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आज के सफल कहे जाने वाले अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा सवाल…???

जब बच्चों की जिंदगी में शनिवार-रविवार भी उसकी अपनी जिंदगी के लिए हों… तब बूढ़े माता-पिता अपने रविवार का क्या करें?

कोलकाता। जब हमारे बच्चों की एडमिशन देश के 5 स्टार, टॉप टेन जैसे नामी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में हो जाती है तो उस समय हम बड़े उत्साह और गर्व से परिचितों को बताते हैं कि मेरी बेटी या बेटे का एडमिशन अमुक शहर के अमुक कॉलेज या यूनिवर्सिटी में हुआ है; और फिर परिचित या दोस्त – पूछे या ना पूछे हम खुद ही उन्हें बताते हैं कि उस कॉलेज या यूनिवर्सिटी का प्लेसमेंट काफी अच्छा है। यह बताते हुए चेहरे पर गर्व और आवाज में खुशी अचानक और भी बढ़ जाती है! फिर उनके पूछने पर कि जॉब कितने की मिलेगी? अभिभावक गर्व से बताएंगे कि 40-50 लाख का पैकेज तो आराम से मिल जाएगा! रैंकिंग अच्छे आ गए तो छात्र एक करोड़ तक का पैकेज निकाल लेते हैं। वहां से निकलने के बाद बच्चों की जिंदगी और परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल सुधर जाती है।

हालांकि अभिभावकों की खुशी और गर्व बिल्कुल जायज भी होती है। किस माता-पिता को खुशी नहीं होगी कि उनका बेटा या बेटी किसी बड़े कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ेगा, अच्छी नौकरी पाएगा और जिंदगी में बहुत आगे जाएगा? लेकिन मुझ जैसे अभिभावकों के मन में एक अजीब सा डर भी पैदा होता है की जिस बड़े पैकेज की चर्चा आज हमारे जैसे निम्न मध्यमवर्गीय अभिभावक इतने गर्व से कर रहे हैं; परंतु क्या इन्हें पता है कि – कभी-कभी वही बड़ा पैकेज उनके बेटे-बेटियों को उनसे बड़ा दूर भी ले जा रहा है?

पहले तो बच्चों को अपने प्रदेशों से कॉलेज/यूनिवर्सिटी – दिल्ली या देश के अन्य मेट्रो सिटी में ले जाएगा, फिर नौकरी शायद नोएडा, गुरूग्राम, मुंबई, पूना, बैंगलोर, चेन्नई, केरल या कोलकाता ले जाए। फिर कंपनी वाले अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या और कहीं विदेश में ले जाएं! बच्चे फिर वही रहने लगेंगे। शुरुआत में साल में एक-दो बार दुर्गा पूजा, दीपावली या अन्य छुट्टियों पर आएंगे। जब उनकी शादी हो जाएगी, बच्चे होंगे तो फिर आना-जाना तीन-चार सालों में एक बार ही शायद हो पाए; उनकी भी अपनी दुनिया होगी।

और एक दिन…वही बेटा या बेटी जिसके एडमिशन की खबर सुनाकर या बच्चों की पहली बार नौकरी में ज्वाइनिंग करने पर माता-पिता परिचितों को मिठाई बांट रहे थे; वो बच्चा शायद दो-पांच साल में एक बार घर आएगा और माता-पिता…? वे वहीं रह जाएंगे, अपने उसी घर में, जिसे उन्होंने अपने बच्चों के लिए बनाया था।

मुझे इस बात का ज्यादा एहसास इसलिए है कि हमारे बंगाल में इस तरह की घटनाएं बंगाली परिवारों में बरसों से देखता आया हूं। बच्चे सफल तो हो जाते हैं; बहुत ज्यादा सफल…! माता-पिता समेत परिवार के सपने भी पूरे हो गए। लेकिन शायद एक सपना कहीं पीछे छूट जाता है बच्चों के साथ रहने का सपना। जब तक आप अपने व्यवसाय या नौकरी में हैं, पति-पत्नी दोनों के पैर हाथ चल रहे हैं तब तक समय काटने के रास्ते हैं। कभी किसी रिश्तेदार के यहाँ चले गए तो कभी दोस्तों से मिलने। कभी किसी घरेलू काम में लग गए। बच्चों की जिम्मेदारी के बिना इतने सालों बाद पहली बार सचमुच एक साथ बहुत सारा समय बिताने को मिलता है। लगता है अब जिंदगी अपनी है।

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अब खूब घूमेंगे; सभी ज्योतिर्लिंग देखेंगे, चारों धाम की यात्रा पर जाएँगे, कभी बनारस और अयोध्या, कभी हरिद्वार तो कभी ऋषिकेश, कभी दक्षिण भारत के विभिन्न मंदिरों का दर्शन। दीघा, पूरी, बाबाधाम या दार्जिलिंग तो कलकत्ता से नजदीक ही है; बिलकुल घर के जैसा, या फिर दूर किसी हिल स्टेशन पर या फिर किसी समुद्री किनारे पर। कभी बच्चों के पास देश-विदेश भी चले जाएँगे। बुढ़ापे का समय आराम से कटेगा। लेकिन जिंदगी ने भी तो कुछ और ही लिख रखा होता है!

