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भेदभाव के दौर में न्याय व्यवस्था की चुनौती- डॉ. विक्रम चौरसिया

नई दिल्ली। प्रख्यात हिंदी साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु का यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है कि समाज को मानवीय और मनुष्य को सामाजिक बनाना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद न्याय तक समान पहुँच आज भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनी हुई है।

किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी न्याय व्यवस्था में निहित होती है। न्याय केवल कानूनों के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष, पारदर्शी और समान क्रियान्वयन से स्थापित होता है। जब पद, प्रभाव अथवा आर्थिक सामर्थ्य न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करती प्रतीत होती है, तब आम नागरिक का विश्वास व्यवस्था से डगमगाने लगता है।

व्यवहारिक स्तर पर अनेक बार यह अनुभव किया जाता है कि सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित नहीं हो पाता। कई परिस्थितियों में पीड़ित व्यक्ति को अपनी शिकायत दर्ज कराने तक संघर्ष करना पड़ता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के मूल सिद्धांत के विपरीत है। न्याय यदि सहज अधिकार के स्थान पर जटिल और दबावपूर्ण प्रक्रिया बन जाए, तो समाज में अविश्वास का वातावरण उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

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प्रकृति स्वयं समानता का संदेश देती है। मनुष्य जीवन की शुरुआत समान जैविक परिस्थितियों से करता है और अंततः सभी को मिट्टी में ही विलीन होना है। जब जीवन और मृत्यु का सत्य सबके लिए समान है, तब आर्थिक, सामाजिक अथवा जातिगत भेदभाव का औचित्य स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।

समय की मांग है कि प्रशासनिक पारदर्शिता, संवेदनशील न्याय प्रणाली और सामाजिक जागरूकता को सुदृढ़ किया जाए, ताकि न्याय किसी वर्ग का विशेषाधिकार न रहकर प्रत्येक नागरिक का वास्तविक अधिकार बन सके। एक स्वस्थ और सशक्त लोकतंत्र वही है, जहाँ न्याय भय का नहीं बल्कि विश्वास और समानता का प्रतीक बने।

डॉ. विक्रम चौरसिया
चिंतक /मेंटर /एक्टिविस्ट/दिल्ली विश्वविद्यालय

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