किताबें हैं, उनका वास्तविक मंच कक्षा-कक्ष और प्रयोगशालाएँ हैं और उनकी असली जीत वह दिन होगा जब वे अपने माता-पिता के चेहरे पर गर्व की मुस्कान ला सकेंगे।
इतिहास गवाह है कि बंगाल की प्रगति शिक्षा और ज्ञान से ही हुई। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने जिस समय लड़कियों की शिक्षा के लिए आंदोलन छेड़ा, उस समय समाज का बड़ा हिस्सा उनके विरोध में खड़ा था। लेकिन आज वही विद्यासागर बंगाल की पहचान हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जब शिक्षा को रचनात्मकता से जोड़ा, तो विश्वभारती जैसी संस्था का निर्माण हुआ, जिसने विश्व पटल पर बंगाल का गौरव बढ़ाया।
आज जरूरत है कि युवा फिर से उसी परंपरा को अपनाएँ। वे यह समझें कि भावनात्मक राजनीति उन्हें क्षणिक भीड़ तो दे सकती है, पर स्थायी रोजगार, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन केवल मेहनत और शिक्षा से ही संभव है।
‘बांग्ला पक्खो’ जैसे संगठन जिस भाषा और संस्कृति की रक्षा के नाम पर युवाओं को उकसाते हैं, वह वास्तव में उसी भाषा और संस्कृति का सबसे बड़ा शत्रु है। क्योंकि जब युवा शिक्षा और रोजगार से दूर होकर केवल नारों और आंदोलनों में उलझ जाते हैं, तब वही संस्कृति खोखली होती जाती है।
भाषा और संस्कृति की रक्षा किताबों से होती है, शोध और साहित्य से होती है, विज्ञान और कला से होती है। नारों और फंडिंग से नहीं। अगर युवाओं को सचमुच अपनी भाषा और संस्कृति की रक्षा करनी है तो उन्हें लेखक, वैज्ञानिक, शिक्षक और उद्यमी बनना होगा।
युवा केवल स्वयं के लिए नहीं जीता। उसके पीछे परिवार की उम्मीदें और समाज की अपेक्षाएँ होती हैं। माँ-बाप अपने खून-पसीने की कमाई लगाकर बच्चों को पढ़ाते हैं। उनकी आँखों में यह सपना होता है कि बेटा या बेटी पढ़-लिखकर जीवन में तरक्की करे और परिवार का सहारा बने। यदि युवा इस सपने को छोड़कर किसी संगठन के हाथों का मोहरा बन जाता है, तो यह केवल उसकी ही हार नहीं, पूरे परिवार की हार है।
युवाओं को सोचना होगा कि क्या वे अपने परिवार की खुशियों को राजनीति की भेंट चढ़ा सकते हैं? क्या वे अपने माता-पिता की आँखों में आँसू देख सकते हैं? जवाब साफ है नहीं। इसलिए सही रास्ता वही है जिसमें शिक्षा और परिश्रम हो।
किसी भी राज्य का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है। यदि युवा शिक्षित होंगे, परिश्रमी होंगे और मेहनत से अपने पैरों पर खड़े होंगे तो राज्य का विकास स्वतः होगा। पश्चिम बंगाल कभी औद्योगिक दृष्टि से भारत का अग्रणी राज्य था, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और गलत नीतियों ने उसे पीछे धकेल दिया।
अब समय आ गया है कि बंगाल के युवा नई राह चुनें। वे आईटी, विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, उद्यमिता और कृषि में नए प्रयोग करें। वे अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा दें। तभी बंगाल पुनः ‘भारत का सांस्कृतिक और औद्योगिक केंद्र’ बन सकेगा।
आज बंगाल का युवा एक चौराहे पर खड़ा है। एक ओर आसान रास्ता है नारों में खो जाना, संगठनों का मोहरा बनना और कुछ नेताओं के लिए भीड़ जुटाना। दूसरी ओर कठिन लेकिन स्थायी रास्ता है शिक्षा प्राप्त करना, परिश्रम करना और अपने परिवार व समाज के लिए सशक्त आधार तैयार करना।
युवा किस रास्ते का चुनाव करता है, यही उसके भविष्य को तय करेगा। संगठन और छद्म नेता अपने हित के लिए उसे भटका सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय उसी का होगा।
आज जरूरत है कि हर युवा यह ठान ले – “मैं शिक्षा और परिश्रम की राह चुनूँगा। मैं अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करूँगा। मैं अपने राज्य और अपने देश के लिए सकारात्मक योगदान दूँगा।”
जब बंगाल का युवा यह संकल्प लेगा, तभी वह अपनी खोयी हुई पहचान वापस पाएगा और तभी सच्चे अर्थों में बंगाल का भविष्य उज्ज्वल होगा।
(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

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