बच्चे देश या विदेश में, अपनी नौकरी और अपनी जिम्मेदारियों के साथ रह रहे होते हैं। उनका अब अपना घर, अपनी दुनिया है। यदि बच्चे विदेश में हैं तो कौन वहां रहने के बाद भारत वापस लौटना चाहता है?
शुरुआत में वे आते-जाते रहेंगे। फोन भी करते रहेंगे। फिर धीरे-धीरे फोन आने कम होने लगेंगे, फिर घर आना-जाना कम होगा। यह बच्चों की गलती नहीं है। बच्चों की भी अपनी जिंदगी है और माता-पिता की अपनी उम्र। फिर उम्र बढ़ने के साथ आपकी तबीयत भी खराब रहने लगेगी। अब घर का काम मुश्किल होने लगेगा। आप उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके होंगे जब बाजार से सामान लाना, खाना बनाना, मकान की साफ-सफाई करना, डॉक्टर के चक्कर लगाना – सब धीरे-धीरे भारी लगने लगेगा।

आप घरेलू कामों के लिए नौकर या नौकरानी रख लेते हैं। खाना बनाने वाली भी रख लिया। सोचा था अब आसानी होगी। भगवान न करे, लेकिन तभी आप दोनों में से किसी एक को भी कोई वृद्धा अवस्था की बीमारी ने आ घेरा! और फिर जो होगा, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं होता। आपको डॉक्टर के पास या अस्पताल ले जाने वाला तक कोई नहीं होगा। बच्चे प्रदेश या देश से बाहर हैं। फोन पर हालचाल पूछ रहे हैं। मदद करना चाहते हैं, लेकिन हजारों किलोमीटर की दूरी कभी-कभी इंसान की इच्छा से बड़ी हो जाती है।

और फिर… आपका वही बनवाया हुआ बड़ा सा मकान; पूरी तरह आधुनिक इंटीरियर डिजाइन किए हुए कमरे, गाड़ी सभी आपको काटने दौड़ेंगे। जिसमें कभी बेटा किसी कमरे में बैठा होता था; कभी बेटी दूसरे कमरे में, कभी बाहर वाले कमरे में आप खुद। घर में हमेशा आवाजें गूंजती रहती थी। सभी की हँसी होती थी, कभी बहस होती थी, कभी बच्चों की बातें। कभी रसोई से बर्तनों की आवाजें। अब वही घर होगा, लेकिन जिस कमरे में भी जाएंगे… वहाँ कोई नहीं होगा!
आप एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते-आते रहेंगे। कभी बरामदे में बैठेंगे। ऐसे ही बैठते-उठते दूसरे कमरों में जाएंगे। ऐसा लगेगा जैसे आप घर में रह नहीं रहे हो… घर में किसी को खोज रहे हों।

फिर आप घर से बाहर अन्य कामों में व्यस्त होने की कोशिश करते हैं, क्यों? शायद इसलिए नहीं कि आपको पैसे चाहिए। शायद इसलिए कि कुछ घंटे घर से बाहर रहा जाए। सेहत ठीक रही तो किसी टूर ऑपरेटर के साथ साल में एक-दो बार घूमने भी निकल जाएंगे। परंतु ऐसा नहीं की आप घूमने जा रहे हैं; आप घूमने नहीं जा रहे होते हैं बल्कि अपने ही घर से भागने जा रहे होते हैं। उसी घर से…जिसे आपने जिंदगी भर की कमाई से बनाया था, जिसकी बैंक की किश्तें भरी थी। जिसमें आपने सोचा था कि एक दिन बेटा-बहू के साथ रहेगा, बेटी-दामाद आएंगे, नाती-पोते दौड़ेंगे। शाम को चाय-नाश्ता बनेगी। घर में फिर से बच्चों की किलकारियां गूंजेगी। लेकिन जिंदगी ने उस घर को अब कुछ और ही बना दिया। एक बहुत बड़ा मकान…और उसमें बहुत ही छोटा-सा अकेला वृद्ध दंपति।

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ये सारी बातें लिखने का मतलब किसी बेटे या बेटी को दोष देने की नहीं है। न ही उनके अन्य प्रदेश के बड़े शहरों या विदेश जाने को, न अच्छी नौकरी को, न बड़े पैकेज को; बल्कि सवाल कहीं और है। हमने बच्चों को उच्च शिक्षित किया, उन्हें उड़ना सिखाया। उन्हें हमेशा यही तो कहा हमलोगों ने कि – “जहाँ तुम्हारा भविष्य अच्छा हो, वहीं जाना।” और उन्होंने वही किया भी। तो फिर हमें उनसे कैसी शिकायत?

लेकिन क्या हमने कभी अपने भविष्य के बारे में सोचा? बच्चे जब बाहर चले जाते हैं तो हम माता-पिता अक्सर कहते हैं कि – “कोई बात नहीं… बच्चे खुश हैं, यही बहुत है हमारे लिए।” बात भी सही है। लेकिन रात को जब घर में सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है, तब क्या?

पत्नी की सुबह उठकर सभी के लिए चाय बनाने की आदत हो और पीने वाले सिर्फ दो और कोई न हो, तब क्या?
डॉक्टर कहे कि किसी को साथ लेकर आइए और मोबाइल के फोनबुक में दर्ज सैकड़ों नंबरों में से कोई ऐसा न मिले जो उसी शहर में रहता हो, तब क्या?

बाजार से सब्जी का थैला उठाते समय हाथ काँपने लगें और साथ चलने वाला कोई न हो, तब क्या?
बाथरूम में गिर जाएँ और उठाने वाला कोई न हो, तब क्या?
रात को अचानक तबीयत बिगड़ जाए और बच्चे हजारों किलोमीटर दूर वीडियो कॉल पर सिर्फ यही पूछ पाए – “मम्मी या पापा, अब कैसी तबीयत है?”
तब क्या?

और सबसे बड़ा सवाल…
जब बच्चों की जिंदगी में शनिवार-रविवार भी उसकी अपनी जिंदगी के लिए हों…
तब बूढ़े माता-पिता अपने रविवार का क्या करें?
क्या वे सुबह पार्क में जाकर कुछ घंटे बैठें?
फिर घर लौटकर अपने कमरे में चुपचाप पड़े रहें?
फिर शाम को उसी पार्क में जाकर कुछ परिचित चेहरों को देखें?
और धीरे-धीरे अपने जीवन को सिर्फ इस इंतजार में बदल दें कि –
“आज शायद बच्चों का फोन आ जाए।”
या फिर उन्हें उसी पुराने घर में वापस लौट जाना चाहिए, जहाँ उन्होंने पूरी जिंदगी बिताई?

अपना काम खुद करना चाहिए?
बाजार खुद जाना चाहिए?
खाना खुद बनाना चाहिए?
दवाइयाँ खुद खरीदनी चाहिए?
और रात को बच्चों से वीडियो कॉल करके बस इतना कह देना चाहिए-
“हाँ बच्चों, हमलोग बिल्कुल ठीक हैं।”

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शायद यही जीवन है। शायद यही आज की सच्चाई भी है। लेकिन जब अगली बार कोई पिता गर्व से कहे कि – “मेरे बेटे/ बेटी का पैकेज 50 लाख का है…” तो शायद उसके बाद एक सवाल मन में जरूर उठना चाहिए – “बहुत अच्छा… बेटे/ बेटी का पैकेज 50 लाख का है; लेकिन इस पैकेज में उसके बूढ़े माँ-बाप के लिए साल में कितने दिन हैं…?” और अगर उस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है… तो एक और सवाल है…?

हम बच्चों को करोड़ों की नौकरी के लिए तैयार कर रहे हैं… लेकिन क्या हमने उन्हें यह सिखाया है कि उन करोड़ों की कमाई के बीच अपने बूढ़े माँ-बाप के लिए दो घंटे कैसे बचाए जाते हैं? और उससे भी बड़ा सवाल – जिस दिन हमारे बच्चे सचमुच बहुत सफल हो जाएँगे, घर से बहुत दूर चले जाएँगे और अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे… उस दिन हमारे पास गर्व करने के लिए तो बहुत कुछ होगा; लेकिन क्या हमारे पास साथ बैठने के लिए कोई होगा….?

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राज कुमार गुप्त Avatar
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1 thoughts on “आज के सफल कहे जाने वाले अभिभावकों के सामने सबसे बड़ा सवाल…???”

  1. Cropped khn logo 1.jpg
    Kolkata News Desk says:

    जीवन के इस कटु सत्य को बड़ी भावुकता से पेश किया गया है। शानदार लेख

